देश के मशहूर चाय ब्रांड ‘वाघ बकरी टी ग्रुप’ के चेयरमैन पीयूषभाई देसाई का 15 सितंबर को 86 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. ग्रुप ने एक बयान जारी कर उनके निधन की जानकारी दी. छह दशक से भी ज्यादा समय तक चाय के कारोबार से जुड़े रहे पीयूषभाई ने इस स्थानीय ब्रांड को गुजरात की सीमाओं से बाहर निकालकर देश के कई राज्यों में घर-घर तक पहुंचाने में सबसे अहम भूमिका निभाई थी. उन्हें चाय के कारोबार की बेहद गहरी समझ थी. भारतीय चाय उद्योग में उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए साल 2026 की शुरुआत में नॉर्थ ईस्टर्न टी एसोसिएशन (NETA) ने उन्हें प्रतिष्ठित ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया था.
गुजरात से निकलकर 30 देशों तक फैलाया कारोबार
पीयूषभाई देसाई ने वाघ बकरी ब्रांड को केवल गुजरात तक सीमित नहीं रहने दिया. अपनी दूरदर्शी सोच और कुशल नेतृत्व से उन्होंने इसे देश के कई राज्यों और दुनिया के 30 से अधिक देशों के बाजारों तक पहुंचाया. उनके नेतृत्व में कंपनी ने अपनी पुरानी परंपराओं और आधुनिक बिजनेस रणनीति का ऐसा बेहतरीन तालमेल बनाया कि वाघ बकरी समूह का सालाना टर्नओवर 2,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया.
गांधीवादी सोच और सादगी भरा जीवन
पीयूषभाई देसाई ने चाय के व्यापार को सिर्फ मुनाफे तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे गांधीवादी मूल्यों, परोपकार और सामाजिक जिम्मेदारी से भी जोड़ा. गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति सुदर्शन अयंगर के अनुसार, देसाई परिवार का गांधीजी से जुड़ाव पीयूषभाई के दादा के समय से था, जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी से मुलाकात की थी. इसी पारिवारिक संबंध के चलते पीयूषभाई ने गांधीजी के ‘ट्रस्टीशिप’ के सिद्धांत को अपनाया और बेहद सादगी से जीवन जीते हुए हमेशा जरूरतमंदों की मदद की.
‘वाघ बकरी’ नाम के पीछे का खास संदेश
सुदर्शन अयंगर ने बताया कि पीयूषभाई ‘वाघ बकरी’ नाम के पीछे का एक गहरा अर्थ बताते थे. उनका कहना था कि ऐसी जगह जहां ‘बाघ’ और ‘बकरी’ एक साथ पानी पी सकें, वह एक अहिंसक और समरस समाज का प्रतीक है. अपने ब्रांड के जरिए वे असल में इसी अहिंसा के संदेश को आगे बढ़ा रहे थे.
चाय उद्योग के कई बड़े संगठनों की रखी नींव
पीयूषभाई सिर्फ एक सफल कारोबारी ही नहीं, बल्कि चाय उद्योग के मजबूत स्तंभ थे. वह गुजरात टी ट्रेडर्स एसोसिएशन (GTTA), वेस्टर्न इंडिया टी डीलर्स एसोसिएशन (WITDA) और फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया टी ट्रेडर्स एसोसिएशन्स (FAITTA) के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे. इसके अलावा, उन्होंने साल 1998 से 2002 तक भारतीय चाय बोर्ड के सदस्य के रूप में भी अपनी अहम सेवाएं दीं.
साहित्य और समाज सेवा में बड़ा योगदान
व्यापारिक व्यस्तताओं के बावजूद पीयूषभाई हमेशा सामाजिक कार्यों में आगे रहे. पीयूषभाई गुजरात विद्यापीठ से गहराई से जुड़े रहे और गांधीवादी विचारों से जुड़ी पहलों में योगदान दिया. उन्होंने नारायण देसाई के साथ मिलकर ‘अनुवाद फाउंडेशन’ की स्थापना की, जिसका मकसद महात्मा गांधी की रचनाओं और महादेवभाई देसाई की डायरी का अनुवाद करना था. इसके अलावा, वह 2016 से 2020 तक ‘ब्लाइंड पीपल्स एसोसिएशन’ (BPA) के अध्यक्ष भी रहे. संस्था के महासचिव भूषण पुनानी ने उन्हें एक महान इंसान और परोपकारी बताया.
हिंसा के खिलाफ उठाई थी आवाज
साल 2002 के गुजरात दंगों के दौरान पीयूषभाई कॉरपोरेट जगत की उन चुनिंदा आवाजों में शामिल थे, जिन्होंने खुलकर हिंसा के खिलाफ बात की. उनका मानना था कि हिंसा पूरे समाज की नाकामी है. उन्होंने शांति मार्च में भी हिस्सा लिया और सरकार की गलतियों पर भी हमेशा अहिंसक तरीके से अपनी बात रखी.