सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने लोकसभा में मंगलवार को सरकार पर निशाना साधा. उन्होंने सरकार की ओर से पेश किए गए बजट पर बोलते हुए कहा कि इस सरकार को ना तो किसानों की और ना ही आम जनता की फिक्र है. अखिलेश यादव ने कहा कि यह सरकार कहती थी कि हम किसानों की आय दोगुनी कर देंगे, लेकिन आज आप देख सकते हैं कि किसान कहां खड़े हैं.
अखिलेश यादव ने कहा- अमेरिका से डील नहीं, ढील हुई
भारत और अमेरिका के बीच हुई फ्री ट्रेड डील पर निशाना साधते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि अमेरिका के साथ डील नहीं, ढील हुई है. अगर यही डील होनी थी, तो 11 महीने इंतजार क्यों किया गया? भाजपा का कहना है कि हम लोगों ने दुनिया में बहुत सारे देशों से फ्री ट्रेड डील कर ली हैं. मैं सरकार से पूछना चाहता हूं कि अभी कितने देश और बचे हैं, जिनसे आप एफटीए नहीं कर पाए. कुछ ऐसे भी देश बचे होंगे शायद जिनसे आपकी इच्छा होगी कि हम डील कर लें, अगर एफटीए हो भी जाती है, तो जो लोग कभी रुपये के बारे में बहुत चिंता करते थे. वो बताएं कि इतनी डील होने के बाद हमारा रुपया कहां पहुंच गया?
अखिलेश यादव ने कहा- अमेरिका से डील एकतरफा
अखिलेश यादव ने कहा, बजट पर सबसे पहला सवाल यही है कि डील पहने बनी या बजट? बजट का हलवा यहां ज्यादा बंटा कि वहां? जब यह डील हुई तो इस बजट को लाने से पहले आत्मनिर्भरता तो अपने शब्दकोष से हटा दिया है. पूरा देश समझ रहा है कि हमने अपना बाजार एक बार और खोल दिया है. 500 बिलियन डॉलर का बाजार एकतरफा. हमारी आत्मनिर्भरता और स्वदेशी कहां जाएगी?
हमारी जनता भाजपा से कह रही है कि जहां तक हमें मालूम है, डील एक तरफा नहीं होती है. जनता ये भी जानना चाहती है कि जीरो बड़ा कि 18. भाजपा का गणित यह है कि 18 हमारे जीरो से बड़ा है. किसानों, उद्योगों, दुकानों को बचाने के लिए खोखले शब्दों के अलावा भाजपा के पास कुछ और है या नहीं.
यह बजट दिशाहीन है. इस बजट में कोई विजन नहीं है कि 2047 तक हमारा देश विकसित भारत बन जाएगा. हम लोगों को तो सरकार से पहले ही उम्मीद नहीं थी, जिस सरकार से उम्मीद नहीं है, उसके बजट से क्या उम्मीद होगी. इस बजट में पीडीए के लिए कुछ नहीं है. कोई योजना, दलित, महिला, पिछड़ा और अल्पसंख्यक के विकास के लिए नहीं लाई गई है. ऐसा लग रहा है कि सरकार ने इनके लिए सोचना ही छोड़ दिया. अगर जीडीपी हमारी सात फीसदी है, है तो नॉमिनल जीडीपी की ग्रोथ केवल 8 फीसदी है. जो कि करीब 12 फीसदी होनी चाहिए. इस वजह से लोगों के हाथ में कम पैसा है. जो लोग ये कहते हैं कि हम प्रति व्यक्ति आय बढ़ा रहे हैं. जो आंकड़े हमारे पास हैं, जो जानकारी हमारे पास है, वो यही कहते हैं कि हमारी आय तीन हजार डॉलर प्रति व्यक्ति है. दुनिया से इतना ही जुड़ गए हैं तो 2025 की रैंकिंग में हमारा स्थान 144वां क्यों है? हम 10-12 साल से इतने बजट ला रहे हैं फिर भी हमारे लोगों की आय नहीं बढ़ पाई. सदन में कई बार ये पूछा गया कि जो लोग राशन ले रहे हैं, बीपीएल हैं, उनकी पर केपिटा इनकम क्या है? ये तो सरकार को बताना ही चाहिए.
बजट में कोई विजन नहीं
पिछड़ेपन को दूर करने के लिए बजट में कोई विजन नहीं है. यूपी में डबल इंजन की सरकार होने के बावजूद, वहां के लोगों के विकास के लिए कोई खास योजना नहीं है. वैसे तो बड़ी-बड़ी योजनाएं बताई जा रही हैं. लेकिन यूपी जहां से पीएम मोदी सांसद हैं, लेकिन भारत सरकार के बजट से वहां अभी तक कोई भी एक्सप्रेसवे नहीं बना पाया. जो लोग भ्रष्टाचार पर सवाल उठाते हैं, वो लोग अपनी सड़कों को देखें कि हजारों करोड़ रुपये खर्च करके क्या बनाया?
इनके पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे, उनके नाम से एक्सप्रेसवे बन रहा था, हम लोगों ने अखबरों में पढ़ा कि हम एक्सप्रेसवे बना रहे हैं. उनके नाम के बनने के साथ-साथ उसका नाम भी बदल दिया. पहले वो चंबल एक्सप्रेसवे बन रहा था. लगता है वो जमीन पर नहीं बन रहा था, वो कागजों पर बन रहा था.
इस डील के बाद हमारे किसानों का हाल क्या होगा? जब सब विदेश से ही आएगा तो हमारा किसान जमीन पर क्या उगाएगा? क्या बेच पाएगा. सरकार ने बड़ा बजट पेश किया, कहा कि हम एग्रीकल्चर इंफ्रा तैयार करेंगे. मंडियां-बाजार तैयार करेंगे. हमारे किसान जब काले कानून के खिलाफ लड़ रहे थे, कईयों की जान जाने के बाद वापस लिए.
लोहे पर पीतल चढ़ाकर भी बेटी को विदा नहीं कर पाएगा गरीब
सरकार हमारे किसानों को अभी भी एमएसपी की कानूनी गारंटी नहीं दे पाई. एमएसपी की गारंटी हम इसलिए मांग रहे हैं, क्योंकि हम घर कैसे चलाएंगे. बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे. इधर जहां फसल की कीमत नहीं मिल पा रही है, वहीं सोने के भाव कहां पहुंच गए. पहले गरीब सोचता था कि जब हम बेटी को विदा करेंगे तो सोने का एक सामान खरीदकर देंगे, अब सोना चांदी तो दूर, अगर यही सरकार चलती रही तो लोहे पर पीतल चढ़ाकर भी गरीब अपनी बेटी को विदा नहीं कर पाएगा. ये किसानों के बड़े सवाल हैं. ये जो बजट बनाते हैं उसमें आम जनता की ना जिक्र है, ना फिक्र है. फिर्क होती तो किसानों को खाद, बीज, बिजली और सस्ती सिंचाई मिल जाती. सरकार ने किसानों को अपने हाल में छोड़ दिया. मंडियों में कोई खरीद नहीं हुई.
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