क्या है संविधान की दसवीं अनुसूची जिसके तहत जा सकती है विधायक-सांसद की सदस्यता?

भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत सांसदो और विधायकों की सदस्यता रद्द की जा सकती है. ऐसे में ‘दल-बदल विरोधी कानून’ को समझना बेहद जरूरी है. फिलहाल बिहार को मोकामा के एमएलए के खिलाफ इस कानून के तहत कार्रवाई की मांग की गई है.

Anti-Defection Law AI

'दल-बदल विरोधी कानून' क्या है? (AI Image)

What Is Anti-Defection Law: अनंत सिंह को जेडीयू से निकालने के बाद उनकी विधायकी भी रद्द करने की बात चल रही है. जनता दल यूनाइटेड ने बिहार विधानसभा के स्पीकर प्रेम कुमार से संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अनंत सिंह की सदस्यता रद्द करने की सिफारिश की है. ऐसे में ये समझना जरूरी है कि दसवीं अनुसूची क्या है, जिसका कनेक्शन दल-बदल कानून से है.

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क्या है दल-बदल कानून?

भारत का ‘दल-बदल विरोधी कानून’ (Anti-Defection Law) 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लागू किया गया था. इसके तहत संविधान में ‘दसवीं अनुसूची’ जोड़ी गई. इस कानून का मकसद चुने गए प्रतिनिधियों को राजनीतिक फायदे के लिए दल बदलने से रोकना और सरकारों में स्थिरता सुनिश्चित करना है.

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विधायक या सांसद को कब अयोग्य ठहराया जा सकता है?

दसवीं अनुसूची के तहत इन स्थितियों में कोई सांसद या विधायक अपनी सदस्यता खो सकता है, जैसे-

  • अपनी मर्जी से पार्टी की सदस्यता छोड़ देना (भले ही औपचारिक इस्तीफा न दिया गया हो).
  • पार्टी के ‘व्हिप’ के खिलाफ वोट देना, या बिना पूर्व अनुमति के अहम मतदान के समय वोटिंग से दूर रहना.
  • किसी पार्टी के टिकट पर चुने जाने के बाद, किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाना.
  • मनोनीत सदस्यों का अपना पद ग्रहण करने के 6 महीने बाद किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाना.

कब लागू नहीं होता ये कानून?

आमतौर पर अगर किसी पार्टी के कम से कम 2-तिहाई विधायक किसी दूसरी पार्टी में विलय कर लेते हैं, तो उन विधायकों को अयोग्यता से सुरक्षा मिल जाती है. यानी अगर किसी पार्टी के पास 30 विधायक या सांसद है और 20 सदस्य दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं, या अपनी पार्टी छोड़ देते हैं, तो उन 20 नेताओं की सदस्यता रद्द नहीं होगी.

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अयोग्यता का फैसला कौन करता है?

‘दल-बदल विरोधी कानून’ के तहत दायर याचिकाओं पर फैसला विधानसभा अध्यक्ष या राज्यसभा/विधान परिषद के सभापति करते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने ‘किहोतो होलोहन (1992)’ मामले में दिए गए अपने फैसले में ये साफ किया था कि इनके फैसलों को बाद में अदालत में ‘न्यायिक समीक्षा’ के जरिए चुनौती दी जा सकती है.

अनंत सिंह का ताजा मामला

बिहार के मोकामा से विधायक अनंत सिंह ‘दल-बदल विरोधी कानून’ के तहत कार्रवाई का सामना करने वाले सबसे हाल के हाई-प्रोफाइल राजनेता बन गए हैं. 24 अक्टूबर 2026 को जनता दल (यूनाइटेड) ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में उन्हें और पूर्व विधायक नीलम देवी को 6 साल के लिए पार्टी से निकाल दिया.

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ये विवाद तब शुरू हुआ जब अनंत सिंह ने पटना ग्रेजुएट्स विधान परिषद चुनाव में JD(U) के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार का समर्थन करने के बजाय, ‘जन सुराज’ के उम्मीदवार अनुज सिंह के लिए खुलकर प्रचार किया. पार्टी ने उन पर नेतृत्व के निर्देशों की बार-बार अवहेलना करने और वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ टिप्पणी करने का भी आरोप लगाया है.

पार्टी से निकाले जाने के बाद जनता दल यूनाइडेट ने बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार को औपचारिक पत्र लिखकर दसवीं अनुसूची के तहत अनंत सिंह की विधायक सदस्यता रद्द करने की मांग की है. हालांकि अभी तक उनकी सदस्यता रद्द नहीं की गई है. अब आखिरी स्पीकर प्रेम कुमार पर निर्भर है, जिनके फैसले की समीक्षा अदालतों की तरफ से की जा सकती है.

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लेखक के बारे में

Shariqul Hoda

Shariqul Hoda

न्यूज़ 24 डिजिटल में शारिकुल होदा सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. मुख्य तौर पर वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरें लिखते हैं. शारिकुल ने 2008 में दूरदर्शन में बतौर इंटर्न अपनी शुरुआत की, इसके बाद वह दैनिक जागरण, टीवी टुडे नेटवर्क, जनसंदेश, श्री न्यूज़, भारत खबर, स्पोर्ट्सकीड़ा, WION और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने 3 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव से लेकर देश की बड़ी घटनाओं को कवर किया है. अपने डेढ़ दशक के मीडिया करियर में शारिकुल ने देश की राजनीति, इंटरनेशनल डिप्लोमेसी, खेलकूद से जुड़ी घटनाओं की अच्छी समझ हासिल की है. कितने साल का तजुर्बा: 16 साल शिक्षा: शारिकुल ने बैंगलोर यूनिवर्सिटी (आचार्य इंस्टीट्यूट) से बीए जर्नलिज्म और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (एपीजे इंस्टीट्यूट) से मास्टर्स इन जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की है.
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