चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिका के दौरे पर हैं. उनकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से 24 सितंबर को शिखर वार्ता होनी है. दोनों नेता छह महीने के भीतर दूसरी बार मिल रहे हैं. इस बैठक में ताइवान का मुद्दा भी अहम हो सकता है. रिपोर्टों के मुताबिक, चीन अमेरिका से ताइवान को हथियारों की बिक्री रोकने की मांग कर सकता है और इसके लिए 1982 के अमेरिका-चीन साझा बयान का जिक्र किया जा सकता है.
ताइवान क्या है?
ताइवान पूर्वी एशिया का एक द्वीप है. यहां अपनी सरकार, सेना, चुनाव, मुद्रा और अलग प्रशासन है. ताइवान लोकतांत्रिक तरीके से चलता है. लेकिन चीन इसे अपना हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान की सरकार चीन के मालिकाना हक के दावे को स्वीकार नहीं करता . दुनिया के ज्यादातर देश ताइवान को स्वतंत्र देश के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं देते. यही इसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति को मुश्किल बनाता है.
ताइवान के तीन नाम क्यों हैं?
- रिपब्लिक ऑफ चाइना (ROC): ताइवान में मौजूद सरकार का आधिकारिक नाम है. इसकी शुरुआत 1912 में बनी ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ (चीन गणराज्य) की सरकार से होती है.
- पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC): 1949 में कम्युनिस्ट पार्टी ने मुख्यभूमि चीन में यह सरकार बनाई. आज चीन इसी नाम से जाना जाता है.
- चीनी ताइपे (Chinese Taipei): अंतरराष्ट्रीय खेलों और कुछ संगठनों में ताइवान इसी नाम से हिस्सा लेता है.
चीन-ताइवान विवाद शुरू कैसे हुआ?
विवाद की बड़ी वजह 1940 के दशक का चीनी गृहयुद्ध है. कम्युनिस्ट पार्टी और कुओमिन्तांग के बीच लड़ाई में 1949 में कम्युनिस्ट पार्टी ने मुख्यभूमि चीन पर कब्जा कर लिया. 1 अक्टूबर 1949 को माओ जेदोंग ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना की. कुओमिन्तांग की सरकार ताइवान चली गई और वहां से रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार चलाने लगी. इस तरह दोनों जगह अलग-अलग सरकारें बन गईं. हालांकि ताइवान का इतिहास इससे पुराना है. 1895 में चीन-जापान युद्ध के बाद यह जापान के नियंत्रण में चला गया और करीब 50 साल जापानी शासन में रहा. 1945 में जापान की हार के बाद यहां चीन गणराज्य का प्रशासन स्थापित हुआ.
228 घटना और ‘व्हाइट टेरर’ क्या था?
28 फरवरी 1947 को ताइवान में एक घटना के बाद बड़े विरोध प्रदर्शन हुए. सरकार ने सैन्य कार्रवाई करके इन्हें दबाया. बड़ी संख्या में लोग मारे गए, गिरफ्तार हुए या लापता हुए. इसे 228 घटना कहा जाता है. 1949 के बाद ताइवान में मार्शल लॉ लागू रहा. राजनीतिक विरोध और कम्युनिस्टों के कामों के नाम पर बड़ी संख्या में लोगों पर कार्रवाई हुई. करीब चार दशक के इस दौर को ‘व्हाइट टेरर’ कहा जाता है. 1987 में मार्शल लॉ खत्म हुआ और ताइवान में लोकतंत्र मजबूत होने लगा. 1996 में पहली बार राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता ने किया. 2000 में पहली बार सत्ता एक पार्टी से दूसरी पार्टी के पास गई. 2024 में लाई चिंग-ते राष्ट्रपति चुने गए.
1971 के बाद ताइवान की स्थिति क्यों बदली?
1971 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 2758 पारित किया. इसके बाद संयुक्त राष्ट्र में चीन का प्रतिनिधित्व पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मिला और रिपब्लिक ऑफ चाइना के प्रतिनिधियों को हटा दिया गया. इसके बाद कई देशों ने बीजिंग से राजनयिक संबंध बनाए और ताइवान के औपचारिक राजनयिक संबंध कम होते गए.
‘वन चाइना’ पॉलिसी क्या है?
चीन के अनुसार दुनिया में एक ही चीन है और ताइवान उसका हिस्सा है. बीजिंग एकीकरण की बात करता है और शांतिपूर्ण समाधान को प्राथमिकता देने की बात कहता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग का विकल्प भी खुला रखता है. ताइवान चीन के सर्वोच्च अधिकार के दावे को स्वीकार नहीं करता और कहता है कि उसके भविष्य का फैसला वहां के लोगों को करना चाहिए. 1992 में चीन और ताइवान के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई थी, जिसे बाद में ‘1992 Consensus’ कहा गया. दोनों पक्ष इसकी अलग-अलग व्याख्या करते हैं. 2014 के सनफ्लावर आंदोलन ने भी चीन के साथ संबंधों को लेकर ताइवान में मौजूद बहस को सामने रखा. 2015 में शी जिनपिंग और ताइवान के तत्कालीन राष्ट्रपति मा यिंग-ज्यू की सिंगापुर में मुलाकात हुई, जो 1949 के बाद दोनों पक्षों के शीर्ष नेताओं की पहली सीधी मुलाकात थी.
अमेरिका इस विवाद में क्यों है?
अमेरिका ने 1979 में चीन के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध बनाए और ताइवान के साथ औपचारिक संबंध खत्म किए. फिर भी अमेरिका ने ताइवान के साथ अनौपचारिक संबंध और रक्षा सहयोग जारी रखा. Taiwan Relations Act के तहत अमेरिका ताइवान को अपनी रक्षा के लिए हथियार उपलब्ध कराता है.
यही मुद्दा अब शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप की बातचीत में भी उठ सकता है. 1982 के अमेरिका-चीन संयुक्त बयान में अमेरिका ने ताइवान को हथियारों की बिक्री धीरे-धीरे कम करने की बात कही थी. चीन इसी बात का हवाला देकर हथियारों की बिक्री रोकने की मांग कर सकता है. हालांकि, 1982 में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के निर्देश में हथियारों की बिक्री कम करने की नीति को चीन के शांतिपूर्ण रुख से जोड़ा गया था. यानी विवाद की जड़ तीन बातों में है चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है, ताइवान खुद अपनी सरकार चलाता है और अमेरिका उसके साथ अनौपचारिक संबंध व रक्षा सहयोग बनाए रखता है. इसी वजह से ताइवान आज भी चीन-अमेरिका रिश्तों का सबसे संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है.