भारत में किन चुनावों में इस्तेमाल होता है बैलेट पेपर? अब तक EVM में क्यों नहीं हुए शिफ्ट?
EVM vs Ballot Paper: इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की विश्वसनीयता पर विपक्षी पार्टियां अक्सर सवाल करती हैं, और बैलेट पेपर के जरिए चुनाव कराने की मांग करती है. हालांकि भारत में कई ऐसे इलेक्शन होते हैं, जहां आज भी मतपत्रों का इस्तेमाल किया जाता है.
यूपी के एमएलसी इलेक्शन से बैलेट पेपर से वोटिंग (Photo-PTI)
Where Ballot Papers Used in Indian Elections: 28 अक्टूबर 2026 को कई राज्यों में एमएलसी की 28 सीटों पर हुए चुनावों में कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिलने के बाद ईवीएम और बैलेट पेपर को लेकर बहस फिर से राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन गई है. पीएम नरेंद्र मोदी ने विपक्षी दल पर तंज कसते हुए कहा कि ये चुनाव इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के बजाय मतपत्रों के जरिए कराए गए थे. मौजूदा वक्त में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बड़े पैमाने पर ईवीएम का इस्तेमाल होता है, लेकिन भारत में कई दूसरे चुनावों में आज भी बैलेट पेपर का ही यूज किया जाता है.
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पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव
ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों और जिला परिषदों के चुनाव खास तौर से बैलेट पेपर के जरिए कराए जाते हैं. पंचायती राज मंत्रालय की तरफ से 2023 में कराए गए और भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) की स्टडी से पता चला है कि 53% राज्यों में ग्राम पंचायत चुनावों के लिए बैलेट पेपर का इस्तेमाल होता है. सिर्फ केरल, सिक्किम और दादर-नगर हवेली और दमन-दीव में ही सभी ग्राम पंचायत क्षेत्रों में EVM का यूज किया जा रहा था. कई अन्य राज्यों ने इन दोनों तरीकों को अपनाया है.
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इंडियन एक्सप्रेस में छपी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि वित्तीय रुकावटें और ईवीएम तकनीक के बारे में सीमित जागरूकता होने के कारण आज भी मतपत्रों का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसमें ये भी बताया गया है कि बैलेट पेपर की गिनती के लिए काफी ज्यादा मैनपावर और वक्त की जरूरत होती है. नगर निकाय चुनाव राज्य निर्वाचन आयोगों के तहत कराए जाते हैं, जो ये तय कर सकते हैं कि EVM का इस्तेमाल करना है या मतपत्रों का. दिल्ली में नगर निकाय चुनावों के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल होता है, जबकि पंजाब ने 2026 में बैलेट पेपर का इस्तेमाल शुरू कर दिया.
MLC और राज्यसभा चुनावों में बैलेट पेपर का यूज क्यों होता है?
राज्य विधान परिषदों और राज्यसभा के चुनाव ‘सिंगल ट्रांसफरेबल वोट’ (STV) सिस्टम के तहत होते हैं. इस प्रक्रिया में मतदाता उम्मीदवारों को अपनी पहली, दूसरी, तीसरी या चौथी पसंद के तौर पर मार्क करके अपनी प्रायोरिटी बताते हैं. चूंकि इन प्राथमिकताओं के आधार पर वोटों को ट्रांसफर किया जा सकता है, इसलिए इस प्रॉसेस के लिए बैलेट पेपर की जरूरत होती है. राज्यसभा चुनावों में ‘ओपन बैलेट’ सिस्टम भी अपनाया जाता है, जिसके तहत चुने गए विधायक प्राथमिकता के आधार पर मतपत्रों का इस्तेमाल करके अपना वोट डालते हैं.
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नागपुर में एमएलसी चुनाव के वोटों की गिनती (Photo-PTI)
‘सिंगल ट्रांसफरेबल वोट’ सिस्टम कैसे काम करता है?
चुनाव जीतने के लिए किसी उम्मीदवार को वोटों का एक निर्धारित कोटा हासिल करना होता है. कोटा का कैलकुलेशन टोटल वैलिड वोट को सीटों की संख्या में एक जोड़कर उससे डिवाइड करने और फिर नतीजों में एक जोड़ने से की जाती है. मिसाल के तौर पर अगर 4 सीटों के लिए 200 विधायक वोट डालते हैं, तो जीतने के लिए जरूरी कोटा 41 होगा.
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अगर किसी चुने गए उम्मीदवार को जरूरी कोटे से ज्यादा वोट मिलते हैं, तो एक्सट्रा वोटों को दूसरी पसंद (सेकंड प्रेफरेंस) के आधार पर ट्रांसफर कर दिया जाता है. अगर सीटें खाली रह जाती हैं, तो सबसे कम वोट पाने वाले उम्मीदवार को हटा दिया जाता है और उसके वोटों को दूसरे उम्मीदवारों के बीच फिर से बांट दिया जाता है.
ये प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि सभी अवेलेबल सीटें भर नहीं जातीं. छात्र संघ चुनावों में भी इन दोनों सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है. दिल्ली यूनिवर्सिटी अपने छात्र संघ चुनाव ईवीएम के जरिए कराता है, जबकि जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में बैलेट पेपर का इस्तेमाल होता है.