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खतरे में अरावली, 90% पहाड़ियां सुरक्षा से बाहर, इकोसिस्टम तबाह कर सकता है सुप्रीम कोर्ट का आदेश

FSI का कहना है कि अरावली की 31 पहाड़ियां पहले ही गायब हो चुकी है. यहां पहले से ही माफिया काम कर रहा है और सिस्टम आंख बंद कर चुका है. अवैध खनन वर्षों से हो रहे है ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब, नया कानून उसे वैध करने जैसा है.

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राजस्थान की शान कहे जाने वाले अरावली पर संकट के बादल छाये हुए हैं, ये कोई अचानक उठा तूफान नहीं है, बल्कि खनन माफिया, कानून, अफसरशाही, और राजनीति, सब मिलकर वर्षों से इसकी नींव खोद रहे हैं. अब सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा ने इसे और बड़ा झटका दे दिया है. न्यायालय के अनुसार जो पहाड़ियां 100 मीटर से कम ऊंची हैं तो उन्हें अरावली रेंज नहीं माना जाएगा. यानी, राजस्थान की लगभग 90 फीसदी पहाड़ियां कागजों से गायब हो सकती हैं. सवाल ये है कि सदियों से भुलजल, हवा और पर्यावरण का संतुलन बचाने वाली क्या अरावली की लड़ाई, कानून की है, राजनीति की है… या हमारी सांसों की? या फिर हमारा पानी बचाने की?

दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में एक

आपको बता दें कि अरावली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में एक है, राजस्थान की हर तीसरी नदी इसी से निकलती है. थार के रेगिस्तान और आबादी वाले इलाकों के बीच ये एक प्राकृतिक दीवार की भूमिका निभाती है और अब, इस दीवार पर दरार पड़ी है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि किसी पहाड़ी की 100 मीटर से कम ऊंचाई है तो वह अरावली नहीं कहलाएगी. वहीं, सरकार इस फैसले को वैज्ञानिक परिभाषा बता रही है. जबकि पर्यावरणविद का कहना है कि पहाड़ों को छलनी करने वाले खनन माफियाओं के लिए ये फैसला एक ‘ग्रीन सिग्नल’ है.

सुप्रीम कोर्ट की 100 मीटर वाली परिभाषा ने राजस्थान में तूफान खड़ा कर दिया है. अब पर्यावरण विशेषज्ञों का आरोप है कि यह फैसला खनन माफियाओं के लिए रास्ता खोलता है और आने वाले समय में इसका सबसे बड़ा नुकसान अरावली को होगा. हालत इतनी गंभीर है कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी सोशल मीडिया पर अरावली बचाओ का डीपी लगाकर खुलकर विरोध जताया है. सवाल ये है कि क्या यह फैसला सिर्फ परिभाषा है या अरावली के भविष्य का फैसला? कुल मिलाकर कहा जाए तो यदि सही फैसला नहीं लिया गया तो जल ,वायु, जंगलात और पर्यावरण की ढाल कहे जाने वाले अरावली का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है.

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राजस्थान में 12,081 पहाड़ियां

आंकड़े डराने वाले हैं, क्योंकि राजस्थान की 12,081 पहाड़ियों में सिर्फ 1,048 हैं जो 100 मीटर से ऊंची हैं. यानी बाकी 11,000 पहाड़ है वे अरावली या उसकी श्रृंखला कहलाएगी ही नहीं. कानूनी संरक्षण से इन्हें पूरी तरह बाहर कर दिया गया है. जो जहां जब चाहे और जिस तरह चाहे यहां खनन करके इनकी छाती को छलनी कर सकता है. यानी खनन के लिए खुली छूट का रास्ता खुल जाएगा और ये पहाड़ी रेत-गिट्टी का अंबार बनने को तैयार हो जाएगी, लेकिन अब जरा इसके असर को भी समझ लीजिए. कागजों में तो अरावली बची रहेगी, लेकिन धरातल पर कटे पहाड़, सूखी नदियां और धूल से भरी हवा रह जायेगी.

