25 दिनों में 2,000 घरों की दहलीज पर मिलीं दर्द और संघर्ष की अनगिनत कहानियां, हर घर की अपनी एक दास्तां

समाजसेवी पार्थ गौतम के ‘हर घर दिवाली’ अभियान के तहत 25 दिनों में 2,000 परिवारों तक पहुंचने का लक्ष्य पूरा हुआ. इस दौरान टीम ने जरूरतमंद परिवारों की परेशानियों को समझा और स्वास्थ्य, शिक्षा व आर्थिक सहायता पहुंचाने का प्रयास किया.

Parth Gautam

पार्थ गौतम और उनकी टीम 'हर घर दिवाली' अभियान के दौरान जरूरतमंद परिवारों से मुलाकात करते हुए.

किसी के लिए दिवाली नए कपड़े, मिठाइयों और रोशनी का त्योहार है, तो किसी के लिए जिंदगी की मुश्किलों के बीच एक सामान्य दिन. समाजसेवी पार्थ गौतम के ‘हर घर दिवाली’ अभियान के दौरान 25 दिनों में 2,000 परिवारों तक पहुंचने का संकल्प पूरा हुआ, लेकिन इन 25 दिनों का सफर सिर्फ एक लक्ष्य हासिल करने तक सीमित नहीं रहा. इस दौरान टीम को ऐसी कई कहानियां देखने और सुनने को मिलीं, जिन्होंने गरीबी, बीमारी, बेबसी और सामाजिक असमानता की उन सच्चाइयों से रूबरू कराया, जिन्हें महसूस करना भी आसान नहीं था.

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अभियान के दौरान कहीं एक ऐसा व्यक्ति मिला, जिसका आधा शरीर बुरी तरह झुलस चुका था और जो आज भी उस हादसे के दर्द के साथ जिंदगी जीने को मजबूर था. कहीं गंभीर बीमारी के कारण किसी का चेहरा बुरी तरह सूज गया था, जिससे उसकी सामान्य जिंदगी प्रभावित हो रही थी. किसी घर में बच्चों की पढ़ाई आर्थिक तंगी के कारण रुक गई थी, तो कहीं परिवार के पास सिर छिपाने के लिए पक्की छत तक नहीं थी. बारिश के दिनों में घर की छत न होने के कारण परिवार को भीगते हुए रात गुजारनी पड़ती थी. किसी के संघर्ष की वजह पैसों की कमी थी, तो कोई बीमारी और मुश्किल हालात में इसलिए टूट रहा था क्योंकि उसके पास मदद के लिए कोई अपना सहारा नहीं था.

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इनमें से गंभीर रूप से झुलसे लोगों की स्थिति देखकर पार्थ गौतम ने इलाज के लिए हरसंभव मदद का भरोसा दिया. उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर बरेली, दिल्ली ही नहीं, बल्कि विदेश के सर्वश्रेष्ठ अस्पतालों तक में इलाज कराने का प्रयास किया जाएगा, ताकि पीड़ित को बेहतर चिकित्सा और राहत मिल सके. इसी तरह का एक मामला पिछले वर्ष भी ‘हर घर दिवाली’ अभियान के दौरान सामने आया था, जब एक महिला का आधा चेहरा रसोई में हुए हादसे में बुरी तरह झुलस गया था. हादसे के बाद महिला और उसका परिवार गहरे संकट से गुजर रहा था. पार्थ गौतम ने उस समय भी परिवार को इलाज में हरसंभव सहयोग का भरोसा दिया और आगे बढ़कर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के प्रयास किए. पार्थ गौतम के निरंतर प्रयासों और कई चरणों में हुई प्लास्टिक सर्जरी के बाद आज उस महिला की स्थिति पहले से काफी बेहतर बताई जा रही है. यह मामला दिखाता है कि समय पर मिला सहयोग और लगातार साथ किसी व्यक्ति के जीवन में नई उम्मीद जगा सकता है.

इन कहानियों में सबसे मुश्किल बात सिर्फ लोगों की परेशानियां देखना नहीं थी, बल्कि यह समझना था कि कई परिवार रोजमर्रा की जिंदगी में कितनी बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. किसी के लिए इलाज कराना एक बड़ी लड़ाई थी, किसी के लिए बच्चों को पढ़ाना एक अधूरा सपना, तो किसी के लिए सुरक्षित छत और दो वक्त की जरूरतें पूरी करना ही सबसे बड़ी प्राथमिकता थी. हर घर की दहलीज पर एक अलग कहानी थी और हर कहानी अपने पीछे कई अनकहे सवाल छोड़ रही थी.

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पार्थ गौतम और उनकी टीम ने इन परिवारों से मुलाकात कर उनकी परिस्थितियों को समझने और जरूरत के अनुसार सहायता पहुंचाने का प्रयास किया. कहीं आर्थिक मदद की जरूरत थी, कहीं बच्चों की शिक्षा से जुड़ा सहयोग जरूरी था, तो कहीं स्वास्थ्य संबंधी सहायता की आवश्यकता सामने आई. अभियान के दौरान कई परिवारों को यह भरोसा भी दिया गया कि उनकी परेशानी सुनने के बाद मदद का प्रयास केवल एक मुलाकात तक सीमित नहीं रहेगा. पार्थ गौतम के अनुसार, “जब हम किसी परिवार के घर पहुंचते हैं, तो हमें सिर्फ उनकी आर्थिक स्थिति नहीं दिखती, बल्कि उनके संघर्ष, उनकी मजबूरियां और उनके सपने भी समझने को मिलते हैं. कई बार छोटी-सी मदद भी किसी के लिए बहुत बड़ा सहारा बन सकती है. हमारा प्रयास है कि जरूरत के समय कोई परिवार खुद को अकेला महसूस न करे.”

‘हर घर दिवाली’ अभियान के इन 25 दिनों ने यह एहसास कराया कि समाज में खुशियां बांटने का अर्थ केवल त्योहार पर उपहार देना नहीं है. असल जरूरत उन परिस्थितियों को समझने की है, जिनमें कई परिवार सालभर जीने के लिए संघर्ष करते हैं. किसी बच्चे की पढ़ाई दोबारा शुरू हो सके, किसी जरूरतमंद को इलाज में मदद मिल सके या किसी परिवार को मुश्किल समय में सहारा मिल सके—यही इस अभियान के पीछे की मूल भावना रही. 2,000 घरों तक पहुंचने का संकल्प पूरा हो गया, लेकिन इन घरों से जुड़ी कहानियां और उनसे सामने आई जरूरतें एक बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी की याद दिलाती हैं. ‘हर घर दिवाली’ का संदेश भी यही है कि त्योहार की रोशनी केवल घरों को सजाने से नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी में उम्मीद जगाने से फैलती है.

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