इस्लामिक देश होने के बावजूद भी पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तकरार क्यों? किस बात को लेकर है विवाद

इस्लामिक देश होने के बावजूद पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव क्यों बढ़ रहा है? जानिए TTP, तालिबान, डूरंड लाइन, सीमा विवाद, शरणार्थी और 2026 के संघर्ष की पूरी कहानी.

इस्लामिक देश होने के बावजूद भी पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तकरार क्यों? किस बात को लेकर है विवाद

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव में डूरंड लाइन, TTP और सीमा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों की अहम भूमिका है. (Image- AI Generated)

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अफगानिस्तान और पाकिस्तान दोनों ही देशों में बड़ी आबादी में मुस्लिम रहते हैं. दोनों के बीच एक ही धर्म और रीति-रिवाजों को फॉलो करने का रिवाज है, इसके बावजूद पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच रिश्ते किसी दुश्मन देश जैसे हैं. हालात तो इतने बुरे हो गए हैं कि सीमा पर हुए हमलों में कई लोगों की जान जा चुकी है, फिर भी संघर्ष रुकने का नाम नहीं ले रहा है. आखिरी दोनों देश एक-दूसरे के खून के प्यासे क्यों हो गए हैं? आज यह सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच विवाद अब वैश्विक स्तर पर पहुंच गया है. 2025 के बाद से पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर गंभीर संघर्ष हुए हैं और दोनों देशों के बीच 2026 में हवाई हमले और जवाबी कार्रवाई भी देखने को मिली है.

लेकिन आगे की कहानी को समझने से पहले एक बात जरूरी है कि धर्म और रीति-रिवाज एक होना इस बात की गारंटी नहीं है कि दो देशों के बीच कभी दुश्मनी नहीं हो सकती. पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव की जड़ राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा विवाद, आतंकवाद, पश्तून इलाकों की राजनीति, शरणार्थी और व्यापार जैसे मुद्दे हैं.

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डुरंड लाइन- तकरीबन 130 साल पुराना विवाद

दोनों देशों के बीच तनाव की सबसे पुरानी वजहों में से एक है डुरंड लाइन. ब्रिटिश काल के भारत और अफगानिस्तान के बीच 1893 में एक समझौते के तहत यह लाइन खींची गई थी. आज यही लाइन पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा के रूप में मौजूद है. जिसकी लंबाई लगभग 2,640 किलोमीटर हैं. समस्या यह है कि अफगानिस्तान लंबे समय से इस सीमा को लेकर नाराजगी जताता रहा है. इसकी वजह से पश्तून आबादी का दो हिस्सों में बंट गई थी. डुरंड लाइन ने ऐसे इलाकों को अलग कर दिया जहां पश्तून समुदाय लंबे समय से रह रहा था. यानी सीमा विवाद आज का मुद्दा नहीं है यह लगभग 133 साल पुराना मुद्दा है.

Image- National Geographic

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP): आज के तनाव का सबसे बड़ा कारण

अगर आज के पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव को समझना है तो तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP को समझना बहुत जरूरी है. नाम में तालिबान होने के बावजूद TTP और अफगानिस्तान की सत्ता में बैठे तालिबान अलग-अलग संगठन हैं. 2007 में TTP की स्थापना पाकिस्तान में हुई थी. इसका मकसद पाकिस्तान की सरकार और सुरक्षाबलों के खिलाफ लड़ना था. अमेरिकी विदेश विभाग ने TTP को 2010 में विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया था.

पाकिस्तान का कहना है कि TTP अफगानिस्तान में मौजूद ठिकानों से पाकिस्तान पर हमला करता है. इसलिए पाकिस्तान लंबे समय से तालिबान सरकार पर टीटीपी पर कार्रवाई करने का दबाव बनाता रहा है. लेकिन अफगान तालिबान, पाकिस्तान के इन आरोपों को नहीं मानता कि वह जानबूझकर पाकिस्तान के खिलाफ आतंकवादियों को समर्थन दे रहा है.

