बांग्लादेश चुनाव के नतीजे दुनिया के सामने हैं. तीन दशक से अधिक समय तक बेगम V/S बेगम की लड़ाई वाले बांग्लादेश में इस बार रहमान V/S रहमान की टक्कर हुई. जिसमें तारिक रहमान की अगुवाई वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP को चुनाव में प्रचंड जीत मिली. वहीं, शफीकुर रहमान की जमात-ए-इस्लामी सत्ता की रेस में बहुत पीछे छूट गई. शेख हसीना सरकार के खिलाफ आंदोलन से निकली नेशनल सिटीजन पार्टी यानी NCP सन्नाटे में है. लेकिन, ये सब आखिर हुआ कैसे? मंथन इस बात पर भी हो रहा है कि अब बांग्लादेश का क्या होगा? बांग्लादेश के चाल, चरित्र और चेहरे को कितना बदल पाएंगे BNP के रहमान? क्या BNP अब पुराने केचुल से पूरी तरह बाहर निकल चुकी है? सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या अवामी लीग के वोटर BNP की ओर शिफ्ट हो गए? क्या अवामी लीग ने जमात-ए-इस्लामी को रोकने के लिए अपने समर्थकों को BNP के पक्ष में मतदान के लिए कहा? सवाल ये भी उठ रहा है कि तारिक रहमान की जीत के भारत के लिए मायने क्या हैं? नई फिजाओं में ढाका और दिल्ली के बीच रिश्ते किस तरह के रहेंगे? क्या सत्ता की लड़ाई में मात खा चुकी जमात-ए-इस्लामी फिर से अपने कट्टरपंथी एजेंडा को आगे नहीं बढ़ाएगी? बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा नहीं होगी? तारिक रहमान क्या कट्टरपंथियों से ठीक उसी तरह निपटेंगे - जैसा शेख हसीना के दौर में हुआ करता था? क्या कट्टरपंथी तारिक रहमान के खिलाफ भी उसी तरह आंदोलन नहीं छेड़ेंगे - जैसे शेख हसीना के दौर में हुआ? 17 साल बाद विदेश से बांग्लादेश लौटे तारिक रहमान ने चुनाव में कमाल कर दिया. लेकिन, अब उनके सामने बड़ी चुनौती है, समय-समय पर सुलगते, उलझते, जूझते बांग्लादेश को संभालने की. युवाओं के अधूरे सपने पूरा करने की. पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को पटरी पर लाने की. मुल्क में सही मायनों में लोकतंत्र बहाल करने की.
पूरब में पड़ोसी बांग्लादेश में भारत की दिलचस्पी की कई वजह है. पहली, भारत-बांग्लादेश के बीच चार हजार किलोमीटर से अधिक लंबी सरहद लगती है. दूसरी, दोनों देशों के बीच कई ऐसे प्वाइंट हैं - जहां सरहद पर बाड़ नहीं है. तीसरी, जब भी बांग्लादेश में उथल-पुथल या हिंसा होती है - भारत में घुसपैठ की आशंका बढ़ जाती है. चौथी, बांग्लादेश के एक मुल्क के रूप में वजूद में आने में भारत की बड़ी भूमिका रही है. ऐसे में भारत हमेशा चाहता है कि बांग्लादेश में स्थिरता रहे. शांति रहे, समृद्धि रहे. लोकतांत्रिक रूप से चुनी सरकार रहे. जिससे द्विपक्षीय मुद्दों को बातचीत के जरिए सुलझाया जा सके. 12 फरवरी को हुए चुनाव में BNP को प्रचंड बहुमत मिला. जिसकी उम्मीद शायद ना तारिक रहमान ने की होगी. ना उनकी पार्टी के नेताओं ने. तो क्या अवामी लीग का चुनावी अखाड़े से आउट होना BNP की प्रचंड जीत की वजह बना? सवाल ये भी है कि आखिर बांग्लादेश के लोगों ने कट्टरपंथी जमात को क्यों खारिज किया?
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बांग्लादेश चुनाव में दो तिहाई से अधिक सीटों पर जीत, लेकिन कोई जश्न नहीं. कोई शोर-शराबा नहीं. कोई विजय जुलूस नहीं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं. ये तारिक रहमान की अगुवाई वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का नया रास्ता है. शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद बांग्लादेश की मस्जिदों में खास प्रार्थना सभाओं का आयोजन हुआ. BNP के सर्वेसर्वा तारिक रहमान भी जुमे की नमाज के बाद मस्जिद से निकलते कैमरे में दिखे. बांग्लादेश के लोगों ने तो अपना फैसला सुना दिया, अब वहां के लोगों की आंखों में पल रहे सपनों को पूरा करने की जिम्मेदारी तारिक रहमान के कंधों पर है. 16 फरवरी को प्रधानमंत्री के रूप में उनका शपथ लेना तय माना जा रहा है.
