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Karnataka Election Special: 2024 के लिए कर्नाटक की लड़ाई जीतना जरूरी क्यों? किसकी राहों में फूल, किसकी राहों में कांटे!

News 24, Karnataka Assembly Election Special: कर्नाटक में जैसे-जैसे वोटिंग की तारीख नजदीक आती जा रही है, प्रचार युद्ध में कमान पर बयानों के जहरीले तीर चढ़ाए जाने लगे हैं। कर्नाटक के वोट युद्ध में बढ़त के लिए अब वहां की फिजाओं में जहरीला सांप और विषकन्या जैसे शब्द गूंजने लगे हैं। लेकिन, सूबे के लोग […]

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News 24, Karnataka Assembly Election Special: कर्नाटक में जैसे-जैसे वोटिंग की तारीख नजदीक आती जा रही है, प्रचार युद्ध में कमान पर बयानों के जहरीले तीर चढ़ाए जाने लगे हैं। कर्नाटक के वोट युद्ध में बढ़त के लिए अब वहां की फिजाओं में जहरीला सांप और विषकन्या जैसे शब्द गूंजने लगे हैं। लेकिन, सूबे के लोग बिल्कुल चुप हैं। नेताओं के बदलते चाल, चरित्र और चेहरे को बारीकी से देख रहे हैं। ऐसे में वहां के लोगों के मन में क्या चल रहा है? इसे पढ़ना सियासी पार्टियों के नेताओं के लिए बहुत मुश्किल है। भले ही चुनावी मंचों से जीत के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हों लेकिन, एक सच ये भी है कि कर्नाटक पॉलिटिक्स के कई दिग्गजों की आंखों से नींद गायब होगी। वो 13 मई को आने वाले नतीजों के साइड इफेक्ट्स के बारे सोच-सोच कर परेशान होंगे। उनका शुगर और ब्लड-प्रेशर लेवल ऊपर-नीचे हो रहा होगा? कर्नाटक के नतीजे तय करेंगे कि 13 मई के बाद किन नेताओं की राहों में फूल और किनकी राहों में कांटे होंगे? आज मैं News 24 की एडिटर-इन-चीफ अनुराधा प्रसाद आपको बताने की कोशिश करूंगी कि कर्नाटक के लोग जब EVM का बटन दबाकर फैसला सुनाएंगे, उसका सूबे के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा पर क्या असर पड़ेगा? कांग्रेस के डीके शिवकुमार और सिद्दारमैया की आगे की राहें इस चुनाव के बाद आसान होंगी या मुश्किल? क्या एचडी देवगौड़ा और एचडी कुमारस्वामी अपनी पार्टी और अपना राजनीतिक वजूद बचाए रखने में कामयाब हो पाएंगे? ये भी समझना जरूरी है कि कर्नाटक के नतीजे बीजेपी, कांग्रेस और जेडीएस तीनों पार्टियों के लिए करो या मरो जैसे क्यों बन चुके हैं? किसी भी नेता या पार्टी के लिए कर्नाटक में जीत-हार का मतलब भविष्य की राजनीति के लिहाज से क्या-क्या हो सकता है? ऐसे सभी सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे। अपने खास कार्यक्रम कर्नाटक के फूल और कांटे में। यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट पहुंचा बाहुबली आनंद मोहन की रिहाई का मामला, पूर्व IAS की पत्नी उमा कृष्णैय्या की मांग- वापस जेल भेजा जाए

येदियुरप्पा का विकल्प नहीं बन पाए बोम्मई

सबसे पहले बात करते हैं कर्नाटक बीजेपी के दिग्गजों की। दो साल पहले बीजेपी ने बीएस येदियुरप्पा को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से हटा कर बसवराज बोम्मई को कमान सौंपी। पॉलिटिकल पंडितों का अनुमान है कि बीजेपी ने बसवराज को येदियुरप्पा के विकल्प के तौर पर कर्नाटक में खड़ा करने की कोशिश की थी। दो वर्षों तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहने के बाद भी बसवराज बोम्मई येदियुरप्पा का विकल्प नहीं बन पाए। वैसी चमकदार पहचान नहीं बना पाए जैसी येदियुरप्पा की है। ऐसे में बीजेपी को चुनाव से पहले येदियुरप्पा को चुनावी मंचों पर जगह और पूरी तवज्जो देनी पड़ी। अस्सी साल के येदियुरप्पा चुनावी राजनीति से रिटायरमेंट का ऐलान कर चुके हैं लेकिन, वो अपने बेटे बीवाई विजयेंद्र को शिकारीपुर विधानसभा सीट से टिकट दिलाने में कामयाब रहे। ऐसे में वो चाहेंगे कि अगर सूबे में बीजेपी की सरकार बनती है तो उनके बेटे विजयेंद्र को सूबे की बीजेपी सरकार में अहम रोल मिले।

कांग्रेस की बड़ी समस्या, किसे कुर्सी पर बिठाए?

