Chanakya Niti: आचार्य चाणक्य की नीतियां आज भी उतनी ही सटीक और प्रासंगिक हैं, जितनी प्राचीन काल में थीं. उनका हर विचार मानव जीवन की कमजोरियों और सच्चाइयों को सीधी भाषा में सामने रखता है. चाणक्य नीति में एक ऐसा कड़वा सत्य भी बताया गया है, जो बताता है कि कई लोग आंखें होते हुए भी अंधे जैसे व्यवहार करते हैं. वे सबकुछ जानते हैं, समझते हैं, फिर भी बार बार गलत फैसले लेते हैं. यही मानसिक अंधापन व्यक्ति को भीतर से कमजोर बनाता है और जीवन की दिशा भटका देता है. आइए जानते हैं, आचार्य चाणक्य ने किस संदर्भ में ऐसा कहा है?
आंखें होते हुए भी अंधापन!
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि केवल देख पाना ही दृष्टि नहीं है. सही और गलत में अंतर करना ही असली देखने की क्षमता है. जो व्यक्ति सत्य सामने होने पर भी उसे स्वीकार नहीं करता, वह आंखों के रहते हुए भी अंधा ही है. ऐसा इंसान हालात को देखता तो है, पर उनसे सीख नहीं लेता.
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कर्तव्य से विमुख व्यक्ति
चाणक्य नीति के अनुसार, जो व्यक्ति अपने कर्तव्य को पहचान नहीं पाता, वह सबसे बड़ी भूल करता है. कर्तव्य से भागना आसान होता है, पर उसका परिणाम हमेशा नुकसान देता है. ऐसा व्यक्ति जिम्मेदारियों से बचता है और बाद में परिस्थितियों को दोष देता है.
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विवेक की कमी
आचार्य चाणक्य विवेक को जीवन की सबसे बड़ी शक्ति मानते हैं. विवेकहीन व्यक्ति भावनाओं में बहकर निर्णय लेता है. वह लक्ष्य तो तय करता है, पर उस पर टिक नहीं पाता है. परिणामस्वरूप वह सही रास्ता जानते हुए भी गलत दिशा में चला जाता है.
लक्ष्य से भटका मानव
चाणक्य कहते हैं कि लक्ष्य के प्रति सजग रहना अत्यंत आवश्यक है. जो व्यक्ति अपने उद्देश्य को भूल जाता है, वह अवसरों को भी खो देता है. ऐसा व्यक्ति मेहनत करता है, पर सही दिशा के अभाव में उसका परिश्रम व्यर्थ चला जाता है.
सम्मान और सफलता से दूरी
आचार्य के अनुसार, जो व्यक्ति अपने कर्तव्य और विवेक के प्रति सजग नहीं रहता, उसे समाज में सम्मान नहीं मिलता. लोग उसे भरोसे के योग्य नहीं समझते. यही कारण है कि ऐसा इंसान जीवन में स्थायी सफलता हासिल नहीं कर पाता.
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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.