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बांग्लादेश चुनाव में तारिक रहमान की BNP और शफीकुर रहमान की जमात-ए-इस्लामी के बीच सीधी टक्कर थी. दोनों ही पार्टियों ने कई छोटी पार्टियों से गठबंधन भी किया था. लेकिन, बांग्लादेश के लोगों ने कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी की तुलना में उदार तारिक रहमान के चेहरे पर भरोसा किया. ऐसे बांग्लादेश में तारिक रहमान की जीत के पीछे पांच बड़ी वजह मानी जा रही है.
- अवामी लीग का चुनावी प्रक्रिया से बाहर होना
- अवामी लीग के हिंदू वोटरों का BNP के साथ आना
- जमात-ए-इस्लामी अपने अतीत से पीछा नहीं छुड़ा पायी । मुक्ति संग्राम में जमात ने पाकिस्तानी आर्मी का साथ दिया था ।
- छात्रों की नेशनल सिटीजन पार्टी में अंदरुनी कलह और जमात से गठबंधन महंगा पड़ा ।
- महिलाओं ने कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी की जगह उदार BNP को चुना।
जमात-ए-इस्लामी ने भी इस चुनाव में अपना पुराना लवादा उतारने की कोशिश की. लेकिन, बांग्लादेश की बड़ी आबादी के दिल में कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी जगह नहीं बना पायी. पहली बार बांग्लादेश में जमात ने इतने बड़े पैमाने पर चुनाव लड़ा. चुनावी मेनिफेस्टो के जरिए अपनी कट्टरपंथी छवि को मिटाने की कोशिश की. महिलाओं को लेकर रूख में बदलाव किया. विदेश नीति को लेकर भी अपने स्टैंड में बदलाव के संकेत दिए. लेकिन, जमात-ए-इस्लामी के नेता सत्ता की रेस में बहुत पीछे छूट गए.
अब जमात-ए-इस्लामी के नेता चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं. चुनावों में गड़बड़ी और धांधली जैसे सुर को हवा देने की भी कोशिश हो रही है. माना जा रहा है कि जुलाई 2024 में शेख हसीना सरकार के खिलाफ आंदोलन करने वाले छात्र और उनसे जुड़े लोगों ने भी जमात की जगह BNP को वोट दिया. माना जा रहा है कि अमेरिका और जमात के नेताओं में मेल-मुलाकात की ख़बरों से भी चुनाव में जमात-ए-इस्लामी को नुकसान हुआ. BNP ने चुनाव में जमात और अमेरिका के बीच सीक्रेट डील को बड़ा मुद्दा बनाया था . BNP ने जोर शोर से प्रचार किया कि अगर जमात सत्ता में आती है तो बांग्लादेश की शांति और सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हो सकता है. तारिक रहमान का हर दांव फिट बैठा और अब वो बांग्लादेश में सत्ता के नए चांद है.
तारिक रहमान 17 साल बाद बांग्लादेश लौटे. 50 दिन से भी कम समय में उन्होंने एक ऐसी रणनीति के साथ आगे बढ़े – जिसमें खुद को यूथ और मिडिल क्लास वोटरों से कनेक्ट किया. खुद को शांत, सुनने वाला, नीति और नीयत में साफ-सुथरा नेता के तौर पर पेश करने की कोशिश की. शायद उनकी मां बेगम खालिदा जिया की मौत के बाद पैदा सहानुभूति लहर का BNP को फायदा मिला. एक दौर था - जब बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी की सोच में खास अंतर नहीं माना जाता था. कभी ढाका में दोनों की गठबंधन सरकार भी रह चुकी है. लेकिन, 2026 में BNP और जमात आमने-सामने रहे. राजनीतिक प्रतिद्वंदी के रूप में. आज की तारीख में अपनी मां बेगम खालिदा जिया की तुलना में तारिक रहमान उदार चेहरे के साथ बांग्लादेश की राजनीति में हैं. लेकिन, सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या कट्टरपंथी तारिक रहमान को चैन से हुकूमत चलाने देंगे? क्या जमात की कट्टरपंथी ब्रिगेड ढाका में जुलाई 2024 जैसी तस्वीर दोहराने की कोशिश नहीं करेगी? तारिक रहमान के सामने खड़ी चुनौतियों में से एक कट्टरपंथियों से निपटने की भी है.
