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नीट छात्रा मौत मामला: ‘पारिवारिक एंगल’ की आड़ में असली सवालों से बच रही पुलिस?

पटना में नीट की तैयारी कर रही छात्रा की मौत के मामले में जांच अब परिवार से जुड़े पहलुओं की ओर बढ़ रही है, लेकिन 6 से 9 जनवरी के बीच पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में है. हॉस्टल, अस्पताल और थाने की निष्क्रियता ने इस पूरे मामले को और भी संदिग्ध बना दिया है. पढ़िये पटना से अमिताभ ओझा की रिपोर्ट.

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पटना में नीट की तैयारी कर रही छात्रा की मौत के मामले में अब जांच की दिशा “परिवार से जुड़े पहलू” की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है. पुलिस सूत्रों के अनुसार कॉल डिटेल्स और डिजिटल डिवाइस के आधार पर कुछ रिश्तेदारों को हिरासत में लिए जाने की बातें सामने आई हैं. हालांकि, इन इनपुट्स के बीच जांच का सबसे अहम और संवेदनशील समय 6 से 9 जनवरी लगातार नजरअंदाज होता दिख रहा है.

पुलिस के अनुसार, 5 जनवरी को छात्रा जहानाबाद से ट्रेन के जरिए पटना पहुंची. वह अकेले शम्भू गर्ल्स हॉस्टल गई और अपने कमरे तक पहुंची इसका CCTV फुटेज मौजूद है. 6 जनवरी को छात्रा को कथित रूप से कमरे से बाहर निकाला गया और डॉक्टर के पास ले जाया गया. बताया जा रहा है कि इस दौरान दरवाजा तोड़ने और छात्रा को बाहर ले जाने से जुड़ा वीडियो डिलीट कर दिया गया.

छात्रा को पहले पास के डॉ. सहजानंद के क्लिनिक ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उसे रेफर किया गया. सवाल यह है कि अगर मामला संदिग्ध था, तो क्या डॉक्टर ने पुलिस को तत्काल सूचना दी थी? और यदि नहीं, तो क्यों?

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अस्पताल की सूचना के बावजूद पुलिस की चुप्पी

6 जनवरी की शाम करीब 7:30 बजे छात्रा को प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया. अस्पताल की रिपोर्ट के मुताबिक मामला संदिग्ध था और इसकी सूचना कदमकुआ थाना को दी गई थी. पुलिस द्वारा मेमो रिसीव किए जाने की बात भी सामने आई है.

इसके बावजूद, 6 से 9 जनवरी की शाम तक न तो पुलिस आधिकारिक तौर पर शम्भू गर्ल्स हॉस्टल पहुंची और न ही अस्पताल में पीड़िता का बयान दर्ज करने गई. इसी बीच चित्रगुप्त नगर थाना के एक निजी ड्राइवर का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वह दावा करता नजर आया कि उसने सबसे पहले DVR निकालकर थाने में सुरक्षित रख दिया. इस दावे ने जांच प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

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सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका

टूटे दरवाजे वाले कमरे में इतने लंबे समय तक क्या-क्या बदला गया या हटाया गया यह जांच का अहम बिंदु है. सूत्रों के मुताबिक, FSL जांच के लिए जो बेडशीट सौंपी गई, वह धुली हुई थी, जबकि अस्पताल की रिपोर्ट में ब्लीडिंग का स्पष्ट उल्लेख है. इसके अलावा, जिन नींद की गोलियों का हवाला पुलिस शुरुआती जांच में देती रही, वे न तो कमरे से बरामद हुईं और न ही FSL जांच के लिए भेजी गईं.

कारण चाहे जो हो, जवाबदेही तय होगी

भले ही जांच में छात्रा के किसी पुराने प्रेम प्रसंग या परिचित का एंगल सामने आए, लेकिन इससे हॉस्टल प्रबंधन, अस्पताल प्रशासन और चित्रगुप्त नगर थाना की पुलिस को स्वतः क्लीन चिट नहीं दी जा सकती. घटना हॉस्टल के भीतर हुई और 6 से 9 जनवरी के बीच पुलिस की निष्क्रियता ही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा और अब तक अनुत्तरित सवाल बनी हुई है. सवाल अब भी कायम हैं और जवाब अब भी बाकी.

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