बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर गढ़ने में कई विचारों ने एक साथ काम किया है. वो भी तो एक सोच रही होगी–जिसमें भारत की तरक्की के लिए Mixed Economy का रास्ता चुना गया होगा. वो भी तो कोई सोच रही होगी – जिसमें AIIMS, IIT और IIM जैसे संस्थान खुले. वो भी तो कोई सोच रही होगी-जिसमें अधिक पैदावार के लिए हरित क्रांति की जमीन तैयार हुई होगी. वो भी एक खुली सोच रही होगी - जिसमें महिलाओं की आईएएस और आईपीएस में एंट्री शुरू हुई. वो भी एक सोच रही होगी - जिसने भारतीयों का कंप्यूटर से परिचय कराया गया होगा. वो भी एक सोच रही होगी–जिसमें अर्थव्यवस्था के बंद खिड़की-दरवाजे खुले. वो भी एक सोच रही होगी, जिसने भारत को परमाणु शक्ति बनाया.
जब भारत आजाद हुआ तो एक ओर बंटवारे का दर्द था. दूसरी ओर अनगिनत समस्याएं…तब देश की आबादी करीब 34 करोड़ के आसपास थी . इस आबादी में से हर 100 में से 80 आदमी गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी बसर कर रहा था… सिर्फ 20 लोग ही मुश्किल से साक्षर यानी लिख-पढ़ सकते थे . एक आदमी की सालाना कमाई पौने तीन सौ रुपये से भी कम थी यानी मुश्किल से 20-25 रुपये महीना… भारत के नक्शे पर मेडिकल कॉलेजों गिनती के थे. सामान्य पढ़ाई के लिए छात्रों को कोसों पैदल चल कर रोजाना स्कूल पहुंचना पड़ता था. देश की जीडीपी में खेती का योगदान आधा से ज्यादा का था . ऐसे में आजाद भारत की कमान संभाल रहे पंडित जवाहरलाल नेहरू लगातार अपने दिमाग पर जोर डाल रहे थे कि देश को मौजूदा संकट से निकालने की राह क्या होनी चाहिए ? किस सोच के साथ आगे बढ़ने में भारत के हर आदमी को ये महसूस हो कि ये देश उसका है … इस देश को बनाने में उसकी भूमिका है. भले ही पंडित नेहरू की शिक्षा-दीक्षा विलायत में हुई थी..लेकिन उन्हें भारतीय संस्कृति, परंपरा और इतिहास की गहराई से समझ थी … वो जितनी बारीकी से इंटरनेशनल पॉलिटिक्स समझते थे … उतनी ही गंभीरता से मुल्क की अंदरुनी समस्याओं को भी समझते थे. उस दौर में आर्थिक तरक्की के दो मॉडल एक-दूसरे से रेस लगा रहे थे…एक अमेरिका की अगुवाई वाली पूंजीवादी व्यवस्था . दूसरी रूस की अगुवाई वाला कम्युनिस्ट मॉडल. लेकिन, नेहरू ने भारत की जरूरतों के हिसाब से बीच का रास्ता यानी Mixed Economy को चुना .देश की तरक्की के लिए पंचवर्षीय योजनाओं का ब्लूप्रिंट तैयार किया गया…ये नेहरू की मुखर और खुली सोच का ही कमाल है कि वो महात्मा गांधी के करीबियों में से एक होते हुए भी – देश की आर्थिक तरक्की के लिए उनके रास्ते को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया .
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आज़ादी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौती पुरानी थी… जनसंख्या का बड़ा तबका कृषि आधारित था … आजादी की फिजा में लोगों ने अपनी आंखों में बहुत खूबसूरत सपने संजो रखे थे…ऐसे में बगैर संतुलित, व्यवहारिक और आदर्श आर्थिक तरक्की के मॉडल के भारत में हर आंख से आंसू पोंछने का सपना पूरा नहीं हो सकता था . तब के देश के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि आजाद भारत की अर्थव्यवस्था की दिशा क्या हो? अर्थव्यवस्था का आधार सरकार-नियंत्रित हो या बाज़ार नियंत्रित…उस समय दुनिया इन्हीं दो धाराओं में बंटी हुई थी…एक तरफ़ अमेरिका और यूरोप का मॉडल था तो दूसरी तरफ़ सोवियत संघ का…ऐसे में पंडित नेहरू ने बीच का रास्ता निकाला … भारत को मिश्रित अर्थव्यवस्था का दर्शन दिया जिसमें सरकार का भी रोल था और निजी उद्योग-धंधों का भी .
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उस दौर में पंडित नेहरू की आर्थिक सोच को आगे बढ़ाने में जो लोग उनके साथ खड़े थे- उनमें जॉन मथाई और सी.डी.देशमुख जैसे लोग भी थे . जो उनकी कैबिनेट में वित्त मंत्री भी बