अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, तुर्की, जॉर्डन, मिस्र, इंडोनेशिया और पाकिस्तान जैसे प्रमुख मुस्लिम देश शामिल हो गए हैं. बुधवार को इन आठ देशों के विदेश मंत्रालयों ने संयुक्त बयान जारी कर ट्रंप के निमंत्रण को स्वीकार किया. बोर्ड का उद्देश्य इजरायल-हमास संघर्ष के बाद गाजा पट्टी को स्थिर करना और उसके पुनर्निर्माण को गति देना है. इन देशों ने कहा कि वे बोर्ड के मिशन का पूर्ण समर्थन करेंगे, हालांकि आलोचकों का मानना है कि यह कदम फिलिस्तीनी हितों की अनदेखी कर सकता है.
ट्रंप को संयुक्त राष्ट्र का विकल्प मानने वाले इस बोर्ड में अमेरिकी प्रभाव स्पष्ट दिख रहा है, जहां इजरायल के हितों को प्राथमिकता मिलने की आशंका है. मुस्लिम देशों के इस फैसले का घरेलू स्तर पर विरोध हो रहा है, खासकर पाकिस्तान में जहां पूर्व नेता जुल्फिकार अली भुट्टो ने इसे ‘ऐतिहासिक गिरावट’ करार दिया. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि फिलिस्तीनियों के शहादत के समय समर्थन देना चाहिए था, न कि ट्रंप के बोर्ड में शामिल होना. अंतरराष्ट्रीय शांति वार्ताकार नोमी बार याकोव ने भी अल अरबिया को दिए साक्षात्कार में चिंता जताई कि तुर्की-कतर जैसे देशों के इजरायल से तनावपूर्ण संबंध सहमति में बाधा बनेंगे.
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दूसरी ओर, अमेरिका के करीबी यूरोपीय सहयोगी इस बोर्ड से दूरी बना रहे हैं. फ्रांस, ब्रिटेन सहित प्रमुख देश शामिल होने से हिचकिचा रहे हैं. फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के करीबी सूत्रों के अनुसार, ट्रंप के ग्रीनलैंड पर आक्रामक रुख से यूरोपीय नाराजगी चरम पर है, जो डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र को अमेरिकी क्षेत्र बनाने की मंशा से उपजा है. कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भी ट्रंप की नीतियों की खुली आलोचना की है. रिपोर्ट्स बताती हैं कि यूरोप संप्रभुता से समझौता किए बिना इस निमंत्रण को ठुकराने पर विचार कर रहा है.
गाजा में हमास-इजरायल सीजफायर के बावजूद हिंसा की घटनाएं जारी हैं, जो बोर्ड की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर रही हैं. मुस्लिम देशों के लोग अपने नेताओं पर फिलिस्तीनी पीड़ा को नजरअंदाज करने का आरोप लगा रहे हैं. बोर्ड को अमेरिकी एजेंडे को आगे बढ़ाने का औजार मानने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी स्थायित्व ट्रंप के कार्यकाल पर निर्भर करेगी. वैश्विक ध्रुवीकरण के इस दौर में मुस्लिम देशों की भागीदारी गाजा के भविष्य को नया मोड़ दे सकती है, लेकिन यूरोप की अनुपस्थिति चुनौतियां बढ़ा रही है.
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