51 साल बाद भी संगीत की दुनिया में जिंदा हैं एसडी बर्मन, 'खोया-खोया चांद' से 'रूप तेरा मस्ताना' तक, हर दौर पर भारी पड़ा उनका जादू

महान संगीतकार एसडी बर्मन को दुनिया से गए 51 साल हो गए, लेकिन उनके गीत आज भी लोकप्रिय हैं. जानिए ‘गाइड’, ‘प्यासा’ और ‘आराधना’ के सदाबहार संगीत की कहानी.

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महान संगीतकार एसडी बर्मन ने ‘गाइड’, ‘प्यासा’ और ‘आराधना’ जैसी फिल्मों को यादगार संगीत दिया

हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी धुनें समय के साथ पुरानी नहीं होतीं, बल्कि हर नई पीढ़ी के दिल में अपनी जगह बनाती रहती हैं. ऐसे ही महान संगीतकार थे सचिन देव बर्मन, जिन्हें दुनिया एसडी बर्मन के नाम से जानती है. 31 अक्टूबर 1975 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था. लेकिन उनके निधन के 51 साल बाद भी उनकी संगीत विरासत उतनी ही लोकप्रिय है, जितनी उनके दौर में हुआ करती थी.

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चांदनी रात का जिक्र हो तो ‘खोया-खोया चांद’ याद आता है. अधूरे प्यार का दर्द महसूस करना हो तो ‘दिन ढल जाए, हाय रात न जाए’ दिल को छू जाता है. रोमांस में मस्ती का रंग चाहिए तो ‘रूप तेरा मस्ताना’ सुनाई देता है और शास्त्रीय संगीत की मिठास तलाशने वालों के लिए ‘पूछो ना कैसे मैंने’ आज भी खास है. इन तमाम सदाबहार गीतों के पीछे एक ही नाम है—एसडी बर्मन.

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तीन दशक का सफर, संगीत की हर विधा में दिखाई दी महारत

एसडी बर्मन का संगीत किसी एक शैली तक सीमित नहीं था. उन्होंने हिंदी फिल्मों में लोक संगीत, शास्त्रीय संगीत, बंगाली लोकधुनों और आधुनिक संगीत का ऐसा मेल तैयार किया, जिसने फिल्मी संगीत को नई पहचान दी. उनकी सबसे बड़ी खासियत थी कि वह गीत की कहानी, उसके भाव और फिल्म के दृश्य को ध्यान में रखकर धुन तैयार करते थे. यही वजह है कि उनके गीत केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि फिल्म के किरदारों और परिस्थितियों को महसूस करने का माध्यम भी बन जाते थे.

बंगाल की लोकधुनों से हिंदी सिनेमा को बनाया समृद्ध

एसडी बर्मन की संगीत रचनाओं में बंगाल की लोक परंपरा की गहरी छाप दिखाई देती है. उन्होंने बंगाली बाउल संगीत और नाविकों के भटियाली गीतों से प्रेरणा लेकर कई यादगार धुनें तैयार कीं. फिल्म ‘प्यासा’ का गीत ‘आज सजन मोहे अंग लगा लो’, ‘सुजाता’ का ‘सुन मेरे बंधु रे’ और फिल्म ‘गाइड’ का ‘वहां कौन है तेरा’ इसके बेहतरीन उदाहरण हैं. इन गीतों में लोक संगीत की सादगी, मिट्टी की खुशबू और मानवीय भावनाओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है.

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विजय आनंद के साथ बनी यादगार संगीत की जोड़ी

फिल्मकार विजय आनंद और एसडी बर्मन की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई अविस्मरणीय गीत दिए. विजय आनंद अपने निर्देशन में गीतों के फिल्मांकन को बेहद महत्व देते थे. फिल्म ‘तेरे घर के सामने’ का गीत ‘दिल का भंवर करे पुकार’ आज भी अपनी खूबसूरत धुन और कुतुब मीनार में फिल्माए गए अनोखे दृश्य के लिए याद किया जाता है.

