कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने आशंका जताई है कि केंद्र सरकार परिसीमन विधेयक को दोबारा पेश करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुला सकती है. भारतीय संसद में आमतौर पर एक वर्ष में तीन सत्र आयोजित होते हैं बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र, लेकिन जब इन नियमित सत्रों के अलावा सरकार को किसी खास मुद्दे पर चर्चा या जरूरी विधायी कार्य निपटाना होता है, तब ‘विशेष सत्र’ का आयोजन किया जाता है.
संसद का सत्र बुलाने का निर्णय केंद्र सरकार के अधीन होता है. सबसे पहले संसदीय मामलों की कैबिनेट समिति (CCPA) सत्र बुलाने का प्रस्ताव तैयार करती है. इसके बाद राष्ट्रपति औपचारिक रूप से इस प्रस्ताव को मंजूरी देते हैं और सांसदों को राष्ट्रपति के नाम पर ही बैठक के लिए बुलावा भेजा जाता है.
संविधान में क्या है प्रावधान?
रोचक तथ्य यह है कि भारतीय संविधान में ‘विशेष सत्र’ शब्द का कहीं भी सीधा उल्लेख नहीं मिलता है. सामान्य सत्रों की तरह विशेष सत्र भी संविधान के अनुच्छेद 85(1) के तहत ही आहूत किया जाता है. यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि वे समय-समय पर संसद के दोनों सदनों को बैठक के लिए बुला सकते हैं. हालांकि, भारत में कोई तय संसदीय कैलेंडर नहीं है, लेकिन नियम यह है कि दो सत्रों के बीच 6 महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए.
क्या है संविधान का अनुच्छेद 85?
भारतीय लोकतंत्र में सर्वोच्च संस्था संसद की बैठकें कब होंगी, कब खत्म होंगी और लोकसभा का कार्यकाल कब समाप्त होगा-यह सब तय करने का कानूनी आधार संविधान का अनुच्छेद 85 देता है. संविधान के अनुच्छेद 85 के तहत राष्ट्रपति को संसद के दोनों सदनों की बैठक बुलाने और सत्रावसान करने की शक्ति प्राप्त है. दो सत्रों की बैठकों के बीच 6 महीने से ज्यादा का अंतर नहीं हो सकता; यह नियम तय करता है कि संसद साल में कम से कम दो बार जरूर मिले. यह अनुच्छेद सीधे तौर पर राष्ट्रपति को संसद के संचालन से जुड़े तीन सबसे बड़े अधिकार सौंपता है.
राष्ट्रपति को संसद के संचालन से जुड़े तीन सबसे बड़े अधिकार
- सत्र बुलाना: अनुच्छेद 85(1) के तहत राष्ट्रपति को अधिकार है कि वे समय-समय पर संसद के प्रत्येक सदन (लोकसभा और राज्यसभा) को बैठक के लिए बुलाएं. वे अपनी सुविधानुसार समय और स्थान तय कर सकते हैं. हालांकि, इसमें एक सख्त संवैधानिक शर्त जुड़ी है—संसद के एक सत्र की अंतिम बैठक और अगले सत्र की पहली बैठक के बीच 6 महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए. इसका सीधा मतलब है कि देश में साल में कम से कम दो बार संसद की बैठक होना कानूनी रूप से अनिवार्य है.
- सत्र खत्म करना: नुच्छेद 85(2)(क) के तहत राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन या दोनों सदनों का सत्रावसान कर सकते हैं. सदन के दैनिक कामकाज को कुछ समय या अनिश्चितकाल के लिए रोकना पीठासीन अधिकारी का काम होता है, लेकिन पूरे सत्र की औपचारिक समाप्ति यानी ‘सत्रावसान’ केवल राष्ट्रपति की अधिसूचना से ही होती है.
- लोकसभा को भंग करना : अनुच्छेद 85(2)(ख) के तहत राष्ट्रपति को लोकसभा को भंग करने का अधिकार है. इसके बाद देश में नए सिरे से आम चुनाव कराए जाते हैं.
- उल्लेखनीय है कि राज्यसभा एक स्थायी सदन है, जिसे कभी भंग नहीं किया जा सकता.
क्या राष्ट्रपति अपनी मर्जी से फैसला लेते हैं?
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, राष्ट्रपति अनुच्छेद 85 के इन अधिकारों का इस्तेमाल अपनी व्यक्तिगत इच्छा से नहीं करते. संविधान के अनुच्छेद 74 के तहत राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की ‘सलाह और सहायता’ पर काम करने के लिए बाध्य हैं. इसलिए व्यवहार में संसद का सत्र बुलाने , सत्रावसान करने या लोकसभा भंग करने की सिफारिश प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट करती है, जिस पर राष्ट्रपति औपचारिक मुहर लगाते हैं.
कब और क्यों बुलाया जाता है यह सत्र?
- अति-महत्वपूर्ण विधेयक: जब किसी बड़े कानून या सुधार (जैसे परिसीमन, महिला आरक्षण या जीएसटी) को पारित कराना हो.
- ऐतिहासिक अवसर: देश की आजादी की 25वीं, 50वीं या 75वीं जैसी ऐतिहासिक वर्षगांठों को मनाने के लिए.
- गंभीर राष्ट्रीय संकट: युद्ध (जैसे 1962 का भारत-चीन युद्ध) या किसी राष्ट्रीय आपातकाल पर चर्चा के लिए.
इतिहास में कब-कब बुलाया गया विशेष सत्र?
संसदीय इतिहास में विशेष सत्र बेहद सीमित मौकों पर ही बुलाए गए हैं. इनमें से प्रमुख अवसर ऐतिहासिक उपलब्धियों का जश्न मनाने, राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने (जैसे 1977 में तमिलनाडु व नगालैंड और 1991 में हरियाणा) तथा वर्ष 2008 में विश्वास मत हासिल करने के लिए रहे हैं. इसके अलावा 30 जून 2017 की आधी रात को जीएसटी (GST) लागू करने के लिए संसद के सेंट्रल हॉल में विशेष बैठक का आयोजन किया गया था.