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UAE के बाद अब सऊदी अरब ने दिया ट्रंप को झटका, ईरान पर हमला किया तो नहीं देगा अमेरिका का साथ

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब ने बड़ा फैसला लिया है. क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने साफ किया है कि ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए सऊदी अरब अपनी जमीन, हवाई क्षेत्र या संसाधनों का इस्तेमाल नहीं होने देगा. ये बयान शांति और कूटनीति के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है.

Credit: Social Media

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब ने बड़ा ऐलान किया है. सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान ने साफ किया है कि उनकी राज्य सीमा, एयरस्पेस और जमीन किसी भी देश या सैन्य गठबंधन को ईरान के खिलाफ मिलिट्री एक्शन के लिए इस्तेमाल की इजाजत नहीं देगा. ये घोषणा उन्होंने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के साथ फोन पर बातचीत के दौरान की. क्राउन प्रिंस ने बातचीत में ईरान की संप्रभुता का सम्मान करने पर जोर दिया और कहा कि सऊदी अरब किसी भी ऐसी गतिविधि में शामिल नहीं होगा जिससे क्षेत्रीय स्थिरता को खतरा पहुंचे. उन्होंने ये भी दोहराया कि सभी विवादों को संवाद और कूटनीतिक प्रयासों के जरिए हल किया जाना चाहिए ताकि युद्ध की स्थिति को रोका जा सके.

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क्या है ट्रंप का प्लान?

ये बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार की ओर से तेहरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई की अटकलें तेज हैं. इन सुगबुगाहटों के बीच अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में अपने कई युद्धपोत और एयरक्राफ्ट कैरियर्स की तैनाती भी बढ़ा दी है. सऊदी अरब के रुख से पहले संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने साफ कर दिया था कि वो भी अपने क्षेत्र, समुद्री मार्ग और एयर स्पेस को ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य हमले के लिए इस्तेमाल नहीं होने देगा.

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ईरान ने क्या कहा?

इससे ये संकेत मिलता है कि खाड़ी देशों की कई शक्तिशाली सरकारें शांतिपूर्ण समाधान और कूटनीति को तवज्जो दे रही हैं. ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने भी कहा कि वो युद्ध को रोकने और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत शांति प्रक्रिया को समर्थन देने का स्वागत करते हैं. उन्होंने बातचीत में दोनों देशों के बीच स्थिरता और सहयोग के मार्ग पर चलने की इच्छा जताई. विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों का ये रुख अमेरिका के लिए क्षेत्रीय समर्थन हासिल करने की प्रक्रिया को जटिल बना सकता है. अगर अमेरिका के पास खाड़ी के जरिए सैन्य रास्ता नहीं मिलेगा तो उसे बाकी रणनीतिक विकल्पों पर ध्यान देना पड़ेगा.

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