Chaitra Navratri 2023: बुधवार को चैत्र नवरात्र पर्व की शुरुआत हो गई। आज से नौ दिन तक मंदिरों में मातारानी की आराधना में विशेष अनुष्ठान होंगे। घरों में भी लोग घट स्थापना कर, अखंड ज्योत प्रज्ज्वलित करेंगे। चैत्र माह की प्रतिपदा से नव संवत्सर भी प्रारंभ हो गया है।
चैत्र नवरात्र पर्व में श्रद्धालु नौ दिन तक देवी के नौ स्वरूपों की आराधना कर रहे हैं। नव संवत्सर के शुरू होने पर लोग घरों पर भगवा ध्वज लगा रहे हैं। तिलक लगाकर हिंदू नववर्ष की शुरुआत पर शुभकामनाएं दे रहे हैं। नवरात्र पर्व के अवसर पर मंदिरों में विशेष साजसज्जा की गई है। हिन्दू पंचांग के अनुसार बुधवार को प्रतिपदा के साथ नव संवत्सर प्रारंभ हो गया है।
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दिल्ली के झंडेवालान मंदिर में की गई आरती
चैत्र नवरात्रि के पहले दिन मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। दिल्ली के प्रसिद्ध झंडेवालान मंदिर में सुबह-सुबह आरती की गई। इस दौरान मां के भक्तों ने मंदिर में पूजा-अर्चना की और मां दुर्गा का आशीर्वाद लिया। उधर छतरपुर मंदिर में भी लोगों की भारी भीड़ उमड़ी।
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नवरात्रि के पहले गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। लोग कतार में खड़े होकर मां के दर्शन के लिए अपनी बारी का इंतजार दिखे। इस दौरान श्रद्धालुओं में जबरदस्त उत्साह दिखा।
महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा की धुम
हर साल चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से हिंदू नववर्ष शुरु होता है, जिसे गुड़ी पड़वा के नाम से जाना जाता हैं, इसी दिन चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पूजा करने से नया साल सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य लेकर आता हैं। महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा का पर्व धुमधाम से मनाया जा रहा है। नागपुर में इस दौरान स्थानीय कलाकार खुशियां मनाते दिखें।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने ठाणे जिले में श्री अंबे माता चैत्र नवरात्रि महोत्सव के दौरान शोभा यात्रा में हिस्सा लिया।
जानें क्यों मनाया जाता है गुड़ी पड़वा
गुड़ी पड़वा के पर्व को मनाने के पीछे सिर्फ नववर्ष का शुभारंभ ही नहीं है, बल्कि इससे रामायणकाल की एक धार्मिक कथा भी जुड़ी है। मान्यता है मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने जिस दिन दक्षिण भारत के लोगों को बालि के अत्याचार से मुक्त कराया था, वह चैत्र मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि थी। मान्यता है कि बालि के वध के बाद उस समय दक्षिण भारत के लोगों ने घर-घर में विजय पताका फहराई थी, जो बाद में गुड़ी पड़वा पर्व के रूप में तब्दील हो गई। हालांकि लोग नई फसल को लेकर खुशी मनाने के लिए भी इस पर्व को मनाते हैं।
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