भारत में जब चुनाव की बात होती है तो सबसे पहले लोकसभा चुनाव का नाम आता है. लेकिन संसद में सिर्फ लोकसभा ही नहीं है. संसद के दो सदन हैं लोकसभा और राज्यसभा. दोनों की भूमिका अलग है और दोनों के सदस्यों को चुनने का तरीका भी अलग है. लोकसभा में जनता सीधे अपने क्षेत्र के उम्मीदवार को वोट देती है. जिस उम्मीदवार को उस क्षेत्र में सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वह सांसद बनता है. दूसरी ओर राज्यसभा के ज्यादातर सदस्यों को आम जनता सीधे वोट नहीं देती. उन्हें राज्यों की विधानसभा के चुने हुए विधायक चुनते हैं.
यही अंतर लोकसभा और राज्यसभा के चुनाव को एक-दूसरे से अलग बनाता है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि चुनाव की शुरुआत कहां से होती है, उम्मीदवार कैसे मैदान में आता है, वोट कैसे पड़ते हैं, वोटों की गिनती कैसे होती है और आखिर सांसद कैसे चुना जाता है.
सबसे पहले समझिए संसद में क्या होता है
भारत की संसद में राष्ट्रपति के साथ दो सदन होते हैं लोकसभा और राज्यसभा. संविधान के अनुच्छेद 79 में संसद की यही व्यवस्था दी गई है. लोकसभा को आम तौर पर जनता का सदन और राज्यसभा को राज्यों की परिषद कहा जाता है. लोकसभा में देश के अलग-अलग इलाकों से चुने हुए प्रतिनिधि आते हैं. राज्यसभा में राज्यों और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों(Union Territories) का प्रतिनिधित्व होता है. दोनों सदनों के सांसद संसद में कानून बनाने, सरकार के काम पर चर्चा करने और देश से जुड़े बड़े मुद्दों पर अपनी बात रखने में भूमिका निभाते हैं. हालांकि दोनों सदनों के चुनाव का तरीका अलग है.
लोकसभा चुनाव में जनता सीधे सांसद चुनती है
लोकसभा चुनाव को समझने का सबसे आसान तरीका है कि इसे अपने इलाके के चुनाव की तरह देखें. देश को अलग-अलग लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में बांटा गया है. हर निर्वाचन क्षेत्र से एक लोकसभा सदस्य चुना जाता है. निर्वाचन आयोग के अनुसार लोकसभा के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होते हैं और प्रत्येक संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से एक सदस्य चुना जाता है. मतलब अगर आप किसी लोकसभा क्षेत्र के मतदाता हैं, तो आप उसी क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों में से किसी एक को वोट देते हैं.
- यह वोट सीधे उस उम्मीदवार के खाते में जाता है.
- सबसे ज्यादा वोट वाला उम्मीदवार जीतता है
- लोकसभा चुनाव में First-Past-The-Post यानी FPTP व्यवस्था लागू होती है.
- नाम थोड़ा मुश्किल है, लेकिन इसका मतलब बहुत आसान है.
जिस उम्मीदवार को बाकी उम्मीदवारों के मुकाबले सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वह चुनाव जीत जाता है. उसे 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिलना जरूरी नहीं है.
उदाहरण के लिए किसी सीट पर पांच उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं. मान लीजिए किसी उम्मीदवार को 40 प्रतिशत वोट मिले और बाकी चार उम्मीदवारों को उससे कम वोट मिले. ऐसी स्थिति में 40 प्रतिशत वोट पाने वाला उम्मीदवार जीत सकता है. इसलिए लोकसभा चुनाव में सवाल यह नहीं होता कि उम्मीदवार को कुल वोटों का आधे से ज्यादा हिस्सा मिला या नहीं. सवाल यह होता है कि उस निर्वाचन क्षेत्र में सबसे ज्यादा वोट किसे मिले.
लोकसभा चुनाव की शुरुआत कैसे होती है?
लोकसभा का सामान्य कार्यकाल पांच साल का होता है. संविधान के अनुसार सामान्य स्थिति में लोकसभा अपने पहले सत्र की तारीख से पांच साल तक रहती है. हालांकि इसे पांच साल पूरे होने से पहले भी भंग किया जा सकता है. चुनाव का समय आने पर निर्वाचन आयोग चुनाव कार्यक्रम जारी करता है. इस कार्यक्रम में अलग-अलग तारीखें होती हैं. जैसे नामांकन कब शुरू होगा, नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख क्या होगी, नामांकन की जांच कब होगी, उम्मीदवार कब तक अपना नाम वापस ले सकता है, मतदान कब होगा और वोटों की गिनती किस दिन होगी. इसके बाद चुनाव की औपचारिक प्रक्रिया शुरू होती है.
