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भारत निर्माण के सारथी की कहानी, जिन्होंने हिंदुस्तान के गणतंत्र को बनाया बुलंद लोकतंत्र

Republic Day 2026: पिछले सात दशकों में भारत के संसदीय लोकतंत्र में अगर लोगों की आस्था लगातार बढ़ी है... तो इसमें एक बड़ा योगदान निष्पक्ष चुनाव की सोच को भी जाता है . चुनाव आयुक्त की कुर्सी पर बैठे उन शख्सियतों को भी जाता है.

कोई तो सोच रही होगी - जिसमें राखीगढ़ी, हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसी सभ्यताएं फली-फूली. कोई तो सोच रही होगी जिसमें शहर बसे, गांव बसे उनके बीच रहने वाले लोगों के बीच नई जीवनशैली ने आकार लिया . कोई तो सोच रही होगी, जिसमें ज्ञान के प्रसार के लिए तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय खुले…वो भी तो कोई तो सोच रही होगी. जिसमें अजंता-एलोरा में पत्थरों को काट कर विशालकाय गुफाएं बनाई गईं - उनके भीतर न जाने कितने ही शिल्पकारों ने कितने ही वर्षों तक अपनी छेनी से अद्भुत और अकल्पनीय कला से पूरी दुनिया को साक्षात्कार कराया होगा. वो भी तो कोई सोच रही होगी–जिसमें दक्षिण भारत में विशालकाय मंदिर खड़े हुए. मध्यकाल में मुगलों ने कई किले बनवाए. मोहब्बत की निशानी के तौर पर दिल्ली में हुमायूं का मकबरा और आगरा में ताजमहल खड़ा है. वो भी कोई सोच रही होगी– जिसमें भारत के भीतर रेल दौड़ी, आजादी के बाद IIT-IIM और एम्स जैसे संस्थान खुले. वो भी तो कोई सोच रही होगी –जिसमें भारत की तरक्की का फलसफा निकला होगा. आज हमने प्राचीन काल से मौजूदा दौर तक भारत की बुलंद कहानी तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वाली ऐसी ही कुछ बुलंद सोच से आपको मिलवाने का फैसला किया है.

सिंधु घाटी सभ्यता से मिले खंडहर साफ-साफ इशारा करते हैं कि आपस में मिलकर बेहतर जीवन की सोच कैसे भारत की मिट्टी पर फली-फूली और आगे बढ़ी . लोगों ने किस तरह से नई सोच के साथ खेती-बाड़ी को उन्नत बनाने से लेकर समंदर के रास्ते व्यापार के लिए बंदरगाह तक विकसित किए…इंसानी सभ्यता को आगे बढ़ाने में प्रकृति और पशु के महत्व की सोच आगे बढ़ाने के लिए उन्हें देवी-देवताओं के साथ जोड़ा . वक्त का पहिया आगे बढ़ा और भारत में विशालकाय मंदिरों को खड़ा करने का सिलसिला शुरू हुआ … लेकिन, क्या कभी आपने जहन में आया कि किस सोच के साथ प्राचीन और मध्यकालीन भारत में विशालकाय मंदिरों का निर्माण हुआ? जो दुनिया के लिए आज भी किसी आश्चर्य से कम नहीं हैं. क्या वो सिर्फ धार्मिक आस्था के प्रतीक थे या फिर सामाजिक जीवन और अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने वाले सूत्रधार के रूप में बनाए गए. आखिर बड़े-बड़े मंदिर बनाने के पीछे सोच क्या रही होगी ?

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तमिलनाडु के तंजौर में करीब हज़ार साल से ये विशालकाय मंदिर खड़ा है. चोल राजाओं के दौर में बना ये मंदिर एक जमाने में किसी चमत्कार से कम नहीं था.जरा सोचिए इस विशालकाय मंदिर का निर्माण किन शिल्पकारों ने किया होगा…कितने वर्षों तक निर्माण का काम चला होगा … कितना धन और संसाधनों का इस्तेमाल हुआ होगा..मंदिर की गुंबद पर इतने भारी-भरकम पत्थर को कैसे पहुंचाया गया होगा ? वो भी तब जब दुनिया में न क्रेन का आविष्कार हुआ था और ना लिफ्ट का…हिंदुस्तान के नक्शे पर ऐसे कई विशालकाय मंदिर मौजूद हैं – जिनकी वास्तुकला, विशालता और भव्यता पूरी दुनिया के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं है. आखिर, उस दौर में किस सोच के साथ इतने बड़े मंदिरों का निर्माण करवाया गया होगा ?