जमात-ए-इस्लामी के कर्ताधर्ता शफीकुर रहमान की उम्मीदों पर पानी फिर गया. उनकी रणनीति और गुप्त डील उन्हें सत्ता तक नहीं पहुंचा पायी. करीब डेढ़ साल पहले शेख हसीना सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए जमात की कट्टरपंथी बिग्रेड ने जो उग्र आंदोलन छेड़ा. उसका चुनाव के बाद फायदा जमात को नहीं BNP को मिल रहा है. ऐसे में जमात की कट्टरपंथी ब्रिगेड के लंबे समय तक शांत बैठने के चांस बहुत कम हैं.
तारिक रहमान भले ही 17 साल बाद अपने मुल्क बांग्लादेश लौटे हों. लेकिन, वहां की सत्ता के मिजाज को बहुत अच्छी तरह जानते हैं. वो जमात नेताओं के DNA से भी अच्छी तरह परिचित हैं. वो तीन बार की प्रधानमंत्री खालिदा जिया और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान के बेटे हैं. साल 2001 से 2006 के बीच बांग्लादेश में खालिदा जिया सरकार के दौरान तारिक की गिनती वहां से सबसे प्रभावशाली लोगों में होने लगी थी. उन्हें शैडो प्राइम मिनिस्टर माना जाने लगा. कहा जाता था कि बिना उनकी मर्जी के कोई बड़ा नीतिगत फैसला नहीं होता था - ये वो दौर था जब BNP और जमात के बीच गठबंधन था. ऐसे में हार से बौखलाए जमात के नेता कहां तक जा सकते हैं? इसका भी हिसाब राजनीतिक के मंझे खिलाड़ी तारिक रहमान जरूर लगा रहे होंगे.
भले ही चुनाव के दौरान जमात नेता अल्पसंख्यक हिंदुओं से तार जोड़ने की कोशिश करते दिखे. लेकिन, एक सच्चाई ये भी है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले में जमात की कट्टरपंथी ब्रिगेड का ही नाम आगे आता है. ऐसे में अगर हार से हताश कट्टरपंथी अपने मजहबी एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए फिर से पुराने फॉर्मूले को आजमाए. तो बहुत हैरानी नहीं होनी चाहिए. आने वाले समय में कट्टरपंथियों के नफरती और हिंसक एजेंडे को रोकना तारिक रहमान के सामने बड़ी चुनौती होगी.
युवाओं को नया बांग्लादेश का सपना दिखाकर तारिक रहमान सत्ता में वापसी कर रहे हैं. ऐसी स्थिति में उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती मुल्क की आर्थिक सेहत ठीक करने की है. जिससे युवाओं को अधिक से अधिक रोजगार मिल सके. बांग्लादेश के कॉटन समेत दूसरे उद्योगों को नई जान मिल सके. महिलाओं को तरक्की का पूरा मौका मिल सके. अगर तारिक रहमान मुल्क के युवाओं की उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाएंगे. उनके भीतर की असंतोष की आग को शांत करने का रास्ता नहीं निकाल पाएंगे. तो विपक्ष में बैठे जमात के नेता उस असंतोष को भुनाने के लिए युवाओं को फिर आगे कर सकते हैं. ठीक उसी तरह जैसा जुलाई 2024 में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई शेख हसीना सरकार के खिलाफ किया था.
तारिक रहमान के सामने बड़ी चुनौती बांग्लादेश में कट्टरपंथियों की जमात से निपटने की है. एक ऐसा रास्ता निकालने की है - जिससे उनके मुल्क में लोकतंत्र और मजबूत हो. नफरती और कट्टर सोच को हवा-पानी देने वालों का इलाज उसी तरह हो - जैसा कभी शेख हसीना के दौर में हुआ करता था.