अगर कर्नाटक में पिछले चार दशक से चली आ रही सियासी परंपरा टूट जाती है। यानी बीजेपी सत्ता में दोबारा वापसी करने में कामयाब रहती है, ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या पार्टी आलाकमान बसवराज को दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाएगा? ये सवाल शायद बसवराज को भी बहुत ज्यादा परेशान कर रहा होगा। राष्ट्रीय महासचिव बीएल संतोष की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी सामने आ सकती है। कर्नाटक बीजेपी में कई ऐसे नेता हैं, जो खुद को हाशिए पर धकेले जाने की बड़ी वजह बीएल संतोष को मानते हैं। अगर बीजेपी कर्नाटक चुनाव जीतने में कामयाब रहती है तो आपसी कलह और असंतोष का ज्वालामुखी शांत करना आसान नहीं होगा। सिक्के का दूसरा पहलू ये है कि अगर बीजेपी का मिशन कर्नाटक पूरा नहीं होता है तो चुनावों में हार का ठीकरा किसके सिर फूटेगा? बसवराज बोम्मई, येदियुरप्पा या फिर बीजेपी आलाकमान जिम्मेदारी लेगा? अब बात कांग्रेसी नेताओं की। वैसे तो कर्नाटक कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार हैं। लेकिन, दो ऐसे नेता हैं जिनकी दावेदारी में दम दिख रहा है। एक हैं कर्नाटक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार और दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया। अगर कांग्रेस कर्नाटक का किला फतह करने में कामयाब रहती है तो कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी समस्या यही होगी कि सीएम की कुर्सी पर किसे बैठाए? डीके शिवकुमार को या फिर सिद्धारमैया को? एक रणनीतिकार हैं और दूसरे मास लीडर। एक बेहतर रणनीतिकार हैं तो दूसरी बातचीत के जरिए मुद्दों को सुलझाने में गजब की महारत रखते हैं। दोनों की अपनी-अपनी यूएसपी है। ऐसे में कांग्रेस के सीनियर नेताओं ने दोनों के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कराने की कोशिश की है। जिससे चुनावों में कांग्रेस को पूरा फायदा मिले। अब बड़ा सवाल ये है कि चुनाव के बाद क्या होगा?

क्या वोटिंग पैटर्न साबित करेगा भ्रष्टाचार का मुद्दा?

डीके शिवकुमार मन ही मन सोच रहे होंगे कि अगर उनकी सिफारिश वाले उम्मीदवार कम संख्या में चुनाव जीते तो क्या होगा? और इसी तरह की कश्मकश कहीं-न-कहीं सिद्धारमैया के दिमाग में भी चल रही होगी? वहीं हार की स्थिति में सिद्धारमैया खुद को राजनीति के वामप्रस्थ आश्रम में देख रहे होंगे तो शिवकुमार आगे की रणनीति पर गुना-भाग कर रहे होंगे। कांग्रेस सूबे की बसवराज सरकार को 40 फीसदी कमीशन वाली सरकार बता रहे हैं। वहीं, बीजेपी डीके शिवकुमार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के तीर से कांग्रेस को निशाना बनाने में जुटी है। डीके मनी लॉन्ड्रिंग केस में जेल भी जा चुके हैं और प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी के रडार पर हैं । ऐसे में 13 मई के नतीजों के बाद कर्नाटक में चाहे बीजेपी की सरकार बने या फिर कांग्रेस की, भ्रष्टाचार का मुद्दा वोटिंग पैटर्न को कितना प्रभावित करता है ये भी साफ हो जाएगा? कर्नाटक के वोट युद्ध में एक पिता-पुत्र की जोड़ी भी बहुत परेशान है। मैं बात कर रही हूं पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा और उनके बेटे कुमारस्वामी की। पिछले तीन दशकों से कर्नाटक की राजनीति पर देवगौड़ा का अच्छा खासा प्रभाव रहा है। कभी किंग तो कभी किंगमेकर वाली भूमिका। वोक्कालिगा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले देवगौड़ा की पार्टी का ओल्ड मैसूर क्षेत्र में अच्छा खासा प्रभाव रहा है। इस बार जिस तरह के समीकरण बनते दिख रहे हैं, उसमें अगर कांग्रेस या बीजेपी किसी को भी पूर्ण बहुमत मिल जाता है तो देवगौड़ा और कुमारस्वामी की सियासत के सन्नाटे में आते देर नहीं लगेगी? और ये बात बाप-बेटे की जोड़ी को चैन से सोने नहीं दे रही होगी।

