AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने एक बार वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग को घेरा है. उन्होंने बताया कि वो हमेशा से SIR का विरोध करते रहे हैं. AIMIM प्रमुख ने SIR को लेकर लिए गए फैसले को गलत ठहराया. उन्होंने कहा- ”सुप्रीम कोर्ट ने SIR के फैसले को सही बताया, लेकिन मेरे हिसाब से ये गलत था. चुनाव आयोग के फैसले बहुमत के आधार पर होने चाहिए थे.” ओवैसी ने सवाल उठाते हुए कहा- ”चुनाव आयोग देश को बताए कि फैसले किस तरह के बहुमत से लिए गए? आपके दो चुनाव आयुक्तों ने असहमति वाले नोट दिए थे. अगर फैसले बहुमत से नहीं लिए गए, तो उनकी वैलिडिटी का क्या होगा?”
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क्या बोले ओवैसी?
हैदराबाद सांसद ने आगे कहा- ”SIR की वजह से इस देश के गरीब सबसे ज्यादा परेशान हैं, दस्तावेजों की तलाश में भाग-दौड़ करने से उनकी गरिमा को ठेस पहुंची है. इससे गरीबों पर इतना भारी बोझ पड़ता है कि मुझे समझ नहीं आता कि इसे कैसे संभाला जाएगा.” AIMIM चीफ ने कहा- ”BJP सरकार को उन लोगों की स्थिति के बारे में बताना चाहिए जिनके नाम फाइनल SIR में नहीं आए. अब, उन लोगों के बारे में सोचिए जिनके नाम छूट गए. उनके बच्चों, बेटों, बेटियों या पोते-पोतियों का क्या होगा? वे अपने नाम कैसे जुड़वाएंगे? अगर उनके दादा-दादी या माता-पिता के नाम नहीं हैं, तो वे अपनी वंशावली किससे जोड़ेंगे?”
क्या है विवाद?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के भीतर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां जताई थीं. इनमें फॉर्म 6 में बदलाव और वोटर लिस्ट के डेटा सेंट्रलाइजेशन को लेकर चर्चाएं थीं. रिपोर्ट में ये दावा किया गया कि फॉर्म 6 में जो बदलाव हुए, उनपर संधू और जोशी ने आपत्तियां जताई गई थीं. उन्होंने इन बदलावों को गैर-कानूनी और गलत करार दिया. हालांकि चुनाव आयोग ने इस रिपोर्ट के सामने के बाद ये सफाई दी कि EC में लिए गए फैसले सभी के सहमति से होते हैं, वैचारिक मतभेद का मतलब टकराव नहीं है. लेकिन विपक्ष इस मुद्दे को लगातार उठा रहा है और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है.