भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील फाइनल होने के बाद यह चर्चा तेज है. भारत क्यों रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया है कि भारत अब रूसी तेल नहीं लेगा. हालांकि आंकड़ों के मुताबिक भारत ने अमेरिका के साथ औपचारिक समझौते से काफी पहले ही रूस से तेल आयात घटाना शुरू कर दिया था. सितंबर 2024 में रूस की तेल हिस्सेदारी 41 प्रतिशत थी, जो अब गिरकर 31 प्रतिशत रह गई है. यह फैसला केवल किसी दबाव में नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक कारणों से लिया गया है.
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कम होता डिस्काउंट और अमेरिकी टैरिफ का असर
रूस से तेल कम खरीदने की सबसे बड़ी वजह आर्थिक है. यूक्रेन युद्ध के शुरुआती दिनों में रूस तेल पर 20 से 25 डॉलर प्रति बैरल की छूट दे रहा था, जो अब घटकर महज 1.5 से 2 डॉलर रह गई है. इसके साथ ही ट्रंप द्वारा लगाए गए 25 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ ने रूसी तेल से होने वाली बचत को नुकसान में बदल दिया है. जब शिपिंग और इंश्योरेंस की लागत जोड़ी जाती है, तो रूस से तेल मंगाना अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है. इसी कारण भारत ने फिर से मिडिल ईस्ट और अमेरिका जैसे पुराने भरोसेमंद सप्लायर्स की ओर रुख किया है.
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रुपए में भुगतान और सप्लाई चेन की दिक्कतें
रूस के साथ व्यापार में भुगतान का मुद्दा भी एक बड़ी बाधा बना हुआ है. भारत ने रूस से तेल तो खूब खरीदा लेकिन उसके मुकाबले रूस को निर्यात कम रहा, जिससे रूस के पास भारतीय रुपए जमा हो गए हैं. रूस के लिए रुपए को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल करना मुश्किल हो रहा है, जिससे भुगतान की प्रक्रिया जटिल हो गई है. इसके अलावा भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहता. भारत ने अपनी सप्लाई चेन को संतुलित करने के लिए सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों से तेल खरीद बढ़ाकर जोखिम कम करने की रणनीति अपनाई है.
यूरोपीय यूनियन के कड़े नियम और भविष्य की चुनौती
यूरोपियन यूनियन ने घोषणा की है कि 21 जनवरी 2026 के बाद वह उन देशों से पेट्रोलियम उत्पाद नहीं खरीदेगा जो रूसी कच्चे तेल से बने हों. भारत बड़े पैमाने पर रूसी तेल को रिफाइन कर यूरोप को बेचता था, लेकिन अब यह रास्ता बंद होने वाला है. नए नियमों के तहत रिफाइनरियों को यह साबित करना होगा कि उनके उत्पादों में रूसी क्रूड का इस्तेमाल नहीं हुआ है. इन प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण भारतीय तेल कंपनियों के लिए रूसी तेल का इस्तेमाल करना अब कूटनीतिक और व्यापारिक रूप से काफी मुश्किल होता जा रहा है.