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Explainer: लोकसभा या राज्यसभा की सदस्यता छिन जाए तो कैसे होगी बहाली, जानें क्या हैं नियम और संविधान में प्रावधान?

Parliament Budget Session: राहुल गांधी की सदस्यता छीनने के लिए BJP सांसद ने एक प्रस्ताव पेश करके उसे पारित करने की मांग की है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर किसी की संसद सदस्यता चली जाती है तो क्या होता है? क्या सदस्यता फिर से बहाल हो सकती है?

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संसद की सदस्यता छिन सकती है तो बहाल भी हो सकती है।

Lok Sabha Membership Disqualification: बजट सत्र 2026 में राहुल गांधी की स्पीच पर खूब बवाल मचा। BJP के विरोध को देखते हुए लोकसभा स्पीकर ने राहुल गांधी को सदन में बोलने नहीं दिया तो कांग्रेस भड़क गई और स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे दिया। अपनी स्पीच को आगे बढ़ाते हुए राहुल गांधी ने एपस्टीन फाइल्स का जिक्र करते हुए केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी पर आरोप लगा दिए।

हंगामा होने पर BJP सांसद निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी के खिलाफ सब्स्टेंटिव मोशन पेश कर दिया, जिसके पारित होने पर राहुल गांधी की सदस्यता जा सकती है। हालांकि इस मोशन के पारित होने से ही सदस्यता नहीं जा सकती, बल्कि संसद की सदस्यता छीनने के कई प्रावधान संविधान की धाराओं में और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत किए गए हैं और छिन चुकी सदस्यता फिर से बहाल भी हो सकती है।

जी हां, अगर किसी सांसद की सदस्यता छिन जाए या उसे अयोग्य करार दे दिया जाए तो संविधान के अनुसार, कुछ नियमों के तहत सदस्यता बहाल हो सकती है। जैसे राहुल गांधी को एक बार अयोग्य करार दे दिया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का स्टे मिल जाने के बाद उनकी सदस्यता बहाल हो गई तो आइए जानते हैं कि संसद की सदस्यता छिन जाए तो कैसे बहाल हो सकती है या कराई जा सकती है…

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Explainer: कब-कैसे छिन सकती है संसद की सदस्यता? लोकसभा के लिए पहले भी अयोग्य घोषित हो चुके राहुल गांधी

अदालत के हस्तक्षेप करने पर बहाल होगी

संविधान के अनुसार, अगर कोई सांसद किसी केस में आरोपी है और दोष सिद्ध हो जाए, 2 साल या इससे ज्यादा जेल की सजा हो जाए तो संसद की सदस्यता छिन जाती है, जिसे कोर्ट के हस्तक्षेप से ही बहाल कराया जा सकता है, यानी सजा पर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट स्टे लगा दे तो ऑर्डर कॉपी लोकसभा या राज्यसभा के सचिवालय में जमा कराकर बहाल कराई जा सकती है। कोर्ट के स्टे ऑर्डर के आधार पर सचिवालय अधिसूचना जारी करके उक्त सांसद की सदस्यता बहाली का आदेश दे सकते हैं।

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समस्या का समाधान हो तो बहाल होगी

अगर किसी सांसद की सदस्यता सरकार में लाभ के पद पर नियुक्त होने, भारत की नागरिकता छोड़कर किसी दूसरे देश की नागरिकता लेने, मानसिक रूप से बीमार या दिवालिया घोषित होने पर छिन जाए तो समस्या का समाधान होने पर सदस्यता बहाल हो सकती है। ऐसा भी होगा, जब यह साबित करेंगे कि समस्या का समाधान हो चुका है। तब संसद सदस्यता के मामले में राष्ट्रपति और विधायकी के मामले में राज्यपाल से चुनाव आयोग सलाह लेगा और फिर चुनाव आयोग की सिफारिश पर ही सदस्यता बहाल की जाएगी।

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बहाली के लिए ये प्रयास कर सकते हैं

अगर दल बदल लेने के कारण लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा चेयरमैन सांसद को सदन के लिए अयोग्य करार दे दिए जाते हैं तो फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है, लेकिन ऐसे मामलों में कोर्ट केस जीतने की उम्मीद न के बराबर होती है। इसके अलावा चुनाव आयोग को भी कुछ मामलों में सांसद की अयोग्यता को रद्द करने और सदस्यता बहाल करने या कम करने की शक्ति प्राप्त है, लेकिन चुनाव आयोग सिर्फ चुनाव संबंधी भ्रष्टाचार के मामलों में ही सदस्यता बहाल करा सकते हैं। आपराधिक मामले में दोषी साबित होने पर ऐसा नहीं होगा।

बता दें कि अगर उपरोक्त तरीकों से सदस्यता बहाली न हो और सदन में सीट खाली रह जाए तो संविधान के नियमानुसार उपचुनाव कराकर सीट भरी जाती है।

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लेखक के बारे में

Khushbu Goyal

खुशबू गोयल News24 हिंदी डिजिटल में चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. वेब जर्नलिज्म में 13 साल का अनुभव रखने वाली खुशबू गोयल राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और राज्यस्तरीय न्यूज और चुनावी कवरेज करती हैं. खुशबू गोयल ने अक्टूबर 2013 में अमर उजाला डिजिटल से अपने करियर की शुरुआत की थी, जहां 7 साल सेवाएं देने के बाद साल नवंबर 2020 में दैनिक भास्कर डिजिटल जॉइन किया और सितंबर 2023 से News24 के डिजिटल में सेवाएं दे रही हैं. 13 साल के करियर में खुशबू गोयल ने नेशनल, इंटरनेशनल, पॉलिटिकल, क्राइम टॉपिक कवर करने में विशेषज्ञता हासिल की. खुशबू गोयल का पत्रकारिता में अनुभव: 13 साल योग्यता: कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के IMC&MT इंस्टीट्यूट से मास्टर ऑफ कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म (MJ) के बाद जर्नलिज्म में MPhil की डिग्री ली. खुशबू गोयल ने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव की विस्तृत रिपोर्टिंग की है, जिसमें उन्हें ग्राउंड कवरेज करने का भी अनुभव है. इसके अलावा पिछले 13 साल में विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव को भी उन्होंने फील्ड रिपोर्टिंग के साथ कवर किया.
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