अगर आप भारत में घर बैठे अमेरिका, ब्रिटेन या किसी भी विदेशी क्लाइंट के लिए काम करते हैं और आपकी फीस डॉलर, पाउंड या यूरो में आती है, तो यह खबर आपके काम की है. अब तक विदेशी क्लाइंट से काम के बदले सिर्फ बैंक में पैसा आ जाना ही काफी था, लेकिन 1 अक्टूबर 2026 से नियम बदल चुके हैं. रिजर्व बैंक और फेमा (FEMA) के तहत सर्विस एक्सपोर्ट के लिए एक्सपोर्ट डिक्लेरेशन फॉर्म (EDF) की नई व्यवस्था लागू कर दी गई है.
सबसे पहले समझें: क्या होता है सर्विस एक्सपोर्ट?
मान लीजिए कि आप दिल्ली या जयपुर में बैठकर अमेरिका की किसी कंपनी के लिए वेबसाइट डिजाइन करते हैं, सॉफ्टवेयर बनाते हैं या डिजिटल मार्केटिंग करते हैं. आपने विदेश में कोई सामान (Goods) नहीं भेजा, लेकिन अपनी सर्विस (सेवा) दी और उसके बदले आपको $2,000 मिले. इसी को सर्विस एक्सपोर्ट कहा जाता है.
क्या बदल गया?
अब 1 अक्टूबर से सर्विस एक्सपोर्ट को भी EDF (Export Declaration Form) सिस्टम के दायरे में ले आया गया है. अब आपको यह साफ बताना होगा कि आपने किस क्लाइंट के लिए काम किया, क्या सर्विस दी, आपका इनवॉइस (बिल) कितने का था और बैंक में कितना पैसा आया. जिस महीने आप विदेशी क्लाइंट को इनवॉइस जारी करेंगे, उस महीने के खत्म होने के 30 दिनों के भीतर EDF डिक्लेरेशन देनी होगी.
उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि अगर आपने अक्टूबर 2026 में बिल भेजा है, तो उसकी डिक्लेरेशन जमा करने की आखिरी तारीख 30 नवंबर 2026 होगी.
किस-किस पर पड़ेगा इस नियम का असर?
यह नया नियम सीधे तौर पर उन सभी लोगों को प्रभावित करेगा जो विदेश में अपनी सेवाएं देते हैं.
- फ्रीलांसर्स (वेब डेवलपर, कंटेंट राइटर, डिजाइनर)
- आईटी और सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स
- कंसल्टेंट्स और बिजनेस एडवाइजर्स
- डिजिटल मार्केटिंग एजेंसियां
आपको क्या संभालकर रखना होगा?
अब आपको अपने पास इनवॉइस (Invoice), क्लाइंट कॉन्ट्रैक्ट या एग्रीमेंट, सर्विस की जानकारी, पेमेंट स्लिप और बैंक स्टेटमेंट का सही रिकॉर्ड रखना बहुत जरूरी होगा.
यूट्यूबर्स और इंफ्लुएंसर्स का क्या होगा?
कई यूट्यूबर्स के मन में यह सवाल है कि क्या उनकी एडसेंस (AdSense) की कमाई पर भी यह नियम लागू होगा? तो आपको बता दें कि हर पेमेंट सर्विस एक्सपोर्ट नहीं होती. अगर आपने किसी विदेशी ब्रांड या कंपनी के लिए अलग से कोई स्पॉन्सरशिप या सर्विस दी है, तो वह सर्विस एक्सपोर्ट मानी जा सकती है.
यूट्यूब से मिलने वाली एडसेंस इनकम या एफिलिएट मार्केटिंग का मामला थोड़ा अलग हो सकता है. यह इस बात पर निर्भर करेगा कि पैसा किस माध्यम से और किस कैटेगरी में आ रहा है. इसलिए हर डिजिटल क्रिएटर पर यह नियम सीधे लागू नहीं होता.
क्या यह कोई नया टैक्स है?
नहीं, यह कोई नया टैक्स नहीं है. यह इनकम टैक्स का मामला न होकर FEMA (Foreign Exchange Management Act) और फॉरेन एक्सचेंज रिपोर्टिंग से जुड़ा मामला है. आपकी यह जानकारी बैंकों (Authorized Dealers) के जरिए EDPMS (Export Data Processing and Monitoring System) पोर्टल पर दर्ज होती है.
आपकी डॉलर में कमाई पहले की तरह जारी रहेगी और टैक्स के नियम भी पुराने ही रहेंगे, बस अब बैंक को यह साबित करने के लिए सही कागज (Invoices) दिखाने होंगे कि विदेश से आया पैसा किस काम के बदले मिला है.
हालांकि घबराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है. अगर आपका काम लीगल है और आप सही तरीके से इनवॉइस बनाकर काम करते हैं, तो आपको बस अपने बिल और बैंक स्टेटमेंट्स को एक फाइल में व्यवस्थित रखना शुरू करना होगा.