भारत और पाकिस्तान का विभाजन 1947 में हिंदुस्तान को आजादी मिलने से कुछ घंटे पहले ही हो गया था. यही वजह से कि पाकिस्तान हर साल 14 सितंबर को अपनी स्वतंत्रता दिवस मनाता है और भारत 15 अगस्त को. भारत और पाकिस्तान के रिश्ते की नींव ही कड़वाहट के साथ रखी गई, जिसे खत्म करने के लिए इंडिया की तरफ से कई बार कोशिशें की गई. क्या आप कभी सोच सकते हैं कि भारत अपने दुश्मन देश के नेता को भी मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित कर सकता है, वो भी गणतंत्र दिवस जैसे गौरवशाली आयोजन में?
दुश्मन देश का नेता बना भारत का मेहमान
जी हां, ऐसा एक बार हो चुका है. हर साल दिल्ली के राजपथ (कर्तव्य पथ) पर होने वाली गणतंत्र दिवस परेड में विश्व के प्रमुख नेता मुख्य अतिथि बनकर भारत की एकता और शक्ति का साक्षी बनते हैं. इतिहास में वर्ष 1955 के गणतंत्र दिवस को इसलिए भी याद किया जाता है, क्योंकि उस आयोजन में पाकिस्तान के तत्कालीन गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद राजपथ पर मुख्य अतिथि के तौर पर कार्यक्रम में शामिल हुए थे.
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मलिक गुलाम का भारत से नाता
आजादी के बाद के तनावपूर्ण दौर में यह निर्णय न केवल साहसिक था, बल्कि शांति की दिशा में बड़ा कदम भी बताया जाता है. उस समय भारत-पाकिस्तान संबंध अभी युद्धों की आग में नहीं झुलस रहे थे और नेहरू युग की कूटनीति पड़ोसी देश के साथ सामान्यीकरण की कोशिश कर रही थी. मलिक गुलाम मोहम्मद का व्यक्तिगत इतिहास भारत से गहराई से जुड़ा हुआ था. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षित चार्टर्ड अकाउंटेंट मलिक गुलाम ने ब्रिटिश राज में भारतीय रेलवे लेखा सेवा में सेवा दी और हैदराबाद के निजाम के वित्तीय सलाहकार के रूप में भी कार्य किया.
भारत के फैसले से दुनिया भी हैरान
विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए, जहां 1951 में पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की हत्या के बाद उन्हें गवर्नर जनरल बनाया गया. उनके कार्यकाल में पाकिस्तान की राजनीति में उथल-पुथल मची रही. 1953 में उन्होंने प्रधानमंत्री ख्वाजा नाजिमुद्दीन की सरकार को बर्खास्त कर दिया और 1954 में संविधान सभा को भंग कर दिया. इन कदमों के पीछे सेना के बड़े अधिकारियों का भी सपोर्ट था जिनमें तख्तापलट करने वाले जनरल अयूब खान भी शामिल थे. ऐसे विवादास्पद नेता को भारत का न्योता मिलना दुनिया को भी हैरान कर गया.
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