Peace Bond Rules: दिल्ली में विरोध प्रदर्शन से पहले एहतियातन हिरासत में लिए गए ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के फाउंडर अभिजीत दीपके को 17 अक्टूबर को एक और ‘पीस बॉन्ड’ भरने के बाद रिहा कर दिया गया. इस घटना ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि जब उन्होंने 6 दिन पहले ही ऐसा ही एक बॉन्ड भरा था, तो उन्हें फिर से नया मुचलका देने की जरूरत क्यों पड़ी? दीपके ने 11 अक्टूबर को 50,000 रुपये का एक बॉन्ड भरा था, जिसमें उन्होंने एक साल तक शांति बनाए रखने और अच्छा आचरण करने का वादा किया था. हालांकि 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में होने वाले ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च से पहले दिल्ली पुलिस ने उन्हें फिर से हिरासत में ले लिया.
दीपके को दोबारा हिरासत में लेने की वजह
पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 170 के तहत दीपके के खिलाफ कार्रवाई शुरू की. उन्हें मंदिर मार्ग स्थित विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और एक और ‘पीस बॉन्ड’ भरने के बाद शनिवार शाम को रिहा कर दिया गया. इस मार्च से पहले ‘ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी मंडी हाउस से हिरासत में लिया गया था. दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 की धारा 65 के तहत जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उन्हें शनिवार सुबह रिहा कर दिया गया. ये प्रदर्शन CJP नेताओं आशुतोष रांका और सौरव दास की हिरासत के विरोध में था. इन दोनों को बिना इजाजत जंतर-मंतर में प्रवेश करने और नेशनल फ्लैग फहराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. बाद में उन्हें 5 दिन की हिरासत में भेज दिया गया था.
‘पीस बॉन्ड’ क्या होता है?
‘पीस बॉन्ड’ एक लीगल अंडरटेकिंग है, जिसके तहत किसी शख्स को एक निश्चित अवधि तक पब्लिक ऑर्डर बनाए रखनी होती है. BNSS की धारा 125 से 143 के तहत ऐसे प्रोसीजर दिए गए हैं, जिनमें शांति भंग होने या खराब आचरण की आशंका को रोकने के लिए बॉन्ड मांगा जा सकता है. इस तरह के बॉन्ड एहतियाती उपाय होते हैं, न कि किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए जाने के बाद दी जाने वाली सजा.
क्या पुलिस दूसरा बॉन्ड मांग सकती है?
हां, ‘पीस बॉन्ड’ भरने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में कोई एहतियाती कार्रवाई नहीं की जा सकती. BNSS की धारा 170 पुलिस को एहतियातन गिरफ्तारी करने का अधिकार देती है, जब उन्हें किसी कॉग्निजेबल ऑफेंस के प्लान के बारे में पता चले और उन्हें लगे कि इसे रोकने का कोई और तरीका नहीं है. धारा 126 एक एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को तब कार्रवाई शुरू करने की इजाजत देती है, जब ये मानने के लिए पर्याप्त आधार हों कि कोई शख्स शांति भंग कर सकता है. उस शख्स से ये क्लेरिफिकेशन मांगा जा सकता है कि उसे एक साल तक के पीरियड के लिए बॉन्ड क्यों नहीं देना चाहिए. हालांकि, इस प्रक्रिया में कानूनी सुरक्षा उपाय शामिल हैं. धारा 130 के तहत एक लिखित आदेश की जरूरत होती है, जिसमें आधार और शर्तें बताई गई हों, जबकि धारा 135 में जांच का प्रावधान है.
दीपके के मामले में क्या क्लियर नहीं है?
अब तक मिली जानकारी से दूसरे बॉन्ड का सटीक कारण साफ नहीं हो पाया है. यह साफ नहीं है कि ये पहले दिए गए अंडरटेकिंग के औपचारिक उल्लंघन के कारण था, या फिर अशांति की किसी अलग आशंका की वजह से. ये तय करने के लिए कि दूसरा बॉन्ड जांच के दौरान एक अंतरिम उपाय था या जांच पूरी होने के बाद लगाया गया था, स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के आदेश को देखना जरूरी होगा.