उम्मीदवार चुनाव कैसे लड़ता है?
चुनाव लड़ने के लिए सबसे पहले उम्मीदवार को नामांकन दाखिल करना पड़ता है. लोकसभा चुनाव के लिए निर्वाचन आयोग का Form 2A नामांकन पत्र इस्तेमाल होता है. उम्मीदवार को चुनाव से जुड़े जरूरी दस्तावेज और हलफनामा भी देना होता है. हलफनामे में उम्मीदवार से जुड़ी कई जानकारियां दी जाती हैं. मतदाता इन जानकारियों को निर्वाचन आयोग के Candidate Affidavit Portal के जरिए देख सकते हैं.
नामांकन दाखिल करने के बाद यह मान लेना सही नहीं है कि उम्मीदवार अब सीधे चुनाव लड़ सकता है.
- अगला चरण होता है नामांकन पत्रों की जांच.
- नामांकन की जांच में क्या होता है?
- नामांकन की जांच को स्क्रूटनी कहा जाता है.
इस दौरान रिटर्निंग ऑफिसर उम्मीदवार के नामांकन पत्र और उससे जुड़े दस्तावेजों को नियमों के हिसाब से देखता है. अगर नामांकन में ऐसी कमी है जिसके कारण उम्मीदवार चुनाव लड़ने के योग्य नहीं है, तो नियमों के अनुसार नामांकन खारिज हो सकता है. इसके बाद उम्मीदवारों को नाम वापस लेने का मौका मिलता है. नाम वापस लेने की आखिरी तारीख खत्म होने के बाद चुनाव मैदान में बचे उम्मीदवारों की अंतिम सूची तैयार होती है. यहीं से यह साफ हो जाता है कि किसी सीट पर आखिर कितने उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं.
फिर शुरू होता है चुनाव प्रचार
अंतिम उम्मीदवारों की सूची आने के बाद प्रचार का दौर शुरू होता है. राजनीतिक दल और उम्मीदवार मतदाताओं के बीच जाकर अपने मुद्दे और योजनाएं बताते हैं. सभाएं, रैलियां, बैठकें और दूसरे प्रचार माध्यमों का इस्तेमाल किया जाता है. चुनाव के दौरान उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग के नियमों का पालन करना होता है. चुनाव आयोग चुनाव प्रबंधन, निगरानी, पर्यवेक्षकों, खर्च और कई दूसरी व्यवस्थाओं पर नजर रखता है. इसके बाद आती है मतदान की तारीख.
मतदान केंद्र पर वोट कैसे डाला जाता है?
मतदाता को वोट डालने के लिए सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि उसका नाम मतदाता सूची में दर्ज है या नहीं. निर्वाचन आयोग की व्यवस्था के तहत मतदाता अपना मतदान केंद्र ऑनलाइन या Voter Helpline जैसे माध्यमों से पता कर सकता है. मतदान केंद्र पर पहुंचने के बाद चुनाव कर्मचारी मतदाता का नाम मतदाता सूची में देखते हैं और उसकी पहचान की जांच करते हैं. इसके बाद उंगली पर स्याही लगाई जाती है और निर्धारित प्रक्रिया पूरी की जाती है. फिर मतदाता को वोट डालने के लिए EVM तक भेजा जाता है. EVM पर उम्मीदवारों के नाम और चुनाव चिह्न होते हैं. मतदाता जिस उम्मीदवार को वोट देना चाहता है, उसके सामने दिए गए बटन को दबाता है.
VVPAT क्या होता है और इसका काम क्या है?
EVM के साथ VVPAT भी चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा है. VVPAT का पूरा नाम Voter Verifiable Paper Audit Trail है. जब मतदाता EVM पर बटन दबाता है तो VVPAT की खिड़की में एक पेपर स्लिप कुछ समय के लिए दिखाई देती है. इस पर उम्मीदवार का नाम, क्रम संख्या और चुनाव चिह्न दिखाई देता है. इसके बाद यह स्लिप मशीन के अंदर सुरक्षित बॉक्स में चली जाती है. इसका उद्देश्य मतदाता को यह देखने का मौका देना है कि उसका वोट किस उम्मीदवार के लिए दर्ज हुआ है.
