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Fuel Pricing Decoding: कैसे तय होती है पेट्रोल-डीजल की कीमत? समझिए टैक्स, OMCs के घाटे और ऑयल बॉन्ड का पूरा गणित

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कैसे तय होती हैं, यहां पूरा गणित समझ‍िए। राज्यों के VAT से लेकर OMCs के ₹30,000 करोड़ के घाटे और हॉर्मुज़ संकट के बीच कैसे तय होते हैं तेल के दाम, जानें।

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भारत में जब भी पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ती या घटती हैं, तो आम तौर पर इसे केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) के दामों से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन असलियत इससे कहीं अधिक जटिल है। भारत में ईंधन की अंतिम खुदरा कीमत (Retail Price) केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करती, बल्कि यह केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी, राज्यों के टैक्स (VAT), तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की लागत और वैश्विक ऊर्जा संकटों के बीच संतुलन साधने का एक मल्टी-लेयर फाइनेंशियल मॉडल है।

हाल ही में तेल कंपनियों द्वारा 10 दिनों के भीतर लगातार तीन बार (15 मई को ₹3, 19 मई को 87 पैसे/91 पैसे और आज 23 मई को फिर से 87 पैसे/91 पैसे) की गई बढ़ोतरी ने इस पूरे सिस्टम को समझने की जरूरत को एक बार फिर सामने ला दिया है।

राज्यों के टैक्स (VAT) का खेल: क्यों अलग-अलग राज्यों में अलग हैं रेट्स?

केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाने वाला उत्पाद शुल्क (Excise Duty) पूरे देश में एक समान रहता है, लेकिन आपके शहर के पेट्रोल पंप पर दिखने वाली कीमत इस बात से तय होती है कि आपकी राज्य सरकार उस पर कितना वैट (VAT) और सेस वसूल रही है। यही कारण है कि देश के अलग-अलग कोनों में कीमतों में बड़ा अंतर दिखाई देता है:

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    पेट्रोल की कीमत (₹/लीटर)
    आंध्र प्रदेश : ₹117.8
    तेलंगाना: ₹115.7
    केरल: ₹112.3
    मध्य प्रदेश: ₹111.4
    पश्चिम बंगाल: ₹109.8
    महाराष्ट्र: ₹108.5
    कर्नाटक: ₹107.7
    तमिलनाडु: ₹105.6
    दिल्ली / उत्तर प्रदेश: ₹99.5
    गुजरात: ₹96.1

    स्पष्ट अंतर: जिन राज्यों में स्थानीय वैट (VAT) की दरें अधिक हैं, वहां पेट्रोल की कीमतें ₹112 से ₹118 प्रति लीटर के करीब पहुंच चुकी हैं, जबकि कम टैक्स वाले राज्यों में यह आंकड़ा ₹100 के आसपास या उससे नीचे बना हुआ है।

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    2021 से 2026: वैश्विक झटके और ईंधन कीमतों में बड़े बदलाव

    साल 2022 का रूस-यूक्रेन युद्ध हो या साल 2026 का हालिया हॉर्मुज जलडमरूमध्य संकट (Hormuz Crisis), अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड कई बार $100 प्रति बैरल के पार जा चुका है। इन वैश्विक झटकों के बीच घरेलू कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए पिछले 5 वर्षों में कई बड़े नीतिगत हस्तक्षेप (Interventions) किए गए:

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      4 नवंबर 2021: पेट्रोल ₹5 और डीजल ₹10 सस्ता किया गया।

      21 मई 2022: एक्साइज ड्यूटी घटने से पेट्रोल ₹8 और डीजल ₹6 कम हुआ।

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      14 मार्च 2024: दोनों में ₹2-₹2 प्रति लीटर की कटौती।

      अप्रैल 2025: कीमतों में एक बार फिर ₹2-₹2 प्रति लीटर की राहत।

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      27 मार्च 2026: सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए पेट्रोल और डीजल पर ₹10-₹10 की भारी एक्साइज ड्यूटी घटाई (डीजल पर एक्साइज शून्य कर दिया गया)।

      मई 2026 (ताजा संशोधन): कच्चे तेल के दबाव में 15 मई को ₹3, 19 मई को पेट्रोल ₹0.87/डीजल ₹0.91 और आज 23 मई को फिर से पेट्रोल ₹0.87/डीजल ₹0.91 की बढ़ोतरी की गई।

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      तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव: 30,000 करोड़ का नुकसान

      2026 के हॉर्मुज संकट के दौरान जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं, तब भारतीय तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) ने घरेलू बाजार में कीमतों को तुरंत नहीं बढ़ाया। इस 84 दिनों के संकट काल में कंपनियों ने पेट्रोल पर लगभग ₹24 प्रति लीटर और डीजल पर ₹30 प्रति लीटर तक का भारी बोझ खुद उठाया।

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        इसके परिणामस्वरूप तेल कंपनियों को भारी अंडर-रिकवरी (नुकसान) का सामना करना पड़ा, जिससे सरकारी और OMCs का कुल वित्तीय नुकसान लगभग ₹30,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

        यही कारण था कि 27 मार्च 2026 को केंद्र सरकार ने टैक्स तो घटाया और डीजल पर निर्यात शुल्क (Export Duty) भी लगाया, लेकिन उसका मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं के लिए कीमत घटाना नहीं, बल्कि तेल कंपनियों के इस ₹30,000 करोड़ के भारी घाटे को कम करना और घरेलू सप्लाई सुरक्षित करना था।

        टैक्स कट नीति बनाम ऑयल बॉन्ड मॉडल: नीतिगत अंतर
        ईंधन की कीमतों को मैनेज करने के लिए भारत में दो अलग-अलग आर्थिक मॉडल देखे गए हैं:

          ऑयल बॉन्ड मॉडल (UPA सरकार): साल 2005 से 2010 के बीच तत्कालीन सरकार ने आम जनता पर कीमतों का बोझ टालने के लिए करीब ₹1.34 लाख करोड़ रुपये के ऑयल बॉन्ड जारी किए थे। यह एक तरह का कर्ज था, जिसे मौजूदा सरकार आज भी ब्याज सहित चुका रही है।

          टैक्स कट मॉडल (मौजूदा नीति): इसके विपरीत, वर्तमान सरकार भविष्य पर कर्ज टालने के बजाय सीधे अपने टैक्स (एक्साइज ड्यूटी) को घटाकर उपभोक्ताओं को राहत देने या कंपनियों के घाटे को पाटने की नीति पर काम करती है, जिसका सीधा और तत्काल असर सरकारी राजस्व (Revenue) पर पड़ता है।

          भारत का फ्यूल प्राइसिंग सिस्टम एक बेहद संवेदनशील वित्तीय संतुलन पर टिका है। केंद्र का टैक्स, राज्यों का वैट और तेल कंपनियों की अंडर-रिकवरी मिलकर यह तय करते हैं कि आपकी गाड़ी में जाने वाला ईंधन किस रेट पर मिलेगा। यही कारण है कि केंद्र द्वारा टैक्स में कटौती किए जाने के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय बाजार की अनिश्चितताओं और कंपनियों के पुराने नुकसान की भरपाई के चलते पंप पर तुरंत बड़ी राहत नहीं मिल पाती और कीमतों में उतार-चढ़ाव का यह सिलसिला लगातार जारी रहता है।

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