एम.आई. रोड स्थित चेम्बर भवन में हुई इस बैठक में सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलावों पर गहन चर्चा के बाद यह स्वीकार किया गया कि विवाह जैसे पवित्र संस्कार आज दिखावे और फिजूलखर्ची की भेंट चढ़ते जा रहे हैं. इसका सबसे बड़ा दबाव मध्यम और सामान्य वर्ग पर पड़ रहा है. इसी चिंता से निकला एक साफ संदेश—अब शादी होगी मर्यादा में, न कि प्रदर्शन में.
थाली में भी मर्यादा, खर्च में भी संतुलन
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महासभा ने विवाह और मांगलिक आयोजनों में भोजन को सीमित और सादा रखने का निर्णय लिया. तय किया गया कि सब्ज़ी दो से अधिक नहीं होगी, दाल या कढ़ी एक, रोटी-चावल सीमित, मिठाई सिर्फ दो प्रकार—और चाट, आइसक्रीम व फास्ट फूड जैसे काउंटर दिखावे की बजाय आवश्यकता तक सीमित रहेंगे.उद्देश्य साफ है—अतिथि सम्मान बना रहे, लेकिन खर्च की होड़ खत्म हो.
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मुहूर्त सर्वोपरि, सुविधा नहीं
बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि विवाह कोई इवेंट नहीं, बल्कि सोलह संस्कारों में प्रमुख संस्कार है. इसलिए विवाह पंचांग और शुभ मुहूर्त के अनुसार ही संपन्न होगा. देर रात तक कार्यक्रम खींचना, हॉल या डीजे की सुविधा के हिसाब से मुहूर्त बदलना—इन सब पर असहमति जताई गई. पंडित और आचार्य को संपूर्ण विधि-विधान शास्त्रसम्मत ढंग से कराने की स्वतंत्रता देने का निर्णय लिया गया.
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दहेज, दिखावा और अशोभनीयता पर सख्त रुख
महासभा ने दहेज प्रथा को सामाजिक अपराध मानते हुए दहेज-मुक्त विवाह को सम्मान देने की घोषणा की. भव्य सजावट, अनावश्यक लाइटिंग, अश्लील गीत-संगीत और अमर्यादित नृत्य पर रोक लगाने का भी निर्णय हुआ. संदेश साफ था—सादगी ही नई सामाजिक प्रतिष्ठा होगी.
समाज को आईना, भविष्य को दिशा
प्रदेश कार्यकारिणी का मानना है कि यदि ब्राह्मण समाज संगठित होकर इन नियमों को अपनाता है, तो अन्य समाज भी इसका अनुसरण करेंगे. इससे न सिर्फ बेटियों के विवाह का आर्थिक बोझ घटेगा, बल्कि युवा पीढ़ी संस्कारों से जुड़ेगी और विवाह फिर से उत्सव नहीं, संस्कार बनेगा.
बैठक की अध्यक्षता राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. सुरेश मिश्रा ने की. प्रदेश भर से आए पदाधिकारियों, आचार्यों, मातृशक्ति और समाज के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने इस पहल को सामूहिक संकल्प का रूप दिया.
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