अगर किसी को कोई उम्मीदवार पसंद नहीं हो तो?
ऐसी स्थिति में मतदाता के पास NOTA का विकल्प होता है. NOTA का मतलब है None of the Above, यानी इनमें से कोई नहीं. अगर मतदाता किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं देना चाहता तो वह EVM पर NOTA का विकल्प चुन सकता है. इससे यह दर्ज होता है कि मतदाता ने उपलब्ध उम्मीदवारों में से किसी को नहीं चुना.
मतदान खत्म होने के बाद क्या होता है?
मतदान खत्म होने के बाद EVM और VVPAT को निर्धारित सुरक्षा प्रक्रिया के तहत सुरक्षित रखा जाता है. फिर तय तारीख पर मतगणना होती है. मतगणना केंद्र पर वोटों की गिनती की जाती है. उम्मीदवारों के प्रतिनिधि भी निर्धारित नियमों के तहत मतगणना प्रक्रिया में मौजूद रह सकते हैं. हर निर्वाचन क्षेत्र में उम्मीदवारों को मिले वोटों की संख्या सामने आती है. अंत में जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, उसे उस लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित घोषित किया जाता है. यानी लोकसभा चुनाव में पूरी प्रक्रिया का सबसे अहम हिस्सा यह है कि जनता अपने क्षेत्र के उम्मीदवार को सीधे वोट देती है और सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार सांसद बनता है.
अब समझिए राज्यसभा का चुनाव
राज्यसभा का चुनाव लोकसभा से बिल्कुल अलग तरीके से होता है. सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि राज्यसभा एक स्थायी सदन है. इसका मतलब यह है कि राज्यसभा को लोकसभा की तरह भंग नहीं किया जाता. राज्यसभा के सदस्य छह साल के लिए चुने जाते हैं. लगभग एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में अपना कार्यकाल पूरा करते हैं. उनकी जगह नई नियुक्ति या चुनाव की प्रक्रिया होती है. इसी वजह से राज्यसभा के लिए पूरे देश में एक साथ चुनाव नहीं होता. किसी राज्य की जितनी सीटों पर सदस्यों का कार्यकाल पूरा होने वाला होता है, वहां उन सीटों को भरने के लिए चुनाव कराया जाता है.
राज्यसभा के सांसद को कौन चुनता है?
यही वह जगह है जहां लोकसभा और राज्यसभा चुनाव का सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है. राज्यसभा के निर्वाचित सदस्यों को उस राज्य की विधानसभा के निर्वाचित विधायक चुनते हैं. आम मतदाता राज्यसभा उम्मीदवार को सीधे वोट नहीं देता. मतदाता पहले विधानसभा चुनाव में विधायक चुनता है. बाद में वही निर्वाचित विधायक राज्यसभा चुनाव में अपने राज्य के उम्मीदवारों के लिए वोट करते हैं. संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार राज्यसभा के निर्वाचित सदस्यों का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व यानी Proportional Representation की व्यवस्था के तहत Single Transferable Vote यानी एकल संक्रमणीय मत से होता है.
Single Transferable Vote क्या होता है?
नाम सुनने में यह मुश्किल लगता है, लेकिन इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है. मान लीजिए किसी राज्य में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव हो रहा है. विधायक के पास एक वोट होता है, लेकिन वह उम्मीदवारों के लिए अपनी पसंद का क्रम बता सकता है.
- वह किसी उम्मीदवार के सामने 1 लिखता है. इसका मतलब है—पहली पसंद.
- दूसरे उम्मीदवार के सामने 2 लिख सकता है. इसका मतलब है—दूसरी पसंद.
- तीसरे के सामने 3 लिख सकता है. इसका मतलब है—तीसरी पसंद.
- इस तरह एक विधायक अपनी पसंद का क्रम बताता है.
राज्यसभा चुनाव में यही व्यवस्था Single Transferable Vote कहलाती है.
राज्यसभा में सिर्फ पहली पसंद क्यों नहीं देखी जाती?
