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'दुनिया के देश स्वार्थ पर चल रहे, हम वसुदेव कुटुंबकम पर...', 162वें मर्यादा महोत्सव में बोले मोहन भागवत

नागौर जिले के छोटी खाटू कस्बे में 162वें मर्यादा महोत्सव के शुभारंभ से पूर्व एक विशाल और भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया. आचार्य महाश्रमण के पावन सान्निध्य में आयोजित इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत भी मौजूद रहे.

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नागौर जिले के छोटी खाटू कस्बे में 162वें मर्यादा महोत्सव के शुभारंभ से पूर्व एक विशाल और भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया. आचार्य महाश्रमण के पावन सान्निध्य में आयोजित इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत भी मौजूद रहे.

इस अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि भारत सदैव से विश्व को मर्यादा सिखाने का कार्य करता आया है. उन्होंने कहा कि आरएसएस में लाठी रखते और सीखते है लेकिन इसे कब और कैसे चलना है इसकी मर्यादा सीखने के लिए संतों के पास हम लोग आते हैं. भारत में लाठी चलाना नहीं, बल्कि उसे कब और कैसे प्रयोग करना है—यह मर्यादा संतों से सीखी जाती है. भारत के श्रेष्ठ लोग केवल उपदेश नहीं देते, बल्कि अपने जीवन में उसे उतारते हैं, इसलिए उनका अनुकरण होता है.

डॉ. भागवत ने धर्म के व्यापक स्वरूप को रेखांकित करते हुए कहा कि धर्म धारण करने का भाव है, जो सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय और अपरिग्रह के अनुभव से जुड़ा है. उन्होंने कहा कि जीवन की सभी समस्याएं केवल कानून से हल नहीं होतीं, अनेक समस्याओं का समाधान धर्म के माध्यम से संभव है. वर्तमान वैश्विक परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि जहां दुनिया स्वार्थ की राह पर चल रही है, वहीं भारत ने सदैव ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना के साथ विश्व की चिंता की है.

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मर्यादा महोत्सव के पूर्व दिवस पर महाश्रमण ने संस्कृत श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा कि मधुर और सद्वाणी स्वयं में एक रत्न है, जबकि अज्ञानवश लोग पत्थरों में रत्न खोजते हैं. सतगुरु की कल्याणकारी वाणी और सम्यक ज्ञान जीवन को सही दिशा देता है. उन्होंने कहा कि भारत की ग्रंथ-परंपरा, शास्त्र और संतों की वाणी मानव की समझ और सामर्थ्य को बढ़ाकर जीवन का मार्गदर्शन करती है.

आचार्य महाश्रमण ने मर्यादा और अनुशासन के महत्व पर बल देते हुए कहा कि चाहे राजतंत्र हो या लोकतंत्र, दोनों में मर्यादा आवश्यक है. उन्होंने स्पष्ट किया कि शांति ही साध्य है, लेकिन यदि कोई शांति की भाषा नहीं समझे तो कठोरता भी आवश्यक हो सकती है. देश की मूल नीति अहिंसा है, लेकिन नागरिकों की रक्षा के लिए सेना को शस्त्र उठाने पड़ते हैं. संतों के लिए अहिंसा अनिवार्य है, जबकि गृहस्थ जीवन में देश की सुरक्षा हेतु शस्त्र की आवश्यकता पड़ सकती है.

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