जीत में छिपी है भविष्य की राजनीति

अगर कर्नाटक के भूगोल को देखें तो उत्तर में महाराष्ट्र, उत्तर पश्चिम में गोवा, दक्षिण में केरल, दक्षिण पूर्व में तमिलनाडु, पूर्व में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना है। अगर कर्नाटक को मिलाकर इन सभी राज्यों की लोकसभा सीटों को जोड़ दिया जाए तो सीटें बैठती है –179। कर्नाटक के नतीजे उसके पड़ोसी राज्यों में जीत के लिए ईको सिस्टम बनाने में मददगार की भूमिका निभाते हैं। ऐसे में अगर कर्नाटक में बीजेपी की रणनीति पूरी तरह से कामयाब रही तो दक्षिण भारत में कमल की राह में कांटे कुछ कम हो जाएंगे। वहीं, अगर कांग्रेस को कर्नाटक में जीत का सूरज दिखा तो इस साल के आखिर में होने वाले चार राज्यों के विधानसभा चुनाव यानी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना में कार्यकर्ताओं को चार्ज करने में मदद मिलेगी। एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में तो कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला है। वहीं, तेलंगाना में बीआरएस, कांग्रेस और बीजेपी के बीच त्रिकोणीय मुकाबले के आसार हैं। ऐसे में जो भी कर्नाटक का वोट युद्ध जीतेगा, उसे साल के आखिर में होने वाले चारों राज्यों के विधानसभा चुनावों में मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलने की उम्मीद है।

कर्नाटक का वोट युद्ध कई नेताओं का तय करेगा भविष्य

कर्नाटक की जमीन कई युद्धों की गवाह रही है, तब फैसला तलवार, बंदूक और तोप से होता था। लेकिन, लोकतंत्र में जनता अपना फैसला वोट की चोट से सुनाती है। लोग अपनी वोट की ताकत से किसी को भी सत्ता में बैठाते हैं और सत्ता से बेदखल करते हैं। इस बार का कर्नाटक का वोट युद्ध सूबे के कई बड़े नेताओं का सियासी भविष्य तय करेगा। मसलन, बीएस येदियुरप्पा, बसवराज बोम्मई, बीएल संतोष, डीके शिवकुमार, सिद्दारमैया, कुमारस्वामी। सिर्फ नेता ही नहीं कर्नाटक के सियासी अखाड़े में खड़ी बीजेपी, कांग्रेस और जेडीएस के लिए इस बार के नतीजे बहुत अहम हैं। कर्नाटक के चुनावी नतीजे तय करेंगे कि लोग अब किस तरह की राजनीति चाहते हैं? दक्षिण भारत में राष्ट्रीय पार्टियां किस रास्ते आगे बढ़ेगी? जेडीएस जैसी पार्टी की राजनीतिक धारा को कर्नाटक के लोग मजबूत बनाते हैं या कमजोर करते हैं? ऐसे कई सवालों के जवाब के लिए अभी थोड़ा इंतजार करना होगा... और पढ़िए – सुप्रीम कोर्ट पहुंचा बाहुबली आनंद मोहन की रिहाई का मामला, पूर्व IAS की पत्नी उमा कृष्णैय्या की मांग- ‘वापस जेल भेजा जाए’ स्क्रिप्ट और रिसर्च : विजय शंकर   और पढ़िए – देश से जुड़ी अन्य बड़ी ख़बरें यहाँ पढ़ें 


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