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कभी दोस्त हुआ करते थे पाकिस्तान और तालिबान

पाकिस्तान और अफगान तालिबान दोनों हमेशा से एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे हैं. 1990 में पाकिस्तान और अफगान तालिबान करीबी रहे थे. काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन (CFR) के मुताबिक, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों ने तालिबान के शुरुआती दौर में उसे समर्थन दिया था और 2001 से पहले तालिबान शासन के साथ सलाहकारों, विशेषज्ञों और सैन्य मदद भी की थी.
2001 में अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान में वॉर ऑन टेरर शुरू हुआ और पाकिस्तान ने अमेरिका का साथ दिया था. इसके बाद पाकिस्तान और तालिबान के संबंध पहले जैसे नहीं रहे. 2021 में जब अमेरिकी और नाटो की आर्मी अफगानिस्तान से वापस चली गईं और तालिबान दोबारा सत्ता में आया, तो पाकिस्तान को शुरुआत में उम्मीद थी कि काबुल में एक ऐसी सरकार होगी जिसके साथ वह आसानी से काम कर सकेगा. लेकिन ऐसा नहीं बिल्कुल नहीं हुआ.

2021 के बाद तनाव तेजी से बढ़ा

2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद पाकिस्तान में TTP से जुड़े हमलों को लेकर चिंता बढ़ी. 2022 के अंत में TTP ने पाकिस्तान सरकार के साथ अपने सीजफायर को खत्म कर दिया और इसके बाद पाकिस्तान में हिंसा बढ़ी. पाकिस्तान का आरोप है कि अगर अफगानिस्तान TTP को पनाह देगा तो वह सीमा पार करके पाकिस्तान में हमले कर सकता है. अफगान तालिबान का जवाब अलग है और वह इन आरोपों को नहीं मानता है. इसलिए दोनों के बीच बातचीत का सबसे बड़ा सवाल यही है कि TTP पर कार्रवाई कौन करेगा और कैसे करेगा?

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पाकिस्तान ने किए हवाई हमले

तनाव तब ज्यादा बढ़ा जब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के अंदर TTP से जुड़े ठिकानों को पर हवाई हमले शुरू किए. फरवरी 2026 में पाकिस्तान के हवाई हमलों के बाद अफगान तालिबान ने जवाबी कार्रवाई की और सीमा पर दोनों देशों की सेनाओं के बीच संघर्ष बढ़ गया. जिसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ा. संयुक्त राष्ट्र के अफगानिस्तान मिशन यानी UNAMA के मुताबिक 26 फरवरी से 5 मार्च 2026 के बीच अफगानिस्तान में सीमा संघर्ष के कारण कम से कम 185 आम नागरिक प्रभावित हुए. इनमें 56 लोगों की मौत और 129 लोग घायल हुए. UNAMA के मुताबिक, इसमें 55 प्रतिशत महिलाएं और बच्चे थे. इससे पहले 21-22 फरवरी को पाकिस्तानी हवाई हमलों के बाद UNAMA ने 13 आम नागरिकों के मारे जाने और 7 के घायल होने की जानकारी दी थी.

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शरणार्थियों ने भी किया रिश्ता खराब

पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान ने अवैध शरणार्थियों के भेजने पर ज्यादा जोर दिया है. यह दोनों देशों के बीच राजनीतिक तनाव का भी हिस्सा बन गया है. संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी UNHCR और IOM के मुताबिक, 22 अगस्त 2026 तक 2026 में अफगानिस्तान लौटने वाले कुल लोगों की संख्या लगभग 11.53 लाख थी. इनमें करीब 6.86 लाख पाकिस्तान से लौटे थे. 2025 के अंत तक भी पाकिस्तान में लगभग 28 लाख से ज्यादा अफगानी मौजूद थे.

दूसरे देशों की भूमिका क्यों है अहम?

