AI for Good Global Commission: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का दायरा पूरी दुनिया में बड़ी तेजी से फैल रहा है, लेकिन इसके बढ़ते खतरों ने अब सबकी चिंता बढ़ा दी है. हालिया यूएन रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के टॉप 500 एआई सुपरकंप्यूटरों की कुल कंप्यूटिंग शक्ति का 75% हिस्सा अकेले अमेरिका और 15% हिस्सा चीन के पास है. यानी दुनिया की 90% एआई सुपरकंप्यूटिंग पावर सिर्फ दो देशों के पास सिमट कर रह गई है.
इसी को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र (UN) ने एक बहुत बड़ा कदम उठाया है. दुनिया में एआई के बढ़ते इस्तेमाल को सुरक्षित और सही दिशा देने के लिए यूएन अब ‘AI फॉर गुड ग्लोबल कमीशन’ (आयोग) का गठन करने जा रहा है. यह आयोग दुनिया भर में एआई के इस्तेमाल और विकास के लिए ग्लोबल नियम तय करेगा. अमेरिकी मीडिया ग्रुप ‘एक्सिओस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पैनल ने एआई के खतरों को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है.
क्या है ‘AI फॉर गुड ग्लोबल कमीशन
AI फॉर गुड ग्लोबल कमीशन संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा गठित 40 शीर्ष वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और तकनीकी विशेषज्ञों का एक स्वतंत्र वैश्विक मंच है. इसका मुख्य उद्देश्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की अनियंत्रित क्षमताओं, डीपफेक, और साइबर सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए एक बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय नीति और सुरक्षा ढांचा तैयार करना है. यह कमीशन यह सुनिश्चित करने के लिए काम करता है कि एआई का विकास मानव कल्याण, स्वास्थ्य, शिक्षा और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए हो, न कि विनाशकारी या अनैतिक उद्देश्यों के लिए.
कौन करेगा इस बड़े आयोग की अगुवाई?
इस खास आयोग के नेतृत्व की जिम्मेदारी दुनिया की दो जानी-मानी हस्तियों को सौंपी गई है. इसकी सह-अध्यक्षता मशहूर टेक कंपनी सेल्सफोर्स के सीईओ मार्क बेनिओफ और रवांडा के राष्ट्रपति पॉल कागामे मिलकर कर रहे हैं. आयोग में दुनिया की उन कंपनियों के मुखिया शामिल हो रहे हैं, जिनके बिना आज तकनीक की दुनिया अधूरी है. इसमें अमेजन के एंडी जेसी, माइक्रोसॉफ्ट के ब्रैड स्मिथ और एनवीडिया के जेन्सेन हुआंग जैसे दिग्गज टेक अधिकारी शामिल होंगे. इसके अलावा एंथ्रोपिक और कोहेयर जैसी बड़ी एआई कंपनियों के अधिकारी भी इसका हिस्सा बनेंगे. सिर्फ कंपनियां ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों के बड़े नेता और नीति-निर्माता भी इस मंच पर एक साथ आ रहे हैं.
आयोग की पहली बैठक 8 को जिनेवा में
यूएन द्वारा हाल ही में गठित ‘AI फॉर गुड ग्लोबल कमीशन’ (आयोग) की पहली और सबसे महत्वपूर्ण बैठक आगामी 8 जुलाई को स्विट्जरलैंड के जिनेवा शहर में होने जा रही है. खास बात यह है कि इस आयोग की बैठक से ठीक पहले, 6 और 7 जुलाई को संयुक्त राष्ट्र का ‘ग्लोबल डायलॉग ऑन एआई गवर्नेंस’ (वैश्विक संवाद) होगा. इस दो दिवसीय संवाद के तुरंत बाद, 8 जुलाई को नया आयोग अपनी पहली औपचारिक बैठक करेगा, जिसमें तय किए गए वैज्ञानिक सुझावों को जमीन पर उतारने की रणनीति बनेगी.
एक मंच पर होंगे दुनिया के सबसे बड़े चेहरे
इस ऐतिहासिक बैठक की सह-अध्यक्षता टेक दिग्गज कंपनी सेल्सफोर्स के सीईओ मार्क बेनिओफ और रवांडा के राष्ट्रपति पॉल कागामे करेंगे. बैठक में एआई की दुनिया को नियंत्रित करने वाली सबसे बड़ी कंपनियों जैसे माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन और एनवीडिया के शीर्ष अधिकारी (ब्रैड स्मिथ, एंडी जेसी और जेन्सेन हुआंग) शामिल होंगे. इनके साथ ही एस्टोनिया के राष्ट्रपति और सिंगापुर, सऊदी अरब, कजाखस्तान, नाइजीरिया जैसे देशों के एआई नीति-निर्माता भी इस बैठक में बैठकर नियमों का मसौदा तैयार करेंगे.
बैठक का असली एजेंडा क्या है?
आयोग की इस पहली बैठक का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एआई का फायदा सिर्फ अमीर देशों या कुछ चुनिंदा टेक कंपनियों तक सीमित न रहे. बैठक में विकासशील देशों को एआई के बुनियादी ढांचे से जोड़ने, स्वास्थ्य, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा और आपदा प्रबंधन में इसके सही इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर चर्चा होगी. इसके साथ ही, एआई से फैलने वाले भ्रम और भाषाओं के गलत अनुवाद जैसी गंभीर तकनीकी कमियों को दूर करने के लिए एक सुरक्षित ग्लोबल फ्रेमवर्क बनाने पर अंतिम सहमति बनाने की कोशिश की जाएगी.