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भारत के मंदिर सिर्फ धार्मिक आस्था के ही केंद्र नहीं थे. बल्कि, उनकी विशालकाय संरचना इस तरह की होती थी … जिसमें समाज के ज्यादा से ज्यादा लोगों को समाहित किया जा सके . मंदिर लोगों को रोजगार दिलाने से ज्ञान का प्रकाश फैलाने तक में धूरी की भूमिका में थे…नृत्य-संगीत, संस्कृति को भी बढ़ावा देने में मंदिरों का बड़ा योगदान है . खेती-बाड़ी के विकास से लेकर कारोबार को बढ़ावा देने तक में मंदिरों ने अहम भूमिका निभाई . वो भी एक सोच रही होगी - जिसमें अजंता और एलोरा की गुफाओं में ऐसी कलाकृतियों ने जन्म लिया होगा…वो कौन से शिल्पकार रहे होंगे… उनकी कितनी पीढ़ियों ने ऐसी विरासत हमारे लिए छोड़ी है .

मध्यकालीन भारत में बड़े-बड़े मंदिरों के निर्माण के पीछे उस दौर के राजाओं की एक बड़ी सोच रही होगी-समाज के कमजोर लोगों की मदद करना भी . क्योंकि, मंदिरों के जरिए बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार मिला… मंदिरों के निर्माण की प्रक्रिया में शिल्पकला और संस्कृतियों का आदान-प्रदान हुआ . मंदिरों के आसपास शहरीकरण को भी बढ़ावा मिला… और कारोबार की संस्कृति को बढ़ावा मिला . ऐसे में विशालकाय संरचनाओं के जरिए कहीं न कहीं समाज के एक तपके को आगे बढ़ाने और सबको जोड़नेवाली सोच काम कर रही होगी.

भारत के पश्चिमी हिस्से में विदेशी आक्रमण के पीछे एक सोच ये भी रही कि वहां के बड़े मंदिरों से सोना-चांदी लुटना. इसका एक उदाहरण गुजरात का सोमनाथ मंदिर भी है…वहीं, दक्षिण भारत के मंदिर लोगों की जिंदगी आसान बनाने की कोशिशों में सारथी की भूमिका में रहे … लोगों को रोजगार मुहैया कराने से लेकर शिक्षा-दीक्षा के इंतजाम में धुरी की भूमिका में रहे . मध्यकाल में मुस्लिम शासकों से लेकर हिंदू राजाओं तक ने विशालकाय किलों का निर्माण शक्ति प्रदर्शन की सोच के साथ किया … तो एक सोच शेरशाह सूरी की भी थी–जिसने आज के बांग्लादेश के चटगांव से लेकर अफगानिस्तान के काबुल तक सड़क बनवा दी. ये सड़क के रास्ते पूरे साम्राज्य को जोड़ने की सोच थी . आज की तारीख में वर्ल्ड क्लास रोड नेटवर्क के जरिए रफ्तार बढ़ने और तरक्की की गुलाबी तस्वीर दिखाने की कोशिश हो रही है .

आज की तारीख में भारत के नक्शे पर कई ऐसे एक्सप्रेस वे हैं-जहां गाड़ियां 100 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से दौड़ती हैं.वर्ल्ड क्लास रोड नेटवर्क के जरिए देश की आर्थिक तरक्की को नई ताकत मिली है. लेकिन, जरा सोचिए…जब मोटरगाड़ी नहीं थी . आवाजाही के लिए घोड़ा, हाथी, रथ और बैलगाड़ी का इस्तेमाल होता था- उस दौर में भी समाज्य के दो हिस्सों को आपस में जोड़ने के लिए किस तरह से सड़क बनाने के विचार ने आकार लिया होगा . जरा सोचिए…आज से करीब 2300 साल पहले किस तरह से राजनीति के प्रकांड पंडित तक्षशिला से पाटलीपुत्र पहुंचे होंगे… करीब 1500 किलोमीटर की इस दूरी को तय करने में कितना समय लगा होगा..एक ऐसा प्रचलित रास्ता जरूर रहा होगा, जिससे लोग इतनी लंबी दूरी तय करते होंगे.

