11 अक्टूबर को लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती है. यह वही नाम है, जिसकी आवाज पर 1970 के दशक में बिहार से ऐसा आंदोलन उठा, जिसने देश की राजनीति को हिलाकर रख दिया और आगे चलकर सत्ता परिवर्तन की राह बनाई. ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा देने वाले जेपी ने छात्रों के गुस्से को भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ एक बड़े जनआंदोलन में बदल दिया था. अब उनकी जयंती से ठीक एक दिन पहले, 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन ने चुनावी प्रक्रिया और लोकतंत्र में जनता की आवाज को लेकर नई बहस छेड़ दी है. मुद्दे और हालात भले ही अलग हों, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम के बीच जेपी का आंदोलन फिर याद किया जा रहा है. आखिर कैसे बिहार से शुरू हुई एक छात्र-आवाज देशव्यापी आंदोलन बनी और उसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी?
कौन थे लोकनायक जयप्रकाश नारायण?
जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को बिहार के सिताब दियारा में हुआ था. स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के बाद वह समाजवादी राजनीति से जुड़े. आजादी के बाद उन्होंने सत्ता की राजनीति से दूरी बनाकर सामाजिक बदलाव पर ध्यान दिया. हालांकि, 1970 के दशक में छात्रों के आंदोलन ने उन्हें फिर सक्रिय जनआंदोलन के केंद्र में ला दिया.
बिहार से शुरू हुआ आंदोलन कैसे बना राष्ट्रीय मुद्दा?
मार्च 1974 में बिहार के छात्र महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं के खिलाफ सड़कों पर उतरे. 18 मार्च को पटना में बिहार विधानसभा के घेराव के दौरान स्थिति तनावपूर्ण हो गई और पुलिस कार्रवाई तथा हिंसा की खबरें सामने आईं. आंदोलन से जुड़े छात्र नेताओं ने जेपी से नेतृत्व करने की अपील की. जेपी ने आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया, लेकिन उसे अहिंसक और राजनीतिक दल राजनीति से दूर रखने पर जोर दिया. 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में उन्होंने ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया . इसका उद्देश्य केवल सरकार बदलना नहीं, बल्कि राजनीति, शिक्षा, समाज और प्रशासन में सकारात्मक बदलाव लाना था. आंदोलन में अलग-अलग विचारधाराओं वाले विपक्षी दल भी शामिल हुए.
संपूर्ण क्रांति से आपातकाल तक
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के 1971 के चुनाव को चुनावी गड़बड़ियों के आधार पर अवैध घोषित किया. इसके बाद राजनीतिक संकट और गहरा गया. 25 जून 1975 की रात देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया. इस दौरान विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं और प्रेस तथा नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए. जेपी ने आपातकाल का विरोध किया और विपक्षी दलों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई. मार्च 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी की सरकार बनी. यह केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी. जेपी खुद प्रधानमंत्री नहीं बने, लेकिन विपक्षी एकता और आंदोलन के प्रमुख प्रेरक बने रहे.
जेपी जयंती से पहले दिल्ली में CJP प्रदर्शन की चर्चा क्यों?
10 अक्टूबर 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन का ऐलान किया. पार्टी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे उठाए. दिल्ली में प्रदर्शन से पहले सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई और पुलिस ने प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी. प्रदर्शन से संबंधित आरोपों और चुनावी प्रक्रिया पर उठाए गए सवालों को उनके दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए; उन्हें अपने आप में साबित तथ्य नहीं माना जा सकता. जेपी आंदोलन और CJP प्रदर्शन के बीच सीधी समानता खींचना सही नहीं होगा. 1974 का आंदोलन महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ छात्र आंदोलन के रूप में शुरू हुआ था, जो बाद में क्रांतिकारी राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की मांग में बदल गया. वहीं, CJP का हालिया प्रदर्शन चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े सवालों पर केंद्रित है. दोनों का आधार और पैमाना अलग हैं.
जेपी की विरासत आज भी क्यों सटीक है?
लोकनायक जेपी की जयंती केवल एक ऐतिहासिक नेता को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि लोकतंत्र, जवाबदेही और शांतिपूर्ण जनभागीदारी पर विचार करने का भी मौका है. उनके आंदोलन का इतिहास बताता है कि जन असंतोष किस तरह क्रांतिकारी राजनीतिक बदलाव का रूप ले सकता है. हालांकि, किसी भी नए प्रदर्शन का प्रभाव उसके मुद्दों, जनसमर्थन, नेतृत्व और आगे की घटनाओं पर निर्भर करता है.