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मानव इतिहास की सबसे खतरनाक ठंड कब पड़ी थी? धरती पर कहां दर्ज हुआ था अब तक का सबसे कम तापमान

पृथ्वी के इतिहास में दर्ज सबसे कड़ाके की ठंड आज भी लोगों को चौंकाती है. एक ऐसा दिन जब ठंड ने सारी हदों को पार कर दिया और सांस लेना भी मुश्किल हो गया.

मानव इतिहास की सबसे खतरनाक ठंड आज भी लोगों को हैरान करती है. धरती पर एक ऐसा दिन आया जब तापमान इतना गिरा कि उसने प्रकृति की चरम शक्ति को दुनिया के सामने रख दिया. दुनिया के सबसे ठंडे महाद्वीप अंटार्कटिका में एक ऐसा दिन आया, जब ठंड ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. यह घटना विज्ञान और प्रकृति दोनों के लिहाज से बेहद खास मानी जाती है. उस दिन मौसम इतना खतरनाक था कि बाहर निकलना तो दूर, खुले में कुछ मिनट रहना भी जानलेवा हो सकता था. यह रिकॉर्ड आज भी कायम है और वैज्ञानिक दुनिया में इसका जिक्र सम्मान और हैरानी दोनों के साथ किया जाता है.

कब और कहां बना यह ऐतिहासिक रिकॉर्ड?

21 जुलाई 1983 को दक्षिणी गोलार्ध में सर्दियों का चरम समय चल रहा था. इसी दौरान अंटार्कटिका में स्थित रूस के वोस्तोक रिसर्च स्टेशन पर तापमान माइनस 89.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया. यह आंकड़ा मौसम मापने वाले यंत्रों से पूरी तरह प्रमाणित था. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने भी इसे पृथ्वी पर अब तक का सबसे कम तापमान माना है. हैरानी की बात यह है कि चार दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी यह रिकॉर्ड कोई नहीं तोड़ सका है.

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कितना असाधारण था उस दिन का मौसम?

वोस्तोक रिसर्च स्टेशन पर आम तौर पर सर्दियों में भीषण ठंड रहती है. वहां सर्दियों का औसत तापमान पहले ही काफी कम होता है. लेकिन 21 जुलाई 1983 को तापमान औसत से करीब 54 डिग्री सेल्सियस कम दर्ज किया गया. इतनी ठंड में इंसानी शरीर कुछ ही मिनटों में जमने लगता है. वैज्ञानिकों के अनुसार इस स्तर की ठंड में पानी तुरंत बर्फ बन जाता है और सांस के साथ फेफड़ों पर भी गंभीर असर पड़ सकता है. उस दिन बाहर रहना लगभग नामुमकिन था.

क्यों आज भी खास माना जाता है यह रिकॉर्ड?

अंटार्कटिका पहले से ही दुनिया का सबसे ठंडा महाद्वीप है. वोस्तोक रिसर्च स्टेशन समुद्र तल से लगभग 3488 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जिससे वहां ठंड और ज्यादा बढ़ जाती है. कई देशों ने आधुनिक तकनीक के साथ वहां अध्ययन किए, लेकिन इस तापमान से नीचे कोई नया रिकॉर्ड दर्ज नहीं हो सका. यह घटना दिखाती है कि प्रकृति कितनी ताकतवर और रहस्यमयी हो सकती है. आज भी यह रिकॉर्ड पृथ्वी की चरम जलवायु का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है.


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