इतिहासकारों का मानना है कि सड़कों के निर्माण हर कालखंड में हुआ है . लेकिन, शेरशाह सूरी के दौर में आज के बांग्लादेश के चटगांव से लेकर अफगानिस्तान के काबुल तक को जोड़ने के लिए सड़क का निर्माण हुआ … जिसकी लंबाई एक छोर से दूसरे छोर तक करीब 3300 किलोमीटर थी…यानी अगर आज ये रोड नेटवर्क एकसाथ जुड़ा होता - तो तीन देशों के बीच से गुजर रहा होता . कभी इसे उत्तरपथ के नाम से जाना गया… कभी शाह राह-ए-आजम..कभी सड़क-ए-आजम … कभी बादशाही सड़क… तो कभी ग्रैंड ट्रंक रोड . मौर्य काल से लेकर शेरशाह सूरी के दौर तक सड़क नेटवर्क मजबूत पर खासा जोर रहा… साम्राज्य को प्रशासनिक और सैन्य तौर पर जोड़ने में सड़कों का अहम रोल था .

मुगल हों या अंग्रेज सबने अपने साम्राज्य की मजबूती के लिए सड़कों के नेटवर्क को बढ़ाने पर खासा जोर दिया . मध्यकाल में बने विशालकाय किले भी सत्ता के प्रतीक और इकबाल की बुलंद कहानी बयां करते हैं . आज की तारीख में भी हिंदुस्तान के नक्शे पर मध्यकाल की कई ऐसी ऐतिहासिक धरोहर और किले खड़े हैं..जो अपने दौर के किसी खास साम्राज्य…किसी खास नक्शे का प्रतिनिधित्व करते हैं. कुछ को राजाओं और बादशाहों ने अपनी शान-ओ-शौकत और निजी निवास के लिए बनवाया था…तो कुछ सैन्य जरुरतों और साम्राज्य की सुरक्षा के लिहाज से बनवाए गए…हर विशालकाय निर्माण के पीछे एक दूर की सोच जरुर काम कर रही थी .

पिछले साढ़े चार सौ साल से दिल्ली के बीचो-बीच हुमायूं का मकबरा खड़ा है, जो मुगल स्थापत्य कला में बड़े बदलाव की गवाही दे रहा है..तो आगरे का किला और ताजमहल.. दिल्ली का लाल किला और जामा मस्जिद भी एक बुलंद सोच की कहानी बयां कर रहे हैं. ये भारत से जुड़ाव…यहीं का होकर रह जाना और यहीं की मिट्टी में फना होने वाली सोच से निकली बुलंद इमारतें हैं..जब अंग्रेज भारत आए तो उनकी सोच में यहां बसना कम और संसाधनों का दोहन ज्यादा था… ऐसे में करीब पौने दो सौ साल पहले भारत में रेलवे लाइन बिछाने का विचार सबसे पहले सामने आया … कुछ प्राइवेट कंपनियों द्वारा रेलवे ट्रैक भी बिछाए गए. बाद में बंबई और ठाणे के बीच पहली बार देश में पैसेंजर ट्रेन चली … ये भी एक बड़ा सच है कि अपनी सोच के मुताबिक, अंग्रेजों ने रेल की मदद से भारत का Systematic Exploitation किया. लेकिन, दूसरा सच ये भी है कि भारत की अनेकता में एकता के एजेंडे को आगे बढ़ाने में रेल ने दमदार भूमिका निभाई है.

