समुद्री जहाज का काल है लिम्पेट माइंस, दूसरे विश्वयुद्ध से मचा रहा तबाही, जानिए कैसे करता है काम

ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल की जंग के बाद से लिम्पेट माइंस का नाम काफी ज्यादा सुना जा रहा है. ये बारूदी सुरंग कथित तौर पर ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बना रहे हैं, लेकिन ये विस्फोटक उपकरण कोई नई चीज नहीं है, इसका इतिहास दूसरे विश्वयुद्ध से जुड़ा है.

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लिम्पेट माइंस समुद्री जहाजों को काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं (AI Image)

Limpet Mines: लिम्पेट माइंस पानी के नीचे इस्तेमाल होने वाले छोटे विस्फोटक डिवाइस हैं, जिन्हें जहाजों के बाहरी हिस्से से चिपकाने के लिए डिजाइन किया गया है. ये शिप के हल या अहम सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकते हैं. अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव के दौरान ये हथियार चर्चा में आए हैं. ऐसी खबरें आई हैं कि खास समुद्री मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में जहाजों को इनसे नुकसान पहुंचा है. साइज में छोटे होने के बावजूद, लिम्पेट माइंस कमर्शियल शिप और नौसैनिक जहाजों के लिए एक गंभीर खतरा बन सकते हैं.

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लिम्पेट माइंस कैसे काम करते हैं?

लिम्पेट माइंस आमतौर पर जहाज के पानी के नीचे वाले हिस्से से चिपका दिए जाते हैं. इनमें विस्फोटक सामग्री होती है, जिसे अलग-अलग तरीकों से ट्रिगर किया जा सकता है, जैसे कि टाइमर के जरिए या रिमोट कंट्रोल सिस्टम से. कुछ लिम्पेट माइंस में ‘एंटी-रिमूवल’ फीचर भी होता है; अगर कोई इन्हें हटाने की कोशिश करता है, तो ये तुरंत फट सकते हैं. इनका मकसद जहाज के खास हिस्सों को नुकसान पहुंचाना होता है, जैसे कि उसका हल, प्रोपल्शन सिस्टम या स्टीयरिंग इक्विपमेंट. इस तरह के नुकसान से जहाज ठीक से चल नहीं पाता या उसे अपना काम रोकना पड़ सकता है.

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समुद्री जहाजों का दुश्मन

पानी के नीचे होने वाले ये विस्फोट बहुत विनाशकारी हो सकते हैं. हवा की तुलना में पानी विस्फोटक दबाव को अलग तरह से ट्रांसमिट करता है, जिससे जहाज के ढांचे को होने वाला नुकसान और बढ़ सकता है. पानी के नीचे, बहुत कम मात्रा में विस्फोटक भी भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं. इन इक्विपमेंट को हटाना भी काफी खतरनाक काम है, जिसके लिए एक्सप्लोसिव-ऑर्डनेंस एक्सपर्ट्स की जरूरत होती है. पानी के नीचे होने वाला विस्फोट, बिना सीधे संपर्क के भी आस-पास मौजूद लोगों को गंभीर रूप से घायल कर सकता है.

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क्या लिम्पेट माइंस कोई नया हथियार है?

नहीं, लिम्पेट माइंस का इतिहास काफी पुराना है, इनका इस्तेमाल दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नौसैनिक अभियानों में दुश्मन के जहाजों पर हमला करने के लिए किया जाता था. बाद में कई देशों की नौसेनाओं ने इसी तरह के पानी के नीचे इस्तेमाल होने वाले हथियार डेवलप किए. अमेरिकी नौसेना ने भी 1970 के दशक की शुरुआत में लिम्पेट माइंस का इस्तेमाल किया था.

ईरान के साथ तनाव के दौरान ये चर्चा में क्यों हैं?

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे जियोपॉलिटिकल टेंशन के कारण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. ऐसी खबरें हैं कि कुछ जहाजों को इन माइंस की वजह से नुकसान पहुंचा है, जिससे कमर्शियल शिपिंग और ग्लोबल एनर्जी सप्लाई को लेकर चिंताएं पैदा हो गई हैं. यूरोपीय देशों ने भी इन माइंस को हटाने के काम में मदद देने पर चर्चा की है. हालांकि इस इलाके से गुजरने वाले जहाजों के लिए पानी के नीचे मौजूद इन विस्फोटकों का खतरा अभी भी एक बड़ी टेंशन बना हुआ है.

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लेखक के बारे में

Shariqul Hoda

Shariqul Hoda

न्यूज़ 24 डिजिटल में शारिकुल होदा सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. मुख्य तौर पर वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरें लिखते हैं. शारिकुल ने 2008 में दूरदर्शन में बतौर इंटर्न अपनी शुरुआत की, इसके बाद वह दैनिक जागरण, टीवी टुडे नेटवर्क, जनसंदेश, श्री न्यूज़, भारत खबर, स्पोर्ट्सकीड़ा, WION और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने 3 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव से लेकर देश की बड़ी घटनाओं को कवर किया है. अपने डेढ़ दशक के मीडिया करियर में शारिकुल ने देश की राजनीति, इंटरनेशनल डिप्लोमेसी, खेलकूद से जुड़ी घटनाओं की अच्छी समझ हासिल की है. कितने साल का तजुर्बा: 16 साल शिक्षा: शारिकुल ने बैंगलोर यूनिवर्सिटी (आचार्य इंस्टीट्यूट) से बीए जर्नलिज्म और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (एपीजे इंस्टीट्यूट) से मास्टर्स इन जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की है.
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