60 साल के तारिक रहमान अच्छी तरह जानते हैं कि बांग्लादेश के युवाओं के मन में क्या है? वहां की महिलाएं क्या चहती हैं? मुल्क के बेरोजगारों को रोजगार दिलाने के लिए कहां कड़े और बड़े फैसले लेने की जरूरत है? तारिक रहमान अपने पिता और बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान और अपनी मां पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया की तुलना में उदार नीतियों को आगे बढ़ाते दिख सकते हैं. शेख हसीना के तख्ता पलट के बाद से ढाका और दिल्ली के रिश्तों में कड़वाहट देखी गई. वहां की आंतरिक सरकार के कर्ताधर्ता मोहम्मद यूनुस का झुकाव पाकिस्तान और चीन की ओर रहा. उन्होंने कट्टरपंथियों को संरक्षण दिया. जमात-ए-इस्लामी के नेताओं के साथ मोहम्मद यूनुस के रिश्ते छिपे नहीं थे. लेकिन, बांग्लादेश के लोगों ने भारत विरोधी रूख वाली सोच को खारिज कर दिया. ऐसे में माना जा रहा है कि तारिक रहमान भारत के साथ रिश्तों को बेहतर करने का विकल्प चुनना पसंद करेंगे. दिल्ली और ढाका के बीच केमिस्ट्री सुधारने के सिग्नल मिलने लगे हैं.
तारिक रहमान अच्छी तरह जानते हैं कि उनका बांग्लादेश किस तरह की चुनौतियों से जूझ रहा है? वो प्रधानमंत्री की जिस कुर्सी पर बैठने वाले हैं - उसके नीचे कितने शूल हैं. ऐसे में बिना भारत जैसे ताकतवर पड़ोसियों से बेहतर रिश्ता बनाए. बांग्लादेश की मुश्किलें कम नहीं हो सकती हैं. शायद इसीलिए, दिल्ली-ढाका के बीच बेहतर रिश्तों का सिग्नल पहले से मिलने लगे हैं.
तारिक रहमान ये बात भी अच्छी तरह समझ चुके हैं कि एक कामयाब पीएम बनने के लिए उन्हें भारत के समर्थन की जरूरत है. ऐसे में बांग्लादेश के मौजूदा हालात के बीच वो कम से कम भारत के साथ दुश्मनी तो नहीं चाहेंगे. बांग्लादेश की 90% से अधिक सरहद भारत से लगती है. ऐसी स्थिति में तारिक रहमान का 'बांग्लादेश फर्स्ट' एजेंडा बिना भारत की मदद के पूरा नहीं हो सकता है .
दोनों देशों के बीच कारोबार, सीमा प्रबंधन, घुसपैठ, तस्करी, नदी जल बंटवारा और सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दों पर साझा हित जुड़े हैं. दोनों देशों के बीच तीस्ता नदी जल बंटवारा का विवाद पुराना है. जो अभी पूरी तरह सुलझा नहीं है. इस साल दिसंबर से पहले गंगा जल संधि भी रिन्यूअल होनी है. ऐसे में साझा हित से जुड़े मुद्दों पर दिल्ली और ढाका के बीच बेहतर केमेस्ट्री दिखनी तय मानी जा रही है.
शेख हसीना के दौर में ढाका और दिल्ली के बीच रिश्ते बहुत बेहतर रहे हैं. अगस्त 2024 में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से वो भारत में रह रही हैं. उसके बाद वहां की अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद युनूस ने चीन और पाकिस्तान से नजदीकियां बढ़ाई. बीजिंग और ढाका के बीच मेल-मुलाकात और करार सब दिखा. इस बीच, दिल्ली-ढाका के बीच रिश्तों से गर्मजोशी गायब हो गईं.
इतिहास गवाह रहा है कि जब भी बांग्लादेश में BNP की हुकूमत रही. दिल्ली-ढाका के बीच रिश्तों में उतार-चढ़ाव, ऊंच-नीच चलता रहा. लेकिन, शेख हसीना के प्रत्यर्पण के मुद्दे पर कूटनीति रस्साकशी दिख सकती है. माना जा रहा है कि जमात-ए-इस्लामी तारिक रहमान पर शेख हसीना के भारत से प्रत्यर्पण के लिए दबाव बना सकती है. BNP के भीतर से भी ऐसे सुर उठने तय माने जा रहे हैं. ऐसे में शेख हसीना के मुद्दे पर भविष्य में दिल्ली-ढाका के बीच कूटनीतिक रस्साकशी दिख सकती है.
अगर तारिक रहमान भारत से बेहतर रिश्ता चाहते हैं. दिल्ली से बेहतर रिश्तों में बांग्लादेश का बेहतर कल देख रहे हैं तो उन्हें भारत के खिलाफ किसी भी तरह की आक्रमक बयानबाजी पर रोक लगाना होगा. कारोबारी रिश्तों को मजबूती देने के लिए वैश्विक व्यवस्था में आते बदलावों के हिसाब से भारत के साथ खड़ा होना होगा. कट्टरपंथियों पर नकेल कसना होगा, जिससे बांग्लादेश में स्थिरता बनी रहे. भारत से लगी 4000 किलोमीटर से अधिक लंबी सरहद पर हर तरह की अवैध तस्करी और गतिविधियों पर रोक लगानी होगी. आर्थिक वजहों से बांग्लादेश से भारत में होनेवाले विस्थापन के मुद्दे को गंभीरता से देखना होगा. बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर होने वाले हमले रोकने का ठोस उपाय करना होगा.