अमीर और गरीब देशों के बीच बढ़ रहा भेदभाव
अमेरिकी मीडिया ग्रुप ‘एक्सिओस’ की रिपोर्ट में यह साफ कहा गया है कि हर हफ्ते करीब एक अरब से ज्यादा लोग एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसके बावजूद इसका फायदा सबको बराबर नहीं मिल रहा है. आज एआई के बड़े मॉडल और कंप्यूटिंग सिस्टम पर सिर्फ अमेरिका, चीन और कुछ चुनिंदा बड़ी कंपनियों का ही पूरी तरह से दबदबा है. दूसरी तरफ, भारत जैसे विकासशील और कम आय वाले देश इस रेस में बहुत पीछे छूट रहे हैं. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर एआई की ताकत कुछ ही हाथों में सिमट गई, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं भी कमजोर हो सकती हैं.
गलत अनुवाद से जान का खतरा!
रिपोर्ट में एआई के इस्तेमाल से जुड़ा एक बेहद डराने वाला खुलासा भी हुआ है. आज के एआई टूल्स अंग्रेजी में तो अच्छा काम करते हैं, लेकिन दुनिया की बाकी भाषाओं में इनका प्रदर्शन काफी खराब है. स्वास्थ्य सेवाओं में इसके जानलेवा नतीजे देखे गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, एक एआई मशीन ट्रांसलेशन ने गलती से ‘चेचक’ को ‘सिफलिस’ लिख दिया. यही नहीं, उसने ‘नसों में दिए जाने वाले एंटीबायोटिक्स’ का अनुवाद ‘नसों में दिए जाने वाले कीटनाशक’ के रूप में कर दिया. ऐसी गलतियां किसी की जान भी ले सकती हैं. इसके अलावा, दुनिया की करीब एक-तिहाई आबादी आज भी इंटरनेट से पूरी तरह कटी हुई है.
क्यों पिछड़ रहे हैं विकासशील देश?
रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि एआई का विकास दुनिया भर में बेहद असमान रहा है. ग्लोबल साउथ यानी भारत सहित तमाम विकासशील और कम आय वाले देश एआई के बुनियादी ढांचे की रेस में ग्लोबल नॉर्थ से काफी पीछे छूट रहे हैं. विकासशील देशों के पास न तो अपना कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर है और न ही स्थानीय भाषाओं में पर्याप्त एआई डेटा रिसोर्सेज उपलब्ध हैं. इसके चलते ये देश उन तकनीकों पर निर्भर होने के लिए मजबूर हैं, जिन्हें वे न तो खुद बना सकते हैं, न उनकी जांच कर सकते हैं और न ही अपनी सामाजिक जरूरतों के हिसाब से ढाल सकते हैं. अगर इस एआई डिवाइड को तुरंत नहीं भरा गया, तो वैश्विक असमानता की खाई और गहरी हो जाएगी.
कैसे काम करेगा यह नया आयोग?
इन सभी बड़ी चुनौतियों और दुनिया के देशों में तकनीकी विशेषज्ञता की कमी को दूर करने के लिए अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) और यूएन मिलकर इस आयोग को शुरू कर रहे हैं. यह आयोग दुनिया भर के शीर्ष टेक-दिग्गजों, वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और वैश्विक नेताओं को एक मंच पर लाएगा. इसका मुख्य मकसद यह पक्का करना होगा कि एआई का विकास सिर्फ कुछ अमीर देशों तक सीमित न रहे, बल्कि विकासशील देशों को भी इसका सही फायदा मिले और इसके इस्तेमाल के सुरक्षित नियम तय किए जा सकें.
कमीशन के 3 मुख्य स्तंभ
कम्प्यूट ऑडिट : अत्यधिक शक्तिशाली एआई मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल होने वाले डेटा सेंटर्स और एडवांस्ड चिप्स (जैसे GPU) की अंतरराष्ट्रीय मॉनिटरिंग की जाएगी.
अनिवार्य वॉटरमार्किंग : हर एआई-जनरेटेड विजुअल, टेक्स्ट या ऑडियो पर एक डिजिटल वॉटरमार्क अनिवार्य होगा, ताकि डीपफेक और फेक न्यूज़ की तुरंत पहचान हो सके.
ग्लोबल साउथ पार्टनरशिप : विकासशील देशों को कंप्यूटिंग पावर और रिसर्च टूल्स में हिस्सेदारी दी जाएगी ताकि एआई डिवाइड को कम किया जा सके.
ग्लोबल साउथ के लिए इस कमीशन के क्या मायने हैं?
इस वैश्विक पहल का सबसे बड़ा असर भारत समेत ग्लोबल साउथ के विकासशील देशों पर पड़ेगा. वर्तमान में इन देशों के पास अपना बड़ा कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है और वे पूरी तरह पश्चिमी देशों की तकनीकों पर निर्भर हैं. यदि यह कमीशन सफल होता है, तो भारत जैसे देशों को ‘डिजिटल उपनिवेशवाद’ से मुक्ति मिलेगी. भारत अपनी स्थानीय भाषाओं, कृषि और जन-कल्याणकारी योजनाओं के लिए सुरक्षित और स्वतंत्र एआई मॉडल्स का विकास कर सकेगा.
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