ईरान में चल रहे सरकार विरोधी प्रदर्शनों ने एक बार फिर वहां की शासन व्यवस्था को दुनिया के सामने चर्चा में ला दिया है. ईरान दावा करता है कि उसकी हुकूमत इस्लाम के सच्चे आदर्शों पर आधारित है, जबकि दुनिया के अन्य मुस्लिम देशों की व्यवस्था उससे काफी अलग है. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान ने जिस ‘विलायत-ए-फकीह’ के सिद्धांत को अपनाया, वही उसे सऊदी अरब या कतर जैसे सुन्नी देशों से जुदा करता है. यह सिद्धांत न केवल धर्म को राजनीति से जोड़ता है, बल्कि सर्वोच्च धार्मिक नेता को असीमित शक्तियां भी प्रदान करता है.
क्या है विलायत-ए-फकीह?
विलायत-ए-फकीह का सरल अर्थ है ‘इस्लामी न्यायविद का संरक्षण’. यह सिद्धांत शिया संप्रदाय के 12वें इमाम, इमाम मेहदी के प्रतिनिधि के शासन को जायज ठहराता है. अयातुल्ला खुमैनी द्वारा तैयार इस व्यवस्था के तहत राज्य की सारी राजनीतिक और धार्मिक शक्तियां सर्वोच्च नेता यानी वली-ए-फकीह के पास होती हैं. सर्वोच्च नेता को केवल ईश्वर के प्रति जवाबदेह माना जाता है और उसका विरोध करना ईश्वरीय कानून की अवहेलना समझा जाता है. वर्तमान में अयातुल्ला अली खामेनेई इसी पद पर आसीन हैं और वे राष्ट्रपति से लेकर सेना तक के सभी महत्वपूर्ण फैसलों पर अंतिम वीटो पावर रखते हैं.
ईरान और सुन्नी देशों के बीच का बड़ा फर्क
ईरान और अन्य सुन्नी देशों जैसे सऊदी अरब या कतर के बीच सबसे बड़ा अंतर वहां की शासन प्रणाली और धार्मिक स्वतंत्रता का है. जहाँ सुन्नी देशों में वंशानुगत राजशाही है और राजा के पास सारी शक्ति होती है, वहीं ईरान में एक इस्लामी गणतंत्र है. ईरान में सर्वोच्च नेता के पद को छोड़कर सुन्नी मुसलमानों और यहां तक कि यहूदियों को भी चुनाव लड़ने और इबादत करने की आजादी है. इसके विपरीत कई सुन्नी देशों में शिया अल्पसंख्यकों को सार्वजनिक रूप से धार्मिक अनुष्ठान करने या मोहर्रम का मातम मनाने पर पाबंदी है. ईरान अपनी ताकत का स्रोत इमाम हुसैन की शहादत और पीड़ितों के समर्थन को मानता है, जबकि अरब राज्य अक्सर वहाबी विचारधारा से प्रेरित होते हैं.
ईरानी सत्ता की असली ताकत
ईरानी सत्ता की असली मजबूती उसकी नियमित सेना नहीं, बल्कि ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) और उसका अर्धसैनिक बल ‘बासिज’ है. यह बल देश की सीमाओं से ज्यादा वहां की धार्मिक व्यवस्था और सर्वोच्च नेता के प्रति वफादार होता है. बासिज का नेटवर्क ईरान के समाज में गहराई तक फैला हुआ है जो किसी भी विद्रोह को दबाने में मुख्य भूमिका निभाता है. विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की व्यवस्था धर्म और सत्ता का ऐसा मिश्रण है जिसमें सर्वोच्च नेता की जवाबदेही जनता के प्रति नहीं होती. यही कारण है कि तमाम विरोधों के बावजूद वहां का इस्लामी ढांचा अब तक बरकरार है.
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