इतिहास गवाह है कि चाइना ने दिल्ली-ढाका के रिश्तों में संकट का फायदा उठाने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई. कभी पर्दे के पीछे से तो कभी खुलम-खुला. जमात-ए-इस्लमी के नेताओं का पाकिस्तान से कनेक्शन पुराना है. ऐसे में अब देखना ये है कि तारिक रहमान किस कूटनीति के जरिए ढाका को इस्लामाबाद और बीजिंग के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त रख पाते हैं?
BNP चुनावी घोषणापत्र में साफ-साफ कह चुकी है कि विदेश नीति में 'बांग्लादेश फर्स्ट' चलेगा. कोई भी मुल्क अपनी विदेश नीति में राष्ट्रीय हित को सबसे ऊपर रखता है. तारिक रहमान ने भी वही किया. लेकिन, उन्होंने अपनी विदेश नीति को लेकर एक बात और बिना लाग-लपेट के कहा, 'फ्रेंड्स यस, मास्टर नो.' इसका एक मतलब ये निकलता है कि तारिक रहमान की अगुवाई वाली BNP दोस्तों का तो इस्तकबाल करेगी. लेकिन, हेकड़ी किसी की बर्दाश्त नहीं करेगी. अमेरिका, चीन, पाकिस्तान जैसे देशों के प्रभाव और हेकड़ी से तारिक रहमान ढाका को दूर रखने की नियत से आगे बढ़ना चाहते हैं. ऐसे में दिल्ली-ढाका के रिश्ते ठीक उसी दौर जैसे होने के चांस बन रहे हैं – जैसा शेख हसीना के शासन में हुआ करता था. एक सच्चाई ये भी है कि कूटनीति में जो बातें सार्वजनिक मंचों से कही जाती है – उसके ठीक उलट रणनीति पर भीतर खाने काम होता है. भले ही बांग्लादेश में चुनाव हो गया, प्रचंड बहुमत से BNP की सत्ता में वापसी हो रही है. लेकिन, वहां की फिजाओं में एक सवाल अभी भी गूंज रहा है कि क्या बांग्लादेश की पॉलिटिक्स से अवामी लीग का सफाया हो गया. तारिक रहमान को जिस तरह के आरोपों की वजह से 17 साल पहले मुल्क छोड़ना पड़ा था. अगर फिर वैसी स्थिति आ गई तो क्या होगा? ऐसे में दो चेहरों पर नजरें जा रही हैं - एक तारिक रहमान की पत्नी डॉक्टर जुबैदा रहमान और दूसरी उनकी बेटी जाइमा रहमान पर, 28 साल की जाइमा तो चुनाव प्रचार के दौरान BNP के लिए वोट मांगती भी दिखी. अवामी लीग की कर्ताधर्ता शेख हसीना की उम्र 78 साल है. बांग्लादेश में फिलहाल उनकी अवामी लीग पर प्रतिबंध है. अब कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या उनके बेटे साजीब वाजेद या बेटी साइमा वाजेद अवामी लीग की कमान संभाल सकते हैं? क्या भविष्य में बांग्लादेश की राजनीति बेटी V/S बेटी यानी तारिक रहमान की बेटी और शेख हसीना की बेटी साइमा वाजेद की परिक्रमा कर सकती है?
BNP की तूफानी जीत के लिए जितनी चर्चा तारिक रहमान की हो रही है. उतनी ही उनकी बेटी जाइमा रहमान की भी हो रही है. चुनाव प्रचार के दौरान लोगों से सीधा कनेक्शन जोड़ने का आइडिया पिता तारिक को बेटी जाइमा ने ही दिया. लोगों से जुड़ने के लिए तारिक रहमान ने 'चायेर अड्डा' यानी चाय पर बातचीत कैंपेन की शुरुआत की. तो खुद लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई करने वाली जाइमा ने रिक्शा से चुनाव प्रचार किया. वो प्रचार के दौरान हमेशा पारंपरिक कपड़ों में दिखी. संस्कारी बेटी का ये अवतार शायद लोगों के बहुत पसंद आया. आज की तारीख में 28 साल की जाइमा रहमान को बांग्लादेश में महिलाओं की आवाज के तौर पर देखा जा रहा है. हर मुश्किल वक्त में तारिक रहमान के साथ खड़ी रहने वाली उनकी पत्नी डॉक्टर जुबैदा भी चुनाव प्रचार में उनके साथ खड़ी दिखीं. महिला वोटरों को BNP के पक्ष में लाने में तारिक रहमान की पत्नी और बेटी ने बड़ी भूमिका निभाई. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में जाइमा रहमान बांग्लादेश पॉलिटिक्स में बड़ा चेहरा बन सकती है.