बात करीब 190 साल पुरानी है . ब्रिटेन में स्टीम इंजन वाली ट्रेन चलनी शुरू हो चुकी थी . उसी दौर में भारत में पहली बार रेल चलाने पर विचार हुआ..ईस्ट इंडिया कंपनी के कई अफसर भारत में रेल नेटवर्क विकसित करने के पक्ष में थे… क्योंकि वो रेल के फायदे अच्छी तरह समझ रहे थे. कुछ लाइनें भी बिछाने का काम हुआ..लेकिन, सही मायनों में भारतीय लोगों का रेल से परिचय हुआ - 16 अप्रैल, 1853 को हुआ … जब बंबई से ठाणे के बीच पहली पैसेंजर ट्रेन चार सौ मुसाफिरों को लेकर पटरी पर दौड़ी . इसे भाप की शक्ति से लैस तीन लोकोमोटिव इंजन साहिब, सिंध और सुल्तान खींच रहे थे…34 किलोमीटर के इस सफ़र ने भारत में रेलवे के विस्तार का रास्ता साफ कर दिया.

साल 1853 में बॉम्बे से ठाणे के बीच यानी 34 किलोमीटर से रेल का सफर शुरू हुआ… वो 1880 तक नौ हज़ार मील से ज्यादा का हो गया. रेलवे ट्रैक बिछाने का काम तूफानी रफ्तार से जारी रहा . वक्त के साथ लंबी दूरी की कई ट्रेनें पूरे भारत को जोड़ने में सूत्रधार की भूमिका में आ गईं . मसलन, 1866 में शुरू हुई कालका मेल … जो पश्चिम बंगाल के हावड़ा से कालका तक जाती थी . पंजाब मेल और फ्रंटियर मेल …जो उस दौर में मुंबई से पेशावर के बीच चलती थी . ऐसे में लंबी दूरी की ट्रेनों के जरिए भारत के लोग रोजी-रोजगार के लिए एक हिस्से से दूसरे हिस्से पहुंचने लगे . रेलवे की वजह से भारत के विदेशी कारोबार को नया आकार मिला. अंग्रेजों ने रेल की मदद से भारत का Systematic Exploitation किया.लेकिन, इसका दूसरा पहलू ये भी है कि अंग्रेजों के न चाहते हुए भी रेल नेटवर्क का भारत को फायदा मिला .

आजादी के बाद पंडित नेहरू ने देश को तरक्की के हाईवे पर ले जाने में रेलवे की भूमिका को बहुत की अहम माना … उद्योगों के लिए कोयला और खनिजों की ढुलाई का काम बड़े पैमाने पर रेलवे के जरिए हुआ . साल 1969 में इंदिरा गांधी के दौर में राजधानी ट्रेन की शुरुआत हुई…तो 1988 में राजीव गांधी की सरकार ने शताब्दी ट्रेन को ट्रैक पर दौड़ाया…लालू प्रसाद यादव ने रेल मंत्री रहते गरीब रथ की शुरुआत की…जिसने लोअर मिडिल क्लास को एसी कोच में सफर की झीझक को बहुत हद तक कम किया … ममता बनर्जी ने रेल मंत्री रहते दुरंतो जैसी लंबी दूरी की नॉन स्टॉप ट्रेन शुरू की…Technology, Comfort और Speed के मामले में वंदेभारत जैसी ट्रेनों से भारतीय रेलवे की तस्वीर बदलने की कोशिश हो रही है .

अंग्रेजों के दौर से लेकर अबतक रेलवे अपनी पटरियों के जरिए न जाने कितनी बोली…कितनी परंपराओं…कितनी संस्कृतियों का आपस में मेल कराती रही है . अंग्रेज जिस सोच के साथ भारत में शासन कर रहे थे – उस सोच का एक साइड इफेक्ट ये भी रहा कि भारत जैसा बड़ा देश एक प्रशासनिक ढांचे से जुड़ गया . रेल, डाक और तार के जरिए पूरा भारत एक सूत्र में जुड़ गया. अंग्रेजों के दौर में ही देश के भीतर चुनावी प्रक्रिया के लिए एक मेक शिफ्ट रनवे तैयार हो चुका था..आजादी के बाद भारत पहले गणतंत्र बना और उसके बाद इसे लोकतंत्र में बदलने की चुनौती थी . लेकिन, भारत में चुनाव कैसे कराए जाएं..लोग वोट कैसे देंगे? ऐसे कई सवालों के जवाब पर माथापच्ची कर रहे थे – देश के पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन…जो एक आईसीएस अफसर थे . बड़ी चुनौती ये भी कि पश्चिम में कच्च के रण से पूरब के दूर-दराज के इलाकों तक मतदान टीमों को मतपेटियों के साथ कैसे भेजा जाए … जो लोग पढ़-लिख नहीं सकते वो अपनी वोट की ताकत का इस्तेमाल कैसे करेंगे?