यहीं से राज्यसभा चुनाव की गिनती थोड़ी अलग हो जाती है. मान लीजिए किसी उम्मीदवार को जीतने के लिए जितने वोट चाहिए, उससे ज्यादा वोट मिल गए. तब उसके कुछ वोट जरूरत से ज्यादा हो सकते हैं. दूसरी स्थिति यह हो सकती है कि कोई उम्मीदवार इतना पीछे रह जाए कि उसके जीतने की संभावना ही न बचे. ऐसी परिस्थितियों में चुनाव के नियमों के अनुसार वोट अगली पसंद वाले उम्मीदवार तक पहुंच सकते हैं. इसी कारण इसे एकल संक्रमणीय मत कहा जाता है. राज्यसभा के आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार वोट का ट्रांसफर उम्मीदवार के जरूरत से ज्यादा वोट पाने या किसी उम्मीदवार के आगे बढ़ने की स्थिति में नहीं रहने जैसी परिस्थितियों में होता है.
राज्यसभा में जीतने के लिए कितने वोट चाहिए?
राज्यसभा चुनाव में एक निश्चित कोटा होता है. कोटा का मतलब है किसी उम्मीदवार को निर्वाचित होने के लिए कितने वोटों की जरूरत है. यह संख्या इस बात पर निर्भर करती है कि कितनी सीटों पर चुनाव हो रहा है और कितने वैध वोट हैं. मतगणना के दौरान पहले उम्मीदवारों को उनकी पहली पसंद के वोट मिलते हैं. अगर कोई उम्मीदवार जरूरी कोटा हासिल कर लेता है, तो वह निर्वाचित हो जाता है. इसके बाद अगर किसी उम्मीदवार के पास जरूरत से ज्यादा वोट हैं या कोई उम्मीदवार आगे नहीं जा सकता, तो नियमों के मुताबिक अगली पसंद के वोटों का ट्रांसफर किया जा सकता है. इसलिए राज्यसभा की मतगणना सिर्फ यह देखने की प्रक्रिया नहीं है कि किसे सबसे ज्यादा वोट मिले. इसमें उम्मीदवारों की पसंद और वोटों के ट्रांसफर का भी हिसाब रखा जाता है.
राज्यसभा चुनाव में विधायक अपनी पसंद कैसे बताता है?
राज्यसभा चुनाव में विधायक उम्मीदवारों के सामने 1, 2, 3 और आगे के अंक लगाकर अपनी पसंद बताते हैं.
- 1 का मतलब पहली पसंद होता है.
- 2 का मतलब दूसरी पसंद.
- 3 का मतलब तीसरी पसंद.
जरूरी नहीं कि विधायक सभी उम्मीदवारों के सामने नंबर लिखे. वह अपनी पसंद के उम्मीदवारों के सामने प्राथमिकता दर्ज करता है. वोट को वैध रखने के लिए निर्धारित तरीके से प्राथमिकता अंकित करना जरूरी होता है.
राज्यसभा में ओपन बैलेट क्या है?
राज्यसभा चुनाव में ओपन बैलेट की व्यवस्था है. इसका मतलब यह नहीं है कि आम जनता विधायक का वोट देख सकती है. इस व्यवस्था में राजनीतिक दल के अधिकृत एजेंट को यह देखने की अनुमति होती है कि उसके दल के विधायक ने अपना वोट किस तरह चिह्नित किया है. इसके लिए चुनाव नियमों में अलग प्रक्रिया दी गई है. इस व्यवस्था का उद्देश्य राज्यसभा चुनाव में पार्टी के विधायकों के मतदान से जुड़ी पारदर्शिता बनाए रखना है.
क्या राज्यसभा की सभी सीटों पर चुनाव होता है?
नहीं… राज्यसभा में कुछ सदस्य निर्वाचित होते हैं और 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं. संविधान के अनुसार इन मनोनीत सदस्यों को साहित्य, विज्ञान, कला और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले लोगों में से चुना जाता है. राज्यसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 250 हो सकती है. निर्वाचन आयोग के अनुसार वर्तमान व्यवस्था में राज्यसभा की संख्या 245 है, जिसमें 233 निर्वाचित और 12 मनोनीत सदस्य हैं.
लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए कितनी उम्र होनी चाहिए?
लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार की उम्र कम से कम 25 साल होनी चाहिए. राज्यसभा के लिए न्यूनतम उम्र 30 साल है. लेकिन सिर्फ उम्र पूरी होना ही काफी नहीं है. उम्मीदवार को चुनाव कानूनों में दी गई दूसरी जरूरी योग्यताएं भी पूरी करनी होती हैं और किसी कानूनी अयोग्यता के तहत नहीं आना चाहिए.
