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10 साल में जजों के खिलाफ 8630 शिकायतें, लोकसभा में सरकार ने दिया जवाब

कानून एवं न्याय मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और संसदीय कार्य राज्य मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल ने सदन में जवाब दिया। बताया कि उच्च न्यायपालिका के खिलाफ शिकायतों को न्यायपालिका के “इन-हाउस मैकेनिज्म” के तहत निपटाया जाता है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट।

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पिछले 10 सालों में भारतीय जजों के खिलाफ 8630 शिकायतें दर्ज हुई हैं। ये आंकड़ा चौंकाने वाला है। लोकसभा में सरकार ने जजों के खिलाफ मिली शिकायतों का विस्तृत ब्यौरा पेश किया है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के सांसद माथेस्वरन वी एस ने सरकार से पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट के पास हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार, यौन दुराचार या अन्य गंभीर आरोपों से जुड़ी शिकायतों का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड या डेटाबेस मौजूद है।

इस पर कानून एवं न्याय मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और संसदीय कार्य राज्य मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल ने सदन में जवाब दिया। उन्होंने बताया कि उच्च न्यायपालिका के खिलाफ शिकायतों को न्यायपालिका के “इन-हाउस मैकेनिज्म” के तहत निपटाया जाता है।

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मंत्री ने बताया कि 7 मई 1997 को सुप्रीम कोर्ट ने दो संकल्प अपनाए थे। पहला Restatement of Values of Judicial Life और दूसरा In-house Procedure. बताया कि इसी प्रक्रिया के तहत शिकायतों की सुनवाई होती है।

    पिछले 10 वर्षों में शिकायतें

    • 2016 — 72
    • 2017 — 682
    • 2018 — 717
    • 2019 — 1,037
    • 2020 — 518
    • 2021 — 686
    • 2022 — 1,012
    • 2023 — 977
    • 2024 — 1,170
    • 2025 — 1,102

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    कुल मिलाकर 2016 से 2025 के बीच 8,630 शिकायतें मुख्य न्यायाधीश कार्यालय को प्राप्त हुईं।

    शिकायत करने की प्रक्रिया क्या है?

    सरकार ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के जजों और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतें मुख्य न्यायाधीश (CJI) देखते हैं। हाईकोर्ट के जजों के खिलाफ शिकायतें संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास जाती हैं। CPGRAMS या अन्य माध्यमों से प्राप्त शिकायतें संबंधित प्राधिकरण को अग्रेषित की जाती हैं।

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    सरकार ने यह भी संकेत दिया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान में निहित है और शिकायतों के निपटान की प्रक्रिया न्यायपालिका के भीतर तय तंत्र के अनुसार चलती है। लोकसभा में उठे इस सवाल के बाद उच्च न्यायपालिका की जवाबदेही और पारदर्शिता पर बहस फिर तेज होने की संभावना है।

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