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परमाणु हथियार होंगे 'बेलगाम'? रूस और अमेरिका के बीच NEW START संधि खत्म तो जानें अब क्या होगा आगे‌

Russia America NEW START Treaty: परमाणु हथियारों को लेकर रूस और अमेरिका के बीच एक संधि चल रही थी, जो अब खत्म हो गई है. वहीं अब दोनों देशों के बीच परमाणु हथियारों को लेकर रेस फिर से शुरू हो जाएगी, जिससे दुनिया के लिए नया खतरा पैदा हो सकता है.

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1970 से दोनों देशों के बीच यह संधि चल रही थी और इसे विस्तारित किया जा रहा था.

Russia America New Start Treaty: अमेरिका और रूस के बीच न्यूक्लियर हथियारों पर कंट्रोल रखने वाली ‘न्यू स्टार्ट’ संधि आज 5 फरवरी को खत्म हो गई है. यह दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय परमाणु नियंत्रण संधि है, जिसके खत्म होते ही 50 साल से ज्यादा पुरानी परमाणु हथियारों को सीमित रखने की व्यवस्था भी खत्म हो गई है. यह संधि साल 2011 से लागू है और यह दोनों देशों को ज्यादा से ज्यादा 1550 वारहेड्स, 700 लॉन्चर और 800 डिप्लॉयड लॉन्चर रखने की इजाजत देती है.

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रूस ने दिया था एक साल के विस्तार का प्रस्ताव

हालांकि रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने सितंबर 2025 में इस संधि के एक साल के विस्तार का प्रस्ताव दिया था, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इस प्रस्ताव का कोई औपचारिक जवाब नहीं दिया था. अमेरिका का लगता है कि आज के हालात में अगर चीन इस संधि में नहीं है तो यह अप्रासंगिक हो गई है और इसके नियम मानने के लिए रूस बाध्य नहीं है. अब क्योंकि रूस ने संधि की सीमाओं को मानने से इनकार कर दिया है तो अब परमाणु हथियारों की दौड़ फिर शुरू होने का खतरा मंडरा गया है.

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ओबाम और मेदवेदेव ने किए थे संधि पर साइन

बता दें कि संधि खत्म होने के बाद न्यू स्टार्ट (न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन) संधि खत्म होने के बाद करीब 50 साल बाद पहली बार दोनों देशों पर परमाणु हथियार बनाने को लेकर कोई बंधन नहीं रह गया है. विशेषज्ञों ने इसे वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया है. साल 2010 में यह संधि हुई थी और साल 2011 में इसे लागू किया गया था. पूर्अ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और पूर्व रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने इस संधि पर साइन किए थे. इस संधि का मकसद उन परमाणु हथियारों की तैनाती को सीमित करना था, जो किसी देश के राजनीतिक, सैन्य और औद्योगिक ठिकानों को तबाह कर सकते हैं.

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1970 से दशक में हुई थी संधि की शुरुआत

बता दें कि रूस और अमेरिका के बीच परमाणु हथियार पर रोक लगाने के लिए बातचीत 1970 के दशक में शीत युद्ध के काल में शुरू हुई थी. SALT समझौते के तहत प्रस्ताव दिया गया है कि परमाणु हथियारों की संख्या पर लगाम लगाई जाए, लेकिन ऐसा नहीं किया गया. फिर 1991 में START-I संधि जॉर्ज बुश और गोर्बाचेव के बीच हुई और परमाणु हथियारों पर रोक लगाई गई. 1993 में फिर START-II संधि हुई, लेकिन इसके तहत मंजूर की गई कटौती करने की संख्या को लागू नहीं किया गया, यानी संधि की अनदेखी हुई.

साल 2011 से लागू थी आज खत्म हुई संधि

साल 2002 में SORT संधि के तहत जॉर्ज बुश और पुतिन के बीच न्यूक्लियर वारहेड्स 1700-2200 तक कम करने पर सहमति बनी. साल 2009 में बराक ओबामा और दिमित्री मेदवेदेव के बीच परमाणु हथियारों को लेकर बातचीत हुई और 8 अप्रैल 2010 को प्राग में संधि पर साइन हुए. अमेरिकी सीनेट ने साल 2010 में और रूसी संसद ने साल 2011 में संधि को मंजूरी दी. 5 फरवरी 2011 को संधि को लागू किया गया, जो 10 साल के लिए थी, लेकिन इसे 5 साल बढ़ाने का प्रावधान भी था तो साल 2021 में जो बाइडेन ने इसे विस्तार दिया.

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रूस-अमेरिका के पास ये हैं परमाणु हथियारों

बता दें कि रूस और अमेरिका मिलकर दुनियाभर का 90 प्रतिशत से ज्यादा परमाणु हथियारों का भंडार है. जनवरी 2025 तक रूस के पास 4309 और अमेरिका के पास 3700 न्यूक्लियर वारहेड्स थे. फ्रांस और ब्रिटेन के पास 290 और 225 वारहेड्स हैं, जबकि चीन के पास 600 परमाणु हथियार हैं.

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लेखक के बारे में

Khushbu Goyal

खुशबू गोयल News24 हिंदी डिजिटल में चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. वेब जर्नलिज्म में 13 साल का अनुभव रखने वाली खुशबू गोयल राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और राज्यस्तरीय न्यूज और चुनावी कवरेज करती हैं. खुशबू गोयल ने अक्टूबर 2013 में अमर उजाला डिजिटल से अपने करियर की शुरुआत की थी, जहां 7 साल सेवाएं देने के बाद साल नवंबर 2020 में दैनिक भास्कर डिजिटल जॉइन किया और सितंबर 2023 से News24 के डिजिटल में सेवाएं दे रही हैं. 13 साल के करियर में खुशबू गोयल ने नेशनल, इंटरनेशनल, पॉलिटिकल, क्राइम टॉपिक कवर करने में विशेषज्ञता हासिल की. खुशबू गोयल का पत्रकारिता में अनुभव: 13 साल योग्यता: कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के IMC&MT इंस्टीट्यूट से मास्टर ऑफ कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म (MJ) के बाद जर्नलिज्म में MPhil की डिग्री ली. खुशबू गोयल ने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव की विस्तृत रिपोर्टिंग की है, जिसमें उन्हें ग्राउंड कवरेज करने का भी अनुभव है. इसके अलावा पिछले 13 साल में विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव को भी उन्होंने फील्ड रिपोर्टिंग के साथ कवर किया.
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