लोकसभा में मंगलवार को सियासी पारा तब चढ़ गया जब विपक्षी दलों ने स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस सौंप दिया. विपक्ष ने बिरला पर सदन के संचालन में पक्षपात करने और विपक्षी महिला सांसदों को झूठे आरोपों के जरिए बदनाम करने के गंभीर आरोप लगाए हैं. आइएनडीआइए गठबंधन में शामिल करीब 120 सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं, हालांकि तृणमूल कांग्रेस ने फिलहाल इस पर साइन करने से परहेज किया है. स्पीकर ने इस नोटिस को आगे की कार्यवाही के लिए सचिवालय को भेज दिया है और फैसला लिया है कि प्रक्रिया पूरी होने तक वे सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेंगे.
विपक्ष ने गिनाए अविश्वास के चार मुख्य कारण
विपक्षी सांसदों ने महासचिव को सौंपे गए नोटिस में चार प्रमुख वजहें बताई हैं. पहली वजह सदन को एकतरफा ढंग से चलाना और विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बोलने से रोकना बताया गया है. दूसरी वजह बजट सत्र के दौरान आठ विपक्षी सांसदों का निलंबन है, जिसे मनमाना करार दिया गया है. तीसरा कारण भाजपा के एक सांसद द्वारा पूर्व प्रधानमंत्रियों पर किए गए आपत्तिजनक हमले पर स्पीकर की चुप्पी को बताया गया है. चौथी वजह कांग्रेस की महिला सांसदों पर लगाए गए उन आरोपों को बताया गया है जिसमें कहा गया था कि वे प्रधानमंत्री पर हमले की तैयारी कर रही थीं, जिसे विपक्ष ने पूरी तरह झूठा और अपमानजनक कहा है.
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राहुल और अखिलेश के हस्ताक्षर न होने की वजह
दिलचस्प बात यह है कि इस अविश्वास प्रस्ताव पर नेता विपक्ष राहुल गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के हस्ताक्षर नहीं हैं. कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी ने संसदीय गरिमा और अपने संवैधानिक पद की मर्यादा को देखते हुए जानबूझकर साइन नहीं किए हैं. अखिलेश यादव ने भी इसी तरह के कारणों से खुद को हस्ताक्षर से दूर रखा है. नोटिस देने से पहले कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने स्पीकर से मुलाकात कर इस टकराव को टालने की आखिरी कोशिश की थी, लेकिन जब बजट चर्चा से पहले राहुल गांधी को बोलने की अनुमति नहीं मिली, तो विपक्ष ने यह कड़ा कदम उठा लिया.
अब आगे क्या होगी प्रक्रिया?
नियमों के अनुसार अब लोकसभा सचिवालय इस नोटिस का परीक्षण करेगा और सही पाए जाने पर इसे सदन में चर्चा और वोटिंग के लिए रखा जाएगा. संसदीय परंपरा के मुताबिक जब तक इस प्रस्ताव का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक स्पीकर आसन पर नहीं बैठेंगे. हालांकि एनडीए के पास सदन में स्पष्ट बहुमत है, इसलिए ओम बिरला की कुर्सी को फिलहाल कोई खतरा नहीं दिख रहा है. इतिहास में पहले भी तीन बार लोकसभा अध्यक्षों के खिलाफ ऐसे प्रस्ताव लाए गए हैं, लेकिन वे सभी खारिज हो गए थे. इस कदम से आने वाले दिनों में संसद के भीतर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कड़वाहट और बढ़ने के आसार हैं.
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