वाराणसी का मणिकर्णिका घाट केवल एक श्मशान नहीं बल्कि सनातन धर्म की गहरी आस्था का केंद्र है. बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर बनने के बाद इस घाट के नवीनीकरण को लेकर चर्चा तेज हो गई है लेकिन इसका इतिहास हजारों साल पुराना है. स्कंद पुराण और मत्स्य पुराण जैसे ग्रंथों में इस घाट की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है. मान्यता है कि भगवान विष्णु ने यहां एक कुंड खोदकर पांच लाख वर्षों तक तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने यहां निवास करना स्वीकार किया था. यह घाट शैव और वैष्णव परंपराओं के अद्भुत संगम का प्रतीक है जिसका प्रमाण यहां स्थित भगवान विष्णु के चरणपादुका मंदिर से मिलता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी स्थान पर देवी सती का कर्णफूल गिरा था जिसके कारण इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा और इसे मोक्ष का सबसे पावन द्वार माना गया.
मणिकर्णिका घाट का इतिहास क्या है?
मणिकर्णिका घाट का इतिहास केवल निर्माण का नहीं बल्कि संघर्षों का भी रहा है. पांचवीं शताब्दी के गुप्तकालीन अभिलेखों में इस घाट का उल्लेख मिलता है लेकिन समय के साथ इसे विदेशी हमलावरों की क्रूरता का सामना भी करना पड़ा. साल 1664 में मुगल बादशाह औरंगजेब की सेना ने जब वाराणसी के धार्मिक स्थलों पर हमला किया तो मणिकर्णिका घाट को भी भारी नुकसान पहुंचा था. प्रसिद्ध इतिहासकार यदुनाथ सरकार के अनुसार उस दौरान नागा संन्यासियों ने मुगल सेना का डटकर मुकाबला किया और उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था. इन युद्धों के कारण घाट की प्राचीन संरचनाएं क्षतिग्रस्त हो गई थीं जिन्हें बाद के शासकों ने अपनी श्रद्धा और सहयोग से पुनर्जीवित किया. इतिहास गवाह है कि यह घाट जितनी बार टूटा उतनी ही भव्यता के साथ फिर से खड़ा हुआ.
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मणिकर्णिका घाट के संरक्षण में मराठा शासकों का योगदान
18वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य के दौरान मणिकर्णिका घाट के संरक्षण में बड़े काम हुए. साल 1730 में बाजीराव पेशवा ने घाट की सीढ़ियों का पुनर्निर्माण शुरू कराया था लेकिन भारी पत्थरों के वजन और भूस्खलन के कारण कुछ हिस्सा धंस गया जिसका अवशेष आज भी दिखाई देता है. इसके बाद साल 1791 में मालवा की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने इस पूरे महाश्मशान क्षेत्र का व्यापक जीर्णोद्धार कराया. उन्होंने ही यहां प्रसिद्ध तारकेश्वर मंदिर का निर्माण कराया जिसे 'उद्धार का स्वामी' माना जाता है. अहिल्याबाई ने इस घाट को वह व्यवस्थित और भव्य स्वरूप दिया जिसने इसे देश के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थों में शुमार कर दिया. आज भी दाह संस्कार के बाद तारकेश्वर महादेव की पूजा की परंपरा निभाई जाती है जो अहिल्याबाई की दूरदर्शिता का प्रतीक है.
आधुनिक दौर में बदलाव की चुनौती
अहिल्याबाई के बाद भी कई राजाओं और दानदाताओं ने मणिकर्णिका को संवारने में अपनी भूमिका निभाई. साल 1830 में ग्वालियर की रानी बैजाबाई ने घाट की मरम्मत कराई तो वहीं 1895 में अलवर के महाराजा मंगल सिंह ने यहां भव्य मनोकामेश्वर मंदिर बनवाया जो आज भी घाट की मुख्य पहचान है. साल 1965 में उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इसकी मरम्मत का काम कराया था. वर्तमान में एक बार फिर मणिकर्णिका घाट के नवीनीकरण का काम चल रहा है जिसे लेकर परंपराओं और आधुनिकता के बीच संतुलन साधने के सवाल उठ रहे हैं. सदियों से मनों-टनों जलती लकड़ियों और राख के ढेरों के बीच खड़ा यह घाट आज भी अपनी उसी गरिमा को बचाए रखने की जद्दोजहद कर रहा है जिसे इतिहास के महान शासकों ने सींचा था.