DMK Against CAA: द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि 2019 का नागरिकता (संशोधन) अधिनियम ‘मनमाना’ है क्योंकि यह केवल श्रीलंकाई तमिलों को भारत में शरणार्थी के रूप में रखते हुए तीन देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों पर विचार करता है।
डीएमके द्वारा दायर हलफनामे में कहा गया है कि केंद्र सरकार तमिल शरणार्थियों की दुर्दशा के लिए स्पष्ट रूप से चुप रही है। तमिल शरणार्थियों के प्रति प्रतिवादी संख्या 1 (केंद्र) के सौतेले व्यवहार ने उन्हें निर्वासन और अनिश्चित भविष्य के निरंतर भय में रहने के लिए छोड़ दिया है।
DMK ने लगाया ये आरोप
DMK ने कहा कि CAA मनमाना है क्योंकि यह केवल तीन देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से संबंधित है और केवल छह धर्मों हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों तक सीमित है और स्पष्ट रूप से मुस्लिम धर्म को बाहर करता है।
CAA को चुनौती देने वाली अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष हलफनामा दायर करते हुए डीएमके ने कहा कि धार्मिक अल्पसंख्यकों पर विचार करते हुए भी केंद्र भारतीय मूल के ऐसे तमिलों को रखता है जो उत्पीड़न के कारण श्रीलंका से भागकर वर्तमान में भारत में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं।
तमिलनाडु की गवर्निंग पार्टी के आयोजन सचिव आरएस भारती द्वारा दायर हलफनामे में कहा गया है कि अधिनियम तमिल नस्ल के खिलाफ है और इसी तरह से तमिलनाडु में रहने वाले तमिलों को अधिनियम के दायरे से बाहर रखता है। डीएमके ने अपने हलफनामे में कहा कि इस तरह की अस्पष्टता के कारण उन्हें शिविरों में रहने के लिए मजबूर किया जाता है, जहां भविष्य में सुरक्षा की कोई संभावना नहीं होने के कारण उनका अक्सर शोषण किया जाता है।
डीएमके ने कहा कि अधिनियम जानबूझकर उन मुसलमानों को दूर रखता है जिन्होंने छह देशों में उत्पीड़न का सामना किया था और इसलिए यह अत्यधिक भेदभावपूर्ण और स्पष्ट रूप से मनमाना है। बता दें कि शीर्ष अदालत के समक्ष सीएए के खिलाफ कम से कम 220 याचिकाएं दायर की गईं।
2020 में केरल सरकार ने भी शीर्ष अदालत में सीएए को चुनौती देने वाला पहला राज्य बनने के लिए मुकदमा दायर किया था। सीएए को 11 दिसंबर, 2019 को संसद द्वारा पारित किया गया था और पूरे देश में इसका विरोध किया गया था। यह 10 जनवरी 2020 को लागू हुआ।
इन्होंने दी थी अधिनियम को चुनौती
केरल की एक राजनीतिक पार्टी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML), DMK, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा, कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेता असदुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस नेता देवव्रत सैकिया एनजीओ रिहाई मंच और सिटिजन्स अगेंस्ट हेट, असम एडवोकेट्स एसोसिएशन और कानून के छात्रों सहित अन्य ने अधिनियम को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत में याचिका दायर की थी।
यह कानून हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को नागरिकता देने की प्रक्रिया को तेजी से ट्रैक करता है, जो अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न से भाग गए थे और 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत में शरण ली थी।
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