पाकिस्तान-अफगानिस्तान विवाद का असर दोनों देशों तक सीमित नहीं रहता. चीन के पाकिस्तान के साथ मजबूत आर्थिक और रक्षा संबंध हैं. वहीं चीन, अफगानिस्तान के साथ भी अपने आर्थिक और सुरक्षा संबंध बना रहा है. भारत ने भी 2021 के बाद अफगानिस्तान के साथ अपने राजनीतिक संबंधों को धीरे-धीरे बढ़ाया है. CFR के मुताबिक, भारत ने 2022 में काबुल में अपना दूतावास फिर से खोला और 2025 में अफगान तालिबान के राजनीतिक प्रतिनिधियों के साथ उच्चस्तरीय बैठक भी हुई. इसलिए अफगानिस्तान-पाकिस्तान विवाद का असर पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ सकता है.

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सैन्य ताकत में कौन ज्यादा पावरफुल?

पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सैन्य ताकत में काफी अंतर है. पाकिस्तान के पास मजबूत सेना और वायुसेना है, जबकि तालिबान के पास आधुनिक वायुसेना नहीं है. ऐसे में पाकिस्तान हवाई हमलों और अपनी पारंपरिक सैन्य ताकत का इस्तेमाल कर सकता है, जबकि तालिबान सीमा पर हमले, ड्रोन और गुरिल्ला तरीके से लड़ाई जैसे विकल्पों पर ज्यादा निर्भर कर सकता है. अल जजीरा से बातचीत में विशेषज्ञों ने भी दोनों पक्षों की सैन्य ताकत में इस अंतर का जिक्र किया था. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि संघर्ष जल्दी खत्म हो जाएगा. अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा का इलाका काफी पहाड़ी और मुश्किल है. यहां लंबे समय से उग्रवादी संगठन और स्थानीय हथियारबंद समूह भी सक्रिय रहे हैं, जिससे संघर्ष लंबा खिंच सकता है.

2026 में कितना गंभीर हो चुका है तनाव?

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव सिर्फ सीमा पर गोलीबारी तक सीमित नहीं रहा. फरवरी, 2026 में पाकिस्तानी हवाई हमलों के बाद अफगानिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की. दोनों तरफ से ड्रोन हमलों और सीमा पर झड़पों की खबरें भी सामने आईं. रॉयटर्स के अनुसार, फरवरी 2026 में अफगानिस्तान ने पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर ड्रोन हमले करने की बात कही थी. मार्च में UNAMA ने नागरिकों के प्रभावित होने की घटनाओं में बढ़ोतरी की पुष्टि की. 21 सितंबर 2026 को रॉयटर्स ने अफगान अधिकारियों के हवाले से बताया कि कुनार और पक्तिका में पाकिस्तानी हवाई हमलों में कम से कम तीन नागरिकों की मौत हुई और चार घायल हुए. पाकिस्तान इन हमलों को आतंकी खतरों के जवाब के तौर पर देखता है, जबकि तालिबान सरकार ने इनकी निंदा की है यानी 2026 में भी दोनों देशों के बीच तनाव एक गंभीर सुरक्षा संकट बना हुआ है.

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आखिर दोनों देशों के बीच तनाव की असली वजह क्या है?

आसान भाषा में समझें तो पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव धर्म की वजह से नहीं, बल्कि सीमा, सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को लेकर है. पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान अपनी जमीन से होने वाले आतंकी हमलों को रोके और TTP जैसे संगठनों पर कार्रवाई करे. वहीं अफगानिस्तान अपनी सीमा से जुड़े मामलों में पाकिस्तान के दबाव को स्वीकार नहीं करना चाहता. इसके अलावा डूरंड लाइन का पुराना विवाद, पश्तून इलाकों का मुद्दा, अफगान शरणार्थियों की वापसी, सीमा बंद होने और व्यापार मार्गों से जुड़े विवाद भी तनाव बढ़ाते हैं. इसलिए इसे सिर्फ दो मुस्लिम देशों की लड़ाई कहना ठीक नहीं. असल विवाद सीमा, आतंकवाद, सुरक्षा, पहचान और दोनों देशों के अलग-अलग राष्ट्रीय हितों से जुड़ा है.

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