पहले आजादी…फिर संविधान निर्माण . दोनों काम पूरा होने के बाद भारत के लोगों को फैसला करना था कि उनकी संसद और विधानसभाओं में नुमाइंदगी कौन करेगा ? बिना चुनाव के ये संभव नहीं था . सबसे बड़ा सवाल यही था कि इतने बड़े देश में चुनाव कैसे हो ? जिस मुल्क के करीब 85 फीसदी लोग अपना नाम भी नहीं लिख-पढ़ पाते थे… वो आजादी की फिज़ा में किस तरह सरकार चुनने में अपनी भागीदारी निभाएं … ऐसे कई सवालों पर लगातार माथाचच्ची कर रहे थे - देश के पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन .

चुनाव आयोग के अफसरों ने कड़ी मेहनत के बाद 17 करोड़, 32 लाख से अधिक वोटरों का रजिस्ट्रेशन किया…क्योंकि, 21 वर्ष से ऊपर के सभी नागरिकों को वोटिंग का अधिकार दिया गया था . तय हुआ कि बैलेट पेपर पर किसी भी उम्मीदवार का ना नाम होगा…ना चुनाव चिन्ह. मत पेटियों पर उम्मीदवार का चुनाव चिन्ह चिपका दिए गए…मतपत्र पसंदीदा उम्मीदवार की पहचान वाले बैलेट बॉक्स में गिराने की व्यवस्था की गई .

लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव साथ-साथ होने तय हुए. चुनावी दंगल का दायरा करीब एक लाख वर्ग मील में फैला हुआ था…आजाद भारत में लोकतंत्र की पहली परीक्षा में 53 राजनीतिक पार्टियां मैदान में खड़ी थीं … जो अपने-अपने तरीके से नए भारत को गढ़ने का वादा लोगों के बीच कर रही थी . पंडित नेहरू कांग्रेस के स्टार प्रचारक थे… कम्युनिस्ट, सोसलिस्ट और हिंदुत्ववादी समेत कई और धाराओं से नेता लोकतंत्र की पहली परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन के लिए पूरी ताकत झोंके हुए थे . उधर, कड़ी परीक्षा चुनाव आयुक्त सुकुमार सेना की भी थी . इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी किताब India After Gandhi में लिखते हैं

कुल मिलाकर 4500 सीटों पर चुनाव होने थे, जिसमें से करीब 500 संसद के लिए थे और शेष राज्यों की विधानसभाओं के थे . इस चुनाव के लिए 2 लाख 24 हजार मतदान केंद्र बनाए गए और वहां 20 लाख इस्पात की पेटियां भेजी गई . इन मत पेटियों को बनाने में 8200 टन इस्पात इस्तेमाल हुआ. छह महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर 16,500 क्लर्क नियुक्त किए गए, जिससे मतदाता सूची को क्षेत्रवार तैयार कराया जा सके. मतदान पत्रों को छापने में करीब 3 लाख 80 हजार कागज के रिम इस्तेमाल किए गए. चुनाव संपन्न कराने के लिए 56 हजार पीठासीन अधिकारी चुने गए और उनकी मदद के लिए दो लाख 80 हजार सहायकों को लगाया गया.

