विदेश में अब महंगी होगी पढ़ाई! कमजोर रुपया बढ़ाएगा पढ़ने का खर्च, एजुकेशन लोन की EMI पर भी पड़ सकता है असर

विदेश में पढ़ाई की योजना बना रहे भारतीय परिवारों पर फीस और रहने के खर्च का बोझ बढ़ सकता है. रुपये की विनिमय दर में 1 प्रतिशत बदलाव से 50 लाख रुपये के बजट पर करीब 50 हजार रुपये का अंतर पड़ सकता है. जानिए एजुकेशन लोन और फीस के भुगतान की योजना बनाते समय किन बातों का ध्यान रखें.

Rupee vs Dollar

विदेश में पढ़ाई के लिए बच्चों को भेजने की तैयारी कर रहे भारतीय परिवारों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. रुपये की कमजोरी के कारण विदेशी यूनिवर्सिटी की फीस चुकाने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं. वहीं, ब्याज दरें बढ़ने पर एजुकेशन लोन भी महंगा हो सकता है. ऐसे में परिवारों पर फीस, रहने और दूसरे खर्चों का आर्थिक बोझ बढ़ने की आशंका है.n रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले सप्ताह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रेपो रेट 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.5 प्रतिशत कर दिया और अपनी ब्याज दरों की नीति का रुख ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ कर दिया. महंगाई की चिंता के बीच उठाए गए इस कदम का असर कर्ज की लागत पर पड़ सकता है. हालांकि, भविष्य में ब्याज दरें और बढ़ेंगी या नहीं, यह आर्थिक हालात और महंगाई के आंकड़ों पर निर्भर करेगा.

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कमजोर रुपये से कितना बढ़ सकता है खर्च?

रुपये का डॉलर के मुकाबले 95 के स्तर से ऊपर बने रहना विदेश में पढ़ाई का खर्च बढ़ा सकता है. जब रुपया कमजोर होता है, तो डॉलर में तय फीस चुकाने के लिए ज्यादा भारतीय रुपये खर्च करने पड़ते हैं. इसका असर ट्यूशन फीस, हॉस्टल, किराया और रोजमर्रा के खर्चों पर भी पड़ सकता है. पृथ्वी एक्सचेंज के मैनेजिंग डायरेक्टर पवन कुमार कवाद के मुताबिक, रुपये में हालिया सुधार विदेश में पढ़ाई का खर्च जुटाने वाले परिवारों के लिए राहत की बात है. हालांकि, उन्हें यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि रुपया आगे भी लगातार मजबूत होगा. उनके अनुसार, अगर कोई परिवार विदेश में पढ़ाई के लिए करीब 50 लाख रुपये का बजट बनाता है, तो डॉलर के रेट में 1 प्रतिशत का बदलाव करीब 50,000 रुपये का अंतर पैदा कर सकता है. 2 प्रतिशत बदलाव पर यह अंतर 1 लाख रुपये और 3 प्रतिशत बदलाव पर करीब 1.5 लाख रुपये हो सकता है. वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि रुपये की कीमत किस दिशा में बदलती है और भुगतान के समय करेंसी का रेट क्या रहता है.

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क्या एजुकेशन लोन भी महंगा होगा?

रेपो रेट बढ़ने का असर एजुकेशन लोन की ब्याज दरों पर भी पड़ सकता है. बैंक और दूसरे कर्जदाता अपनी दरें बढ़ा सकते हैं, लेकिन यह लोन के बेंचमार्क, ब्याज रेट में बदलाव की शर्तों और संबंधित बैंक की नीति पर निर्भर करता है. फ्लोटिंग ब्याज रेट वाले लोन लेने वालों की ब्याज लागत बढ़ सकती है, जिससे उनकी मासिक किस्त या कुल भुगतान पर असर पड़ सकता है. नए कर्ज लेने वालों को मिलने वाली ब्याज रेट भी अलग-अलग बैंकों और उनकी शर्तों के हिसाब से तय होगी. इस तरह परिवारों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. कमजोर रुपये से विदेशी फीस के लिए ज्यादा रकम जुटानी होगी, जबकि महंगा लोन कई साल तक भुगतान का बोझ बढ़ा सकता है.

क्या फीस पहले ही जमा कर देना सही रहेगा?

पवन कुमार कवाद के मुताबिक, अगर यूनिवर्सिटी फीस पहले जमा करने पर छूट देती है या परिवार भुगतान के लिए मौजूदा विनिमय दर(Exchange Rate) तय करना चाहता है, तो एडवांस भुगतान एक विकल्प हो सकता है. हालांकि, ऐसा करने से पहले परिवारों को रहने-खाने के खर्च, अचानक आने वाली मुसीबत और दूसरी जरूरतों के लिए पर्याप्त पैसा बचाकर रखना चाहिए. अगर फीस पहले भरने के लिए ज्यादा कर्ज लेना पड़े या जरूरी बचत खत्म हो जाए, तो यह फैसला नुकसानदेह भी हो सकता है. बड़े और पहले से तय भुगतान के लिए परिवार रजिस्टर्ड डीलरों के माध्यम से फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट का विकल्प भी देख सकते हैं. इसके जरिए भविष्य में होने वाले भुगतान के लिए विनिमय दर पहले से तय की जा सकती है. हालांकि, इस सुविधा की लागत और शर्तों को समझना जरूरी है.

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रुपये की चाल किन बातों पर निर्भर करेगी?

‘पवन कुमार कवाद के अनुसार, अगले 6 से 12 महीनों में रुपये की दिशा कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेशकों के पैसे के आने-जाने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की चाल जैसी बातों पर निर्भर करेगी’. ऐसे में विदेश में पढ़ाई की योजना बना रहे परिवारों को यह मानकर बजट नहीं बनाना चाहिए कि रुपया जरूर मजबूत होगा. फीस की तारीखों के अनुसार विदेशी मुद्रा खरीदने और पूरे खर्च को अलग-अलग चरणों में बांटने से जोखिम संभालने में मदद मिल सकती है.

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