मिडिल ईस्ट में जारी संकट में ईरान की जवाबी कार्रवाई ने एक चौंकाने वाला मोड़ लिया है. भले ही तेहरान की आधिकारिक बयानबाजी हमेशा इजरायल को निशाना बनाने पर केंद्रित रही हो, लेकिन युद्ध के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयान कर रहे हैं. शुरुआती 8 दिनों में ईरान ने अमेरिका-इजरायल के हमलों के जवाब में दागीं 2,981 मिसाइलें और ड्रोन, जिनमें से 42.8 प्रतिशत यानी 1276 हमलों से सीधे संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को निशाना बनाया गया.

यह संख्या इजरायल पर किए गए लगभग 600 हमलों (20 प्रतिशत) से दोगुनी से अधिक है. जनकारों का मानना है कि यह आंकड़ा न केवल क्षेत्रीय गठबंधनों की जटिलताओं को उजागर करता है, बल्कि ईरान की रणनीतिक प्राथमिकताओं में यूएई की भूमिका को भी हाइलाइट करता है.

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ईरान और UAE के बीच का तनाव


इस संघर्ष की जड़ें गहरी हैं. ईरान और यूएई के बीच तनाव दशकों पुराना है, जो खाड़ी की ऊर्जा राजनीति, क्षेत्रीय प्रभाव और सैन्य गठबंधनों से उपजा है. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ईरान ने यूएई को 'अमेरिकी कठपुतली' करार दिया, खासकर अबू धाबी के इजरायल के साथ अब्राहम समझौते (2020) के बाद. यूएई की हाईटेक एयर डिफेंस सिस्टम के बावजूद ईरान ने इसे कमजोर कड़ी माना. ईरान की रणनीति अब 'प्रॉक्सी वार' से आगे बढ़ चुकी है. वह सीधे उन सहयोगियों को निशाना बना रहा है जो इजरायल के साथ खड़े हैं.

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अमेरिका पर बढ़ता खर्च का बोझ


इस बीच संघर्ष का आर्थिक बोझ अमेरिका पर सबसे भारी पड़ा है. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध के पहले सप्ताह में वाशिंगटन ने करीब 6 अरब डॉलर खर्च कर डाले. इसमें से 4 अरब डॉलर मिसाइलों, अवरोधक प्रणालियों और अन्य हथियारों पर ही उड़ गए. पेंटागन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, 'हर ईरानी ड्रोन को रोकना एक महंगा खेल है; हमारी स्टॉकपाइल तेजी से घट रही है.'