चुनाव में सुरक्षा के लिए मतदान केंद्रों पर गड़बड़ी रोकने के लिए भारी तादाद में पुलिस के जवानों को भी लगाया गया . फिल्म और रेडियो के जरिए लोगों को चुनाव को लेकर बड़ी कवायद हुई . 25 अक्टूबर,1951 को पहला वोट हिमाचल की चिनी तहसील में पड़ा…पूरी प्रक्रिया 21 फरवरी 1952 तक चली. दूर-दराज के कई इलाकों तक चुनाव अधिकारियों को मतदान केंद्रों तक पहुंचने के लिए भारी दिक्कतों का भी सामना करना पड़ा…कहीं ऊंट… कहीं हाथी…कहीं नाव से तो कहीं पैदल भी जाना पड़ा . लोकतंत्र की पहली परीक्षा में करीब 60 फीसदी वोटरों ने हिस्सा लिया… स्वतंत्र भारत में लोगों ने अपने विवेक से संसद और विधानसभाओं के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव किया…लोकतंत्र की पहली चुनावी परीक्षा ने भारत को एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश बन गया .

चुनाव-दर-चुनाव आयोग भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए बदलाव के पथ पर आगे बढ़ने लगा… 1960 के दशक में एक ही बैलेट पेपर पर सभी उम्मीदवारों के नाम और चुनाव चिन्ह वोटरों को दिया जाने लगा . बैलेट पेपर अलग-अलग बक्सों की जगह एक ही बक्से में डाले जाने लगे… चुनावी प्रक्रिया आसान और पारदर्शी बनाने के लिए आयोग नए-नए रास्ते खोजने लगा . आदर्श आचार संहिता लागू करने से लेकर बोगस वोटिंग रोकने के लिए मतदाता पहचान पत्र जैसे कदम उठाए गए…EVM के जरिए मतदान का मैकेनिज्म धीरे-धीरे पूरे देश में लागू हुआ… इससे कई दिनों तक चलने वाली वोटों की गिनती की प्रक्रिया कुछ घंटों में सिमट गई .

2024 में 7 चरणों में हुए आम चुनाव में एक साथ कई रिकॉर्ड बने…इसमें से एक है- 64.2 करोड़ वोटरों की भागीदारी वर्ल्ड रिकॉर्ड … ये आंकड़ा सभी जी-7 देशों के वोटरों का डेढ़ गुना और यूरोपीय यूनियन के 27 देशों के वोटरों का ढाई गुना है . समय-समय पर चुनावी नतीजों के बाद ईवीएम पर भी सवाल उठते रहे हैं..लेकिन, एक सच ये भी है कि भारतीय लोकतंत्र में चुनावी नतीजों को सियासी दलों ने हमेशा दोनों हाथ जोड़ कर स्वीकार किया और लोगों द्वारा तय भूमिका में चले गए . इन दिनों चुनाव आयोग मतदाता सूची के शुद्धिकरण के लिए स्पेशल इंटेसिव रिवीजन यानी SIR की प्रक्रिया चला रखा है .

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले इलेक्शन कमीशन ने SIR प्रक्रिया शुरू…उसके बाद यूपी, एमपी समेत 12 राज्यों में वोटर लिस्ट अपडेट करने की प्रक्रिया जारी है . राजनीतिक दल SIR को अपनी सियासी सहूलियत के हिसाब से अलग-अलग चश्मे से देख रहे हैं . सियासत अपनी जगह है . SIR पर पक्ष-विपक्ष की अपनी दलीलें हैं . लेकिन, हम भारत के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि कैसी सरकार लोगों की भलाई के लिए समर्पित भाव से काम कर सकती है ? हमारे लगातार मजबूत होते लोकतंत्र की एक खासीयत ये भी है कि लोग समय-समय पर अपने वोट की चोट से हुक्मरानों को आइना दिखाते रहे हैं और अपनी गलतियों को भी ठीक करते रहे हैं .

पिछले सात दशकों में भारत के संसदीय लोकतंत्र में अगर लोगों की आस्था लगातार बढ़ी है… तो इसमें एक बड़ा योगदान निष्पक्ष चुनाव की सोच को भी जाता है . चुनाव आयुक्त की कुर्सी पर बैठे उन शख्सियतों को भी जाता है- जिन्होंने देश, काल, परिस्थिति के हिसाब से चुनाव में सुधार के रथ को आगे बढ़ाया…भारत निर्माण में सारथी की भूमिका में कई मुखर सोच हमेशा से ही काम करती रही हैं.


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