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यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में भीइसे लेकर हलचल है. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने डीपी बदलकर मुहिम में कूद पड़े. निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने सीधे प्रधानमंत्री को पत्र लिख दिया है, जगह-जगह विरोध हो रहा है, लेकिन साथ ही एक सवाल भी उठ रहा है कि ये आवाज पर्यावरण की चिंता है, या चुनावी मौसम का नया मुद्दा? ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जहां खनन माफिया, रियल एस्टेट लॉबी और सिस्टम का संगम हो वहां पर्यावरण सिर्फ फाइलों में बचता है, जमीन पर नहीं.

क्या है विवाद की असली जड़?


राजस्थान की 12 हजार से ज्यादा पहाड़ियों में से सिर्फ एक हजार के करीब ही 100 मीटर से अधिक ऊंची हैं. यानी नई परिभाषा लागू होने पर 90 फीसदी अरावली कानूनी सुरक्षा से बाहर हो जाएगी. विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इससे अवैध खनन, रियल एस्टेट और जंगल कटाई को खुली छूट मिल जाएगी और इसका असर सिर्फ पहाड़ों पर नहीं पड़ेगा बल्कि बारिश, भूजल और पूरे इकोसिस्टम पर होगा.

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क्यों जरूरी है अरावली?


क्या अरावली सिर्फ पहाड़ है? नहीं, यह एक एक इकोसिस्टम है जो रेगिस्तान को रोकता है, बारिश का पानी रोककर जमीन में उतारता है. तापमान नियंत्रित करता है, धूल भरी आंधी से बचाता है. अगर अरावली नहीं होती तो पूरा राजस्थान आज मरुस्थल होता, और यह कोई जुमला नहीं वैज्ञानिक तथ्य है. यानी अरावली कटेगी तो अकाल बढ़ेगा, जल संकट भी, रेगिस्तान आगे बढ़ेगा और इसका असर दिल्ली तक होगा.

अरावली में बसी राजस्थान की संस्कृति


जबकि इसी अरावली में ऐतिहासिक किले, कुंभलगढ़, सरिस्का, झालाना, नाहरगढ़ और जवाई जैसे बड़े फारेस्ट रिसर्व के जंगल, शहर,क्रिटिकल मिनरल्स और चंबल, बनास, सहाबी, काटली जैसी सैकड़ों छोटी-बड़ी नदियां भी है, जो कि पूर्वी राजस्थान में खेती और पशुपालन की आधारशीला भी है. एक रिपोर्ट के मुताबिक अरावली की संरचनाएं सालाना 20 लाख लीटर प्रति हेक्टयर भूमिगत जल रिचार्ज करती है. अरब सागर से बंगाल की खाड़ी से आने वाला मानसून अरावली पर्वतों की घुमावदार संरचना और बनावट के चलते इनसे टकराकर पूरे प्रदेश में बारिश करता है.

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31 पहाड़ियां पहले ही गायब


FSI का कहना है कि अरावली की 31 पहाड़ियां पहले ही गायब हो चुकी है. यहां पहले से ही माफिया काम कर रहा है और सिस्टम आंख बंद कर चुका है. अवैध खनन वर्षों से हो रहे है ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब, नया कानून उसे वैध करने जैसा. मामला उस वक्त और भी गंभीर हो जाता है जब राजस्थान सरकार एक तरफ 250 करोड़ अरावली विकास के लिए जारी कर चुकी है, वहीं दूसरी तरफ कैनची थमाती है.पर असली सवाल सरकार क्या करेगी? या न्यायालय क्या करेगा? यह नहीं है बल्कि असली सवाल यही है कि हम क्या करेंगे? क्यों? क्योंकि पानी हमारा है, हवा हमारी है. रेगिस्तान का फैलाव हमारी जमीन पर होगा. अरावली कटेगी तो किसान मरेगा.शहरों में पानी महंगा होगा. यानी आज का यह पर्यावरण का मुद्दा जनजीवन का मुद्दा बन जाएगा. शायद यही वजह है कि अरावली बचाओ आंदोलन अब सिर्फ एक मांग नहीं मुकाबला है. विकास बनाम विनाश और मुनाफे बनाम पर्यावरण का. कुल मिलाकर अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं राजस्थान की रीढ़ है और रीढ़ पर चोट पूरे शरीर को कमजोर करती है.

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