बांग्लादेश में ये भी चर्चा हो रही है कि अवामी लीग का क्या होगा? बांग्लादेश के राजनीतिक मिजाज को समझने वालों की सोच है कि तारिक रहमान के पास दो विकल्प हैं. एक अवामी लीग पर लगे प्रतिबंध को खत्म करना और दूसरा प्रतिबंध जारी रखना. माना जा रहा है कि तारिक रहमान चाहेंगे कि अवामी लीग की भविष्य में एंट्री हो जाए. जिससे बांग्लादेश पॉलिटिक्स में जमात किनारे लग जाए? ऐसे में सवाल ये है कि भविष्य में अवामी लीग की कमान कौन संभालेंगा? अब शेख हसीना 78 साल की हो चुकी हैं. ऐसे में उनके बेटे साजेब वाजेद और बेटी साइमा वाजेद पर नजरें टिक जाती हैं. फिलहाल अमेरिका में रह रहे साजेब वाजेद का कहना है कि BNP के साथ बातचीत के रास्ते खुले हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन में साउथ-ईस्ट एशिया की रीजनल डायरेक्टर के रूस में काम कर चुकी साइमा वाजेद को भी भविष्य में बांग्लादेश की राजनीति के चमकदार चेहरे के तौर पर देखा जा रहा है.
पिछले 35 सालों से बांग्लादेश में राजनीति बेगम खालिदा जिया और शेख हसीना के बीच परिक्रमा करती रही. मुल्क की कमान अब एक पुरूष यानी तारिक रहमान के हाथों में जाएगी. लेकिन, ये भी सुगबुगाहट तेज होने लगी है कि भविष्य में बांग्लादेश पॉलिटिक्स जाइमा बनाम साइमा यानी तारिक रहमान की बेटी बनाम शेख हसीना की बेटी की परिक्रमा कर सकती है.
राजनीति और कूटनीति में कुछ भी असंभव नहीं है. जनवरी 2024 में प्रचंड बहुमत से अवामी लीग के सत्ता में आने के बाद शेख हसीना ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उन्हें प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर 7-8 महीने में ही मुल्क छोड़कर भागना पड़ेगा? शेख हसीना सरकार का तख्ता पलट करने वाले छात्र नेताओं ने भी नहीं सोचा होगा कि उनकी पार्टी की सीटें डबल डिजिट नहीं छू पाएंगी? जमात-ए-इस्लामी के नेताओं ने भी नहीं सोचा होगा कि सत्ता हाथ नहीं आएगी? लेकिन, बांग्लादेश के लोगों ने कट्टरपंथियों की जगह उदार और लोकतांत्रिक तारिक रहमान को चुना. उदार बीएनपी को चुना, अब तारिक रहमान के सामने असली चुनौती ये है कि वो बांग्लादेश के लोगों की उम्मीदों पर कितना खरा उतरते हैं? दिल्ली-ढाका के बीच रिश्तों में कितनी मिठास बढ़ाते हैं. ढाका को बीजिंग और इस्लामाबाद के प्रभाव से कितना आजाद रख पाते हैं? 4000 किलोमीटर से अधिक लंबे भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर अवैध गतिविधियों को कंट्रोल करने में कितनी ईमानदारी से भूमिका निभाते है? बांग्लादेश में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदू हिसाब लगा रहे हैं कि अब वो सुरक्षित हैं या फिर कट्टरपंथियों के हमले और बढ़ेंगे? रहमान का मतलब होता है - मेहरबान. ऐसे में उनकी मेहरबानियों की प्राथमिकता सूची पर बहुत हद तक उनके बांग्लादेश का भविष्य तय होगा? बांग्लादेश के तारिक रहमान पर ईमानदारी से उन गलतियों को भी ठीक करने की जिम्मेदारी है – जो अतीत में बांग्लादेश में हुईं हैं.