कानपुर का उर्सुला हॉर्समैन मेमोरियल अस्पताल जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है. अब तक लोग इसे सिर्फ इलाज का एक बड़ा केंद्र मानते थे लेकिन इसके पीछे छुपी कहानी बहुत भावुक और खास है. आमतौर पर प्रेम की मिसाल के रूप में ताजमहल का नाम लिया जाता है लेकिन कानपुर में मौजूद यह अस्पताल भी एक सच्ची प्रेम कहानी का प्रतीक है. यह कहानी एक अंग्रेज अधिकारी अल्बर्ट हॉर्समैन और उनकी पत्नी उर्सुला से जुड़ी है. उर्सुला सिर्फ उनकी पत्नी नहीं थीं बल्कि उनके जीवन की प्रेरणा भी थीं. दोनों के बीच गहरा प्रेम था जिसे आज भी यह अस्पताल जीवित रखे हुए है.
पत्नी की याद में दान किया सरकारी बंगला
अल्बर्ट हॉर्समैन की पत्नी उर्सुला की अचानक एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. इस घटना से अल्बर्ट पूरी तरह टूट गए थे लेकिन उन्होंने अपने दुख को सेवा में बदलने का फैसला किया. उन्होंने अपने सरकारी बंगले को दान कर वहां अस्पताल खोलने का निर्णय लिया. यह बंगला वही था जहां वे अपनी पत्नी के साथ समय बिताया करते थे. आज भी अस्पताल परिसर में अल्बर्ट और उर्सुला की तस्वीरें लगी हुई हैं जो उनकी प्रेम कहानी को बयान करती हैं. यह कदम किसी आदेश या दबाव का नतीजा नहीं था बल्कि एक पति के दिल से निकला हुआ फैसला था.
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26 फरवरी 1937 को हुई अस्पताल की स्थापना
26 फरवरी 1937 को अल्बर्ट हॉर्समैन ने अपने सरकारी बंगले में उर्सुला हॉर्समैन मेमोरियल अस्पताल की स्थापना की. यह कानपुर के लिए एक अनोखा तोहफा था. यह ताजमहल की तरह संगमरमर से नहीं बना था बल्कि सेवा त्याग और प्रेम की भावना से खड़ा हुआ था. शुरुआत में यह अस्पताल केवल दो कमरों में चल रहा था. धीरे धीरे समय के साथ इसका विस्तार होता गया और आज यह कानपुर का प्रमुख जिला अस्पताल बन चुका है. इस अस्पताल ने लाखों लोगों को इलाज और राहत दी है.
आज भी जीवित है प्रेम की भावना
आज उर्सुला अस्पताल में करीब 550 बेड की सुविधा है. यहां हृदय रोग इकाई डायलिसिस यूनिट रक्त जांच की आधुनिक सुविधा ऑपरेशन थिएटर और पैथोलॉजी जैसी सेवाएं मौजूद हैं. अस्पताल में कदम रखते ही एक अलग तरह की शांति महसूस होती है. कहा जाता है कि इसकी नींव ईंट पत्थर पर नहीं बल्कि भावनाओं पर रखी गई थी. यही कारण है कि डॉक्टर और नर्स पूरे अपनापन के साथ मरीजों का इलाज करते हैं. हर साल 26 फरवरी को अस्पताल में स्थापना दिवस मनाया जाता है और उर्सुला की याद में प्रेम और सेवा को याद किया जाता है.