स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) क्लेम लेने वालों के लिए एक बेहद राहत भरी खबर आई है. अक्सर बीमा कंपनियां पहले से बीमारी होने (Pre-existing Disease) या बीमारी छिपाने का बहाना बनाकर मरीजों का मेडिकल क्लेम खारिज कर देती हैं. लेकिन अब उपभोक्ता अदालत (Consumer Court) ने इस पर एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है.
सेंट्रल जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने साफ कर दिया है कि बीपी (हाई ब्लड प्रेशर), शुगर (डायबिटीज), जोड़ों का दर्द और सिरदर्द जैसी आम बीमारियों के आधार पर कोई भी बीमा कंपनी आपका क्लेम खारिज नहीं कर सकती है.
उपभोक्ता अदालत ने फैसले में क्या कहा?
आयोग की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज की आधुनिक जीवनशैली और तनावभरी जिंदगी में बीपी, मधुमेह, जोड़ों का दर्द या सिरदर्द होना बेहद आम बात है. इन्हें रोग छिपाना या गंभीर पूर्व बीमारी नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने साफ किया कि अगर बीमा कंपनी क्लेम खारिज करना चाहती है, तो यह साबित करने की जिम्मेदारी कंपनी की होगी कि ग्राहक को पॉलिसी लेते समय बीमारी की पक्की जानकारी थी और उसने जानबूझकर इसे छिपाया था. केवल कयास या मनगढ़ंत तर्कों के आधार पर क्लेम नहीं रोका जा सकता.
क्या था पूरा मामला?
दिल्ली के रोहिणी इलाके में रहने वाले 65 वर्षीय बुजुर्ग यशपाल बहल ने साल 2019 में चोलामंडलम एमएस जनरल इंश्योरेंस कंपनी से 7.5 लाख का हेल्थ इंश्योरेंस लिया था. जुलाई 2021 में इलाज के दौरान उनका कुल खर्च करीब 4.71 लाख रुपये आया. जब उन्होंने क्लेम जमा किया, तो बीमा कंपनी ने यह कहते हुए क्लेम खारिज कर दिया कि मरीज को पिछले 4 साल से हाई बीपी था और उन्होंने यह बात पॉलिसी लेते समय छिपाई थी. बाद में कंपनी ने उनकी पॉलिसी भी कैंसिल कर दी.
जब मामला उपभोक्ता अदालत पहुंचा, तो बीमा कंपनी मरीज के 4 साल पुराने बीपी का कोई भी मेडिकल रिकॉर्ड, डॉक्टर की पर्ची या जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश नहीं कर सकी.
कोर्ट का फैसला: ब्याज और मुआवजे के साथ मिलेगा पैसा
अदालत ने बीमा कंपनी की इस हरकत को सरासर गलत और सेवा में कमी माना. आयोग ने चोलामंडलम एमएस जनरल इंश्योरेंस कंपनी को ये आदेश दिए:
4.71 लाख का भुगतान करें और इसके साथ 6% सालाना ब्याज भी चुकाई जाए.
मानसिक प्रताड़ना का मुआवजा भी देने को कहा. पीड़ित को हुई परेशानी के लिए 25000 का मुआवजा दिया जाए.
अदालत ने मुकदमा खर्च भी देने को कहा. कोर्ट ने कहा कि कानूनी लड़ाई में हुए खर्च के रूप में 15000 अलग से दिए जाएं.
कैंसल की गई बीमा पॉलिसी को भी गलत ठहराते हुए उसे बहाल करने का निर्देश दिया.