लोकसभा और राज्यसभा का चुनाव एक साथ क्यों नहीं होता?
लोकसभा और राज्यसभा की प्रकृति अलग है. लोकसभा का सामान्य कार्यकाल पांच साल है और विशेष परिस्थितियों में इसे पहले भी भंग किया जा सकता है. राज्यसभा को भंग नहीं किया जाता. इसके सदस्य छह साल के लिए चुने जाते हैं और हर दो साल में लगभग एक-तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं. इसलिए राज्यसभा की सीटों के चुनाव अलग-अलग समय पर होते रहते हैं. यही कारण है कि जब लोकसभा का आम चुनाव हो रहा होता है, तब जरूरी नहीं कि उसी समय सभी राज्यसभा सीटों के लिए भी चुनाव हो.
चुनाव आयोग की पूरी प्रक्रिया में क्या भूमिका है?
भारत में संसद के चुनाव कराने की जिम्मेदारी भारत निर्वाचन आयोग यानी Election Commission of India की है. आयोग लोकसभा और राज्यसभा चुनावों के साथ-साथ विधानसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव भी कराता है. चुनाव आयोग की जिम्मेदारी सिर्फ मतदान कराने तक सीमित नहीं है. चुनाव कार्यक्रम तय करना, मतदाता सूची से जुड़ी व्यवस्था, नामांकन प्रक्रिया, चुनाव अधिकारियों की तैनाती, पर्यवेक्षकों की नियुक्ति, मतदान केंद्रों की व्यवस्था, मतगणना और चुनाव से जुड़े नियमों की निगरानी भी चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा है. आयोग मतदाताओं को चुनाव प्रक्रिया समझाने के लिए जागरूकता कार्यक्रम भी चलाता है. इसका प्रमुख कार्यक्रम SVEEP यानी Systematic Voters’ Education and Electoral Participation है.
चुनाव में मतदाता सूची इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
वोट डालने के लिए सिर्फ वोटर आईडी कार्ड होना ही पर्याप्त नहीं है. सबसे जरूरी बात यह है कि मतदाता का नाम संबंधित मतदाता सूची में होना चाहिए. निर्वाचन आयोग मतदाताओं को अपनी जानकारी और मतदान केंद्र की जानकारी जांचने की सुविधा देता है. मतदाता अपने मतदान केंद्र की जानकारी निर्वाचन आयोग की वेबसाइट या Voter Helpline के जरिए देख सकता है. इसलिए चुनाव से पहले मतदाता के लिए यह जांच लेना जरूरी होता है कि उसका नाम मतदाता सूची में है और जानकारी सही है.
अगर किसी सीट पर उम्मीदवार सिर्फ एक हो तो क्या होता है?
हर चुनाव में यह जरूरी नहीं कि अंतिम समय तक कई उम्मीदवार मैदान में रहें. अगर नामांकन वापस लेने की प्रक्रिया के बाद किसी सीट पर केवल एक वैध उम्मीदवार बचता है और नियमों के अनुसार मतदान की जरूरत नहीं रहती, तो उस उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित किया जा सकता है. ऐसी स्थिति में मतदाताओं को वोट डालने की जरूरत नहीं पड़ती. यह व्यवस्था लोकसभा और राज्यसभा दोनों तरह के चुनावों में लागू होने वाली चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है, हालांकि वास्तविक स्थिति संबंधित चुनाव और नियमों पर निर्भर करती है.
चुनाव परिणाम कैसे तय होता है?
लोकसभा में परिणाम समझना अपेक्षाकृत आसान है. एक सीट पर जितने उम्मीदवारों को वोट मिले, उनकी गिनती होती है. सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार विजेता घोषित होता है. राज्यसभा में प्रक्रिया अलग है. यहां पहली पसंद के वोटों से गिनती शुरू होती है. उम्मीदवारों को जरूरी कोटा हासिल करना होता है. जरूरत पड़ने पर वोट अगली पसंद वाले उम्मीदवारों को ट्रांसफर किए जाते हैं. यह प्रक्रिया तब तक चल सकती है, जब तक उपलब्ध सीटों के लिए जरूरी उम्मीदवार निर्वाचित न हो जाएं.