वहीं फिल्म ‘गाइड’ का संगीत इस जोड़ी की रचनात्मकता का शानदार उदाहरण है. खासकर ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’ गीत में वहीदा रहमान के किरदार रोजी की आजादी और आत्मविश्वास को बेहद खूबसूरती से दिखाया गया है. चित्तौड़गढ़ किले की पृष्ठभूमि में फिल्माया गया यह गीत एक ऐसी महिला की नई शुरुआत का प्रतीक बन गया, जो अपने पति की उपेक्षा और दबाव से निकलकर अपनी जिंदगी खुद जीने का फैसला करती है. इसके बाद फिल्म ‘ज्वेल थीफ’ में ‘होंठों में ऐसी बात’ ने संगीत और नृत्य का ऐसा संगम पेश किया, जिसे आज भी याद किया जाता है. वैजयंतीमाला के शानदार नृत्य और एसडी बर्मन की लोक संगीत से प्रभावित धुन ने इस गीत को खास बना दिया.

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गुलजार के पहले गीत को लेकर बिमल रॉय से हुई थी बहस

एसडी बर्मन संगीत के मामले में बेहद अनुशासित और बारीकियों पर ध्यान देने वाले कलाकार थे. बताया जाता है कि फिल्म ‘बंदिनी’ के गीत ‘मोरा गोरा अंग लइ ले’ के फिल्मांकन को लेकर उनका निर्देशक बिमल रॉय से मतभेद हो गया था. इस गीत को युवा गीतकार गुलजार ने लिखा था. एसडी बर्मन चाहते थे कि इसे खुले वातावरण में फिल्माया जाए, जबकि शुरुआत में बिमल रॉय इसके लिए तैयार नहीं थे. बाद में दोनों के बीच सहमति बनी और नूतन पर फिल्माए गए इस गीत को एक आंगन में शूट किया गया. यह गीत आज भी हिंदी फिल्म संगीत के सबसे खूबसूरत गीतों में गिना जाता है.

साहिर लुधियानवी और गुरु दत्त के साथ यादगार सफर

एसडी बर्मन और मशहूर गीतकार साहिर लुधियानवी की जोड़ी ने फिल्म ‘प्यासा’ में कई यादगार गीत दिए. हालांकि, बाद में दोनों के बीच मतभेद हो गए और उन्होंने साथ काम करना बंद कर दिया. इसी तरह निर्देशक गुरु दत्त के साथ एसडी बर्मन की शुरुआत फिल्म ‘बाजी’ से हुई थी. दोनों ने कई सफल फिल्मों में साथ काम किया. फिल्म ‘कागज के फूल’ इस रचनात्मक साझेदारी की आखिरी फिल्म साबित हुई.

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‘आराधना’ से ‘अभिमान’ तक बदलते दौर में भी कायम रहा जादू

समय के साथ हिंदी सिनेमा में नए निर्देशक और संगीतकार सामने आने लगे. लेकिन एसडी बर्मन ने बदलते दौर के साथ खुद को भी बदला. शक्ति सामंत की फिल्म ‘आराधना’ उनके करियर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनी. इस फिल्म के संगीत में उनके बेटे राहुल देव बर्मन यानी आरडी बर्मन का भी महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है. इसके बाद ‘प्रेम पुजारी’ और ‘तेरे मेरे सपने’ जैसी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया. निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी के साथ उनकी जोड़ी ने भी कई यादगार संगीत रचनाएं दीं. फिल्म ‘अभिमान’ का संगीत हिंदी सिनेमा में एक मील का पत्थर साबित हुआ. इसके बाद ‘मिली’ और ‘चुपके-चुपके’ जैसी फिल्मों में भी उनके संगीत का जादू देखने को मिला.

बेटे आरडी बर्मन के साथ भी जारी रखा संगीत का सफर

एसडी बर्मन की एक और खासियत थी कि उम्र बढ़ने के बावजूद उनका संगीत के प्रति जुनून कभी कम नहीं हुआ. अपने बेटे आरडी बर्मन के साथ भी उन्होंने काम किया और बदलते संगीत के दौर में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी. उनकी संगीत यात्रा ने यह साबित किया कि महान कलाकार किसी एक दौर के मोहताज नहीं होते. 51 साल बाद भी एसडी बर्मन के गीत रेडियो, टीवी, संगीत कार्यक्रमों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सुने जाते हैं. ‘खोया-खोया चांद’, ‘दिन ढल जाए’, ‘रूप तेरा मस्ताना’ और ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’ जैसे गीत उनकी अमर विरासत हैं. सचिन देव बर्मन भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी धुनों में उनकी मौजूदगी हमेशा महसूस होती रहेगी.

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