कैंसर से जुड़े ये 10 मिथक कहीं आप भी तो नहीं समझते सच? एक्सपर्ट्स ने बताया किन बातों पर नहीं करना चाहिए यकीन

ICMR के एक्सपर्ट्स ने कैंसर के कुछ मिथकों के बारे में बताया हैं जिन्हें लोग सच समझने की भूल कर देते हैं. ये मिथक खतरनाक हैं और मरीज को कैंसर के सही इलाज से वंचित कर सकते हैं. इसीलिए इन मिथकों की सच्चाई जानना जरूरी है.

Cancer Myths

कैंसर के इन 10 मिथकों पर कभी ना करें यकीन. AI Generated Image

Cancer Myths: कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसका समय रहते इलाज ना किया जाए तो मरीज की जान जा सकती है. ऐसे में इस खतरनाक बीमारी के बारे में सही जानकारी होना जरूरी है. भारत में सबसे ज्यादा होंठ या मुंह का कैंसर, पेट का कैंसर, स्तन कैंसर, आंतों का कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर, ओवेरियन कैंसर और सर्वाइकल कैंसर देखा जाता है. वहीं, भारत में हर साल 15 से 16 लाख के करीब कैंसर के नए मामले देखने को मिलते हैं. ऐसे में कैंसर के बारे में समाज में निहित मिथकों को दूर करना और सच्चाई जानना जरूरी है ताकि कैंसर के मरीज की समय रहते जान बचाई जा सके. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के एक्सपर्ट्स ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कैंसर से जुड़े 10 बड़े मिथक क्या हैं और असल में सच क्या है.

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कैंसर से जुड़े मिथक और फैक्ट्स | Cancer Myths And Facts

पहला मिथक – कैंसर संक्रामक होता है

फैक्ट – कैंसर संक्रामक नहीं होता है. हालांकि, कुछ ऐसे कैंसर हैं जो बैक्टीरिया या वायरस से होते हैं, जैसे हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी से लिवर कैंसर होता है, ह्यूमन पैपिलोमावायरस से सर्वाइकल कैंसर हो सकता है.

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दूसरा मिथक – अगर परिवार में किसी को कैंसर नहीं हुआ है तो आपको भी नहीं होगा

फैक्ट – अगर आपके परिवार में कभी किसी को कैंसर नहीं हुआ है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपको भी कैंसर नहीं होगा. इसकी कोई गारंटी नहीं है कि आपको कैंसर ना हो. केवल 5 से 10% कैंसर ही ऐसे हैं जो परिवार के कारण होते हैं. बाकि कैंसर जेनेटिक्स में बदलाव और व्यक्ति की पूरी जिंदगी, आदतों और पर्यावरण पर निर्भर करते हैं.

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तीसरा मिथक – अगर परिवार में किसी को कैंसर हुआ है तो आपको भी पक्का होगा

फैक्ट – फैमिली में किसी को कैंसर हुआ हो तो इससे आप में कैंसर पनपने की संभावना रहती है लेकिन ऐसा नहीं है कि यह होगा ही होगा. 5 से 10% कैंसर ही ऐसे हैं जो माता-पिता से बच्चों में आते हैं.

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चौथा मिथक -अगर आपको कैंसर हुआ है तो आप कुछ ही समय में मर सकते हैं

फैक्ट – कैंसर का मतलब यह नहीं है कि आपकी जान जाना तय है. कैंसर की जांच (Cancer Test) और इलाज से ज्यादातर कैंसर में सर्वाइवल रेट्स बढ़े हैं. वहीं, बहुत से लोग कैंसर की पहली जांच के 5 साल या उसके बाद तक भी जीते हैं.

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पांचवा मिथक – कैंसर का ट्रीटमेंट बीमारी से ज्यादा खतरनाक होता है

फैक्ट – कैंसर ट्रीटमेंट जैसे कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी के कुछ साइड इफेक्ट्स देखे गए हैं जो असहज होते हैं और कई बार गंभीर भी होते हैं. लेकिन, हालिया समय में कीमोथेरेपी ड्रग्स और रेडिएशन थेरेपी को लेकर बेहतर टोलरेंस देखी गई है. इनसे होने वाले ऐसे कई लक्षण हैं जिन्हें मैनेज किया जा सकता है.

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छठा मिथक – कैंसर का इलाज करा रहे लोग रोजमर्रा की एक्टिविटीज नहीं कर सकते हैं

फैक्ट – कैंसर के बहुत से मरीजों का आउटपेशेंट बेसिस पर इलाज किया जाता है. मरीजों को कम समय के लिए ही अस्पताल में रहना पड़ता है और वे अपने रोजमर्रा के काम या एक्टिविटीज कर सकते हैं. वे कैंसर का इलाज कराते हुए चाहे तो पार्ट टाइम या फुल टाइम काम कर सकते हैं, बच्चों का ख्याल रख सकते हैं और सोशल एक्टिविटीज अटेंड कर सकते हैं.

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सातवां मिथक – कैंसर हमेशा बेहद दर्दनाक होता है

फैक्ट – कैंसर शुरुआती स्टेज में बिना दर्द वाला हो सकता है. हालांकि, जब कैंसर बढ़ने लगता है और अन्य अंगों तक फैलने लगता है तो दर्द हो सकता है. कैंसर के ज्यादातर मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज होता है और मरीडों को दर्द मैनेज करने की दवाएं दी जाती हैं.

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आठवां मिथक – बुजुर्गों का कैंसर ट्रीटमेंट नहीं हो सकता है

फैक्ट – कैंसर के इलाज की कोई एज लिमिट यानी उम्र की सीमा नहीं है. बहुत से वृद्ध मरीज जवान मरीजों की तरह ही कैंसर ट्रीटमेंट (Cancer Treatment) को लेकर रिस्पोंड करते हैं. ऐसे में जिस भी व्यक्ति को कैंसर हुआ है उसे कैंसर का इलाज करवाना चाहिए.

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नौंवा मिथक – हर्बल प्रोक्ट्स से कैंसर ठीक हो सकता है

फैक्ट – कुछ स्टडीज इस बात का जिक्र करती हैं कि ऑल्टरनेटिव या कॉम्प्लिमेंटरी थेरेपीज और हर्ब्स कैंसर के मरीजों को कैंसर ट्रीटमेंट के साइड इफेक्ट्स से बचा सकते हैं. लेकिन, कोई हर्बल प्रोडक्ट कैंसर के इलाज में वैज्ञानिक तौर पर असरदार साबित नहीं हुआ है.

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दसवां मिथक – मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना और आस-पास फोन के टावर होने पर कैंसर हो सकता है

फैक्ट – अबतक जितनी भी स्टडीज हुई हैं उनमें यह साबित नहीं हुआ है कि फोन कैंसर का कारण बनता है. कैंसर जेनेटिक म्यूटेशंस से होता है और फोन में लो फ्रीक्वेंसी एनर्जी होती है जो जीन्स को डैमेज नहीं करती है. सेलफोन या सेलफोन टावर से कैंसर होता है यह अब भी एक विवादास्पद मुद्दा है.

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 अस्वीकरण – इस खबर को सामान्य जानकारी के तौर पर लिखा गया है. अधिक जानकारी के लिए विशेषज्ञ की सलाह लें या चिकित्सक से परामर्श करें. न्यूज 24 किसी तरह का दावा नहीं करता है.

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Source - ICMR

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लेख समाप्त

लेखक के बारे में

Seema Thakur

Seema Thakur

सीमा ठाकुर पत्रकारिता से पिछले 7 सालों से जुड़ी हैं. न्यूज24 में सीमा बतौर चीफ सब एडिटर काम कर रही हैं. सीमा हेल्थ और लाइफस्टाइल बीट पर लिखती हैं और कॉन्टेन्ट क्रिएशन के साथ ही टीम लीड की भूमिका भी निभा रही हैं. न्यूज24 में सीमा ने अपनी बीट से हटकर इलेक्शंस की स्टोरीज पर भी काम किया है. हेल्थ और लाइफस्टाइल से जुड़ी स्टडीज, लेटेस्ट न्यूज और एक्सपर्ट्स/डॉक्टर्स से बातचीत पर आधारित लेख लिखने में सीमा की मजबूत पकड़ है. सीमा हेल्थ की खबरों और लेटेस्ट अपडेट के लिए AIIMS, ICMR, WHO,  स्वास्थ्य मंत्रालय जैसे संस्थानों के विशेषज्ञों और डॉक्टरों के संपर्क में रहती हैं. अनुभव सीमा ने पत्रकारिता की शुरुआत दिल्ली प्रेस ग्रुप से की थी जहां वे सरिता, मुक्ता और गृहशोभा मैग्जीन में वुमेन ओरिएंटेड, सोशल, लाइफस्टाइल, हेल्थ और बॉलीवुड के अलावा पॉलिटकल आर्टिकल्स लिखती थीं. सीमा को प्रूफरीडिंग और एडिटिंग का भी खासा अनुभव है. प्रिंट में काम करने के दौरान सीमा की हिंदी भाषा में अच्छी पकड़ है. दिल्ली प्रेस के बाद सीमा डायमंड पब्लिशिंग हाउस से जुड़ी थीं जहां उन्होंने मैग्जीन और वेबसाइट दोनों के लिए काम किया. डायमंड पब्लिशिंग हाउस के बाद सीमा ने NDTV के साथ डिजिटल मीडिया में अपना करियर शुरू किया. NDTV में सीमा ने राइटर के साथ ही वीडियो प्रोड्यूसर, एंकर और पॉडकास्टर के तौर पर भी काम किया. लाइफस्टाइल वीडियोज और बॉलीवुड गोल्ड सीरीज को प्रोड्यूस और एंकर करने के साथ ही वे बॉलीवुड पॉडकास्ट किया करती थीं. वीडियो प्रोडक्शन में सीमा का इंटरेस्ट और पकड़ यहीं से आई है. शिक्षा सीमा ने दिल्ली विश्वविद्यालय के दीन दयाल उपाध्याय कॉलेज से बी.ए किया है. इसके बाद जामिया मिलिया इस्लामिया से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. जामिया की पीजी डिप्लोमा इन जर्नलिज्म डिपार्टमेंट की मैग्जीन में सीमा स्टूडेंट एडिटर और अपने बैच की कॉन्टेंट हेड रह चुकी हैं.
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