असम की राजनीति में अचानक चर्चा के केंद्र में आए नेता भूपेन बोरा इन दिनों सुर्खियों में हैं. अब वो कांग्रेस का हाथ छोड़कर बीजेपी का दामन थामने वाले हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत कई बड़े नेताओं ने उन्हें मनाने की कोशिश की. लेकिन वो अपनी बात पर अड़े रहे और आखिरकार कांग्रेस का साथ छोड़ दिया. खासतौर पर 2026 विधानसभा चुनाव से पहले इसे बीजेपी के लिए बड़ी मजबूती और कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. लेकिन सवाल ये है कि भूपेन बोरा कौन हैं, उनका राजनीतिक सफर क्या रहा है और असम की राजनीति में उनकी कितनी अहम भूमिका रही है? आइए आसान भाषा में विस्तार से समझते हैं.
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कैसे हुई राजनीति में एंट्री?
भूपेन बोरा असम के एक शिक्षित और राजनीतिक रूप से सक्रिय परिवार से आते हैं. भूपेन बोरा का जन्म 30 अक्टूबर, 1970 को असम के लखीमपुर में हुआ था. उन्होंने नॉर्थ लखीमपुर कॉलेज और डिब्रूगढ़ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया. उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ छात्र राजनीति से अपने करियर की शुरुआत की. बोरा नॉर्थ लखीमपुर कॉलेज स्टूडेंट्स यूनियन के वाइस-प्रेसिडेंट
और डिब्रूगढ़ यूनिवर्सिटी पोस्टग्रेजुएट स्टूडेंट्स यूनियन के जनरल सेक्रेटरी रह चुके हैं. कॉलेज के दिनों से ही वो सामाजिक मुद्दों और जनसमस्याओं को लेकर मुखर रहे, जिसकी वजह से उन्हें युवा नेताओं में गिना जाने लगा.
कांग्रेस से रहा खास जुड़ाव
भूपेन बोरा का राजनीतिक सफर मुख्य रूप से कांग्रेस के साथ जुड़ा रहा. उन्होंने पार्टी में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालीं और जमीनी राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ बनाई. संगठनात्मक कामकाज और कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रियता के चलते वो धीरे-धीरे पार्टी के बड़े नेताओं में शामिल हो गए. कांग्रेस नेतृत्व ने उनके अनुभव और संगठन क्षमता को देखते हुए उन्हें असम प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया. बोरा ने असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के चीफ के तौर पर 2021 से 2024 तक काम किया. इस पद पर रहते हुए भूपेन बोरा ने पार्टी को दोबारा मजबूत करने की कोशिश की और सरकार के खिलाफ कई मुद्दों पर मुखर विरोध किया. मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के समय वो असम सरकार के प्रवक्ता और पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी भी थे.
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कांग्रेस से क्यों दूर हुए बोरा?
भूपेन बोरा असम विधानसभा के सदस्य भी रह चुके हैं. वो 2006 से 2016 तक बिहपुरिया विधानसभा क्षेत्र के MLA रहे. विधायक के रूप में उन्होंने अपने क्षेत्र में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों को उठाया. स्थानीय जनता के बीच उनकी छवि एक सुलझे हुए और एक्टिव नेता की रही है, जो सीधे लोगों से जुड़कर उनकी समस्याएं सुनते थे. हाल के सालों में कांग्रेस की आंतरिक राजनीति, संगठनात्मक कमजोरियों और नेतृत्व को लेकर असंतोष की खबरें सामने आती रही हैं. माना जा रहा है कि इन्हीं वजहों से भूपेन बोरा धीरे-धीरे पार्टी नेतृत्व से दूरी बनाने लगे और आखिरकार उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़ ही दिया. अब वो 22 फरवरी को बीजेपी में शामिल होने वाले हैं. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी में भूपेन बोरा को संगठनात्मक जिम्मेदारी या चुनावी रणनीति में अहम भूमिका मिल सकती है. उनका अनुभव और क्षेत्रीय पकड़ पार्टी के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है.
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