पूरी दुनिया खासकर एशिया और विकासशील देशों में Gen-Z खूब सुर्खियों में हैं और हर देश की राजनीति का केंद्र बिंदु बनते जा रहे हैं. हाल ही के वर्षों में Gen-Z स्टूडेंट्स और नौजवान सरकारों को चुनौती देते दिखे. कहीं सत्ता परिवर्तन कराया तो कहीं मांगें मनवाकर सरकार को अपने कदमों में झुकाया. Gen-Z स्टूडेंट्स प्रोटेस्ट का सिलसिला श्रीलंका से शुरू हुआ और म्यामांर, बांग्लादेश, नेपाल, भारत होते हुए फ्रांस तक पहुंचा. खास बात यह है कि युवाओं के नेतृत्व वाले Gen-Z प्रदर्शन किसी एक चेहरे के मोहताज नहीं होते. इन्हें कोई एक लीडर कंट्रोल नहीं करता. इसलिए सरकार-पुलिस के लिए टॉप लीडरशिप को गिरफ्तार करके आंदोलन को कुचलना नामुमकिन हो जाता है.
नेपाल और बांग्लादेश में तख्तापलट करके चौंकाया
वहीं Gen-Z युवा विपक्षी दलों पर भी भरोसा नहीं करते हैं और न ही किसी का मोहरा बनना पसंद करते हैं. बल्कि अपनी आवाज खुद उठाते हैं, अपने हक की लड़ाई खुद लड़ते हैं. नेपाल और बांग्लादेश में Gen-Z ने किस तरह तख्तापलट किया, पूरी दुनिया ने देखा. भारत में कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले दिल्ली के जंतर-मंतर पर Gen-Z युवाओं ने जिस तरह एक महीना अपने हक की लड़ाई लड़ी और सरकार को हिला दिया. धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया. और अब भारत के Gen-Z युवा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR को रद्द करने की मांग को लेकर सड़कों पर हैं, पूरी दुनिया देख रही है.
बांग्लादेश में Gen-Z ने गिराई शेख हसीना की सरकार
साल 2024 में बांग्लादेश में Gen-Z युवाओं ने ऐसा हिंसक आंदोलन छेड़ा कि शेख हसीना की सरकार का पतन हो गया. इस आंदोलन को कोटा सुधार आंदोलन कहा गया था, क्योंकि सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन सिस्टम के खिलाफ आंदोलन छेड़ा गया था. 5 जून 2024 को बांग्लादेश हाई कोर्ट ने साल 2018 में दिए गए उस फैसले को रद्द कर दिया था, जिसमें सरकारी नौकरियों से रिजर्वेशन सिस्टम को हटा दिया गया था. साथ ही 1971 की जंग के स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों के लिए 56 प्रतिशत आरक्षण को बहाल किया था. इस फैसले का विरोध करते हुए Gen-Z युवाओं ने जुलाई 2024 में ढाका यूनिवर्सिटी में शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए.
15-16 जुलाई 2024 को प्रदर्शनकारी छात्रों का पुलिस ने दमन किया, जिससे आंदोलन पूरे देश में फैल गया और सुरक्षाबलों की कार्रवाई में कई छात्रों की मौत हुई. हिंसक छात्र आंदोलन को देखते हुए 21 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण को 5 प्रतिशत घटा दिया, लेकिन तब तक छात्र आंदोलन सरकार विरोधी असहयोग आंदोलन बन चुका था. विद्रोह और हिंसा के चलते 5 अगस्त 2024 को प्रधानमंत्री शेख हसीना को पद से इस्तीफा देना पड़ा और उनकी 15 साल पुरानी सरकार का पतन हो गया. इतना ही नहीं, हिंसा के कारण हालात ऐसे हो गए कि शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा और भारत में शरण लेनी पड़ी. वहीं बांग्लादेश में तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हो चुका है.
नेपाल में Gen-Z ने केपी ओली सरकार का पतन किया
बांग्लादेश की तरह नेपाल में Gen-Z युवाओं ने हिंसक आंदोलन करके केपी शर्मा ओली की सरकार का पतन किया और उन्हें भी देश छोड़कर भागना पड़ा था. उसके बाद नेपाल में पहले 6 महीने अंतरिम सरकार ने काम किया और फिर आम चुनाव कराकर बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार बनाई गई. हुआ यूं कि 4 सितंबर 2025 को नेपाल की ओली सरकार ने 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बैन कर दिए थे. इससे Gen-Z युवा भड़क गए और सरकार के फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू किए. इन प्रदर्शनों की आड़ में युवाओं ने बढ़ती बेरोजगारी और आर्थिक बदहाली के मुद्दे भी उठाए. सरकारी अधिकारियों और नेताओं पर भाई-भतीजावादा, भ्रष्टाचार और सरकारी पैसे के दुरुपयोग के आरोप लगाए.
छात्रों ने जोर-शोर के साथ सड़कों पर उतरकर जोर-शोर से सरकार विरोधी प्रदर्शन किया, जिसका पुलिस ने दमन किया. 8-9 सितंबर 2025 को प्रदर्शनकारी छात्रों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प हुई, जिसमें कई स्टूडेंट्स मारे गए. स्टूडेंट्स ने सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों को घर में घुसकर पीटा था. वहीं आगजनी करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री के घर को आग लगा दी गई थी, जिसमें उनकी पत्नी की मौत हो गई थी. हिंसक आंदोलन और दबाव के चलते सरकार को सोशल मीडिया पर लगे प्रतिबंध वापस लेने पड़े और उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा. उनके कई मंत्रियों ने भी इस्तीफा दिया और नई सरकार ने मृतकों के परिवारों को सरकारी नौकरी और आर्थिक सहायता देने का ऐलान किया.
भारत में Gen-Z ने धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा कराया
बांग्लादेश और नेपाल के हिंसक आंदोलनों को लोग भूले नहीं थे कि भारत में Gen-Z युवाओं ने आंदोलन छेड़ दिया. 3 मई 2026 को नीट पेपर लीक हुआ, जिसके विरोध में कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले देशभर के छात्रों ने जंतर-मंतर पर धरना दिया. छात्रों ने सरकार पर धांधली का आरोप लगाते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा और 6 जून को आंदोलन शुरू किया. करीब एक महीना चले धरने का नेतृत्व अभिजीत दीपके ने किया. इसी धरने पर सांसद चंद्रशेखर आजाद और सोशलिस्ट सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल की.
लेकिन दिल्ली पुलिस ने 20 दिन की भूख हड़ताल के बाद जंतर-मंतर से जबरन सोनम वांगचुक को उठाया और अस्पताल में भर्ती कराया. इस बीच 20 जुलाई को छात्रों ने जंतर-मंतर से संसद की ओर कूच किया, लेकिन दिल्ली पुलिस ने उन्हें रास्ते में ही रोका, लेकिन प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई. लाठीचार्ज करके, पैलेट गन और आंसू गैस के गोले छोड़कर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया. हिंसक प्रदर्शन को देखते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पद से इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह प्रह्लाद जोशी को नया शिक्षा मंत्री बनाया गया. इस घटनाक्रम को छात्रों की बहुत बड़ी जीत बताया गया.
फ्रांस में Gen-Z आंदोलन के आगे झुकी मैक्रों सरकार
ताजा Gen-Z प्रोटेस्ट और हिंसक विरोध प्रदर्शन फ्रांस में हुआ, जिसने 1968 के फ्रांसीसी छात्र आंदोलन की यादें ताजा कर दी. बदहाल शिक्षा व्यवस्था, स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और शिक्षा क्षेत्र के लिए बजट कटौती के खिलाफ छात्रों ने आंदोलन छेड़ा, जो पेरिस से निकलकर 40 से ज्यादा शहरों में फैल गया है. इस आंदोलन की खास बात यह रही कि पुलिस ने हिंसा और आगनजी कर रहे 6500 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें 87% नाबालिग यानी 18 वर्ष से कम उम्र के छात्र थे. 17 सितंबर 2026 को पेरिस के कस्बे ‘क्रेते’ के लिशे सेंट-एक्सुपेरी हाई स्कूल में आंदोलन की चिंगारी भड़की थी, क्योंकि इस स्कूल के छात्र काफी समय से बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे थे.
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों बजट घाटे को पाटने के लिए शिक्षा क्षेत्र के खर्चों में कटौती कर दी थी. प्रदर्शनकारी छात्रों ने स्कूल-कॉलेजों की कचरे के डिब्बों और बैरिकेड्स से नाकेबंदी कर दी. 1000 से ज्यादा हाई स्कूलों और 30 यूनिवर्सिटी बंद कर दी. कई शहरों में छात्रों के विरोध प्रदर्शन उग्र हुए और पुलिस पर पथराव किया गया. आगजनी करके वाहनों को फूंका गया. उग्र प्रदर्शनकारियों को कंट्रोल करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले दागे और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया. विपक्षी दल, शिक्षक संगठनों और छात्र यूनियनों ने आंदोलन का खुला समर्थन किया. हिंसा और दबाव के चलते फ्रांस की मैक्रों सरकार को झुकना पड़ा और 3000 शिक्षकों को नियुक्त करने का ऐलान किया. लेकिन राष्ट्रीय छात्र संघ ने 10 अरब यूरो के विशेष पैकेज की मांग करते हुए आंदोलन जारी रखने की घोषणा की.