भारत सोमवार यानी 26 जनवरी को अपना 77वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है, लेकिन आज भी देश में कई ऐसे नागरिक भी है जो मूलभूत सुविधाओं को लिए तरस रहे हैं. संविधान में अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य अधिकार को जीवन के मौलिक अधिकार के तौर पर माना गया है, लेकिन 21वीं सदी में भी गरीबों को बेहतर इलाज के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है. हाल ही में ऐसा ही एक भावुक कर देना वाला मामला सामने आया, जिसने प्रशासन की नाकामी की पोल खोल दी.
पत्नी के लिए रिक्शाचालक बना 'दशरथ मांझी'
ओडिशा के संबलपुर जिले के मोदीपाड़ा गांव में रहने वाले 75 वर्षीय रिक्शाचालक बाबू लोहार ने मानवता की मिसाल कायम की. बिहार के दशरथ मांझी की याद दिलाने वाले इस प्यार और समर्पण में उन्होंने अपनी 70 वर्षीय पत्नी ज्योति को लकवा मारने के बाद इलाज के लिए 300 किलोमीटर लंबा सफर रिक्शे पर ही तय किया. स्थानीय अस्पतालों में पर्याप्त सुविधा न मिलने पर डॉक्टरों ने कटक के प्रतिष्ठित एससीबी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (SCBMCH) रेफर किया. लेकिन प्राइवेट एंबुलेंस के 20-25 हजार रुपये के किराए ने उन्हें मजबूर कर दिया.
---विज्ञापन---
साइकिल रिक्शा को बनाया 'मोबाइल एंबुलेंस'
लोहार ने सादगी से अपना साइकिल रिक्शा ही 'मोबाइल एंबुलेंस' बना लिया. पुराने तकियों और चादरों से पत्नी के लिए आराम का इंतजाम किया. संबलपुर से कटक का 300 किमी सफर नौ दिनों में पूरा किया. सुबह से शाम तक पैदल ठेलते, रातें NH-55 के किनारे ढाबों या दुकानों पर बिताईं. उम्रदराज होने के बावजूद बारिश, धूप और थकान झेली. कटक पहुंचकर ज्योति को दो महीने का स्पेशल इलाज मिला, जिसमें न्यूरोलॉजी विभाग की पूरी टीम जुटी.
---विज्ञापन---
रास्ते में हुआ सड़क हादसा
19 जनवरी को घर वापसी के दौरान बाबू लोहार के रिक्शे को तेज रफ्तार ट्रक ने रिक्शे को पीछे से ठोका. ज्योति के सिर व कमर पर गंभीर चोटें आईं, लोहार को भी खरोंचें. नजदीकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती हुए. डॉक्टर विकास ने इलाज के साथ 5 हजार रुपये निजी मदद दी. लोहार ने भावुक होकर कहा, 'हम निस्सहाय हैं, बस एक-दूसरे का भरोसा है.' अब अंतिम 100 किमी का सफर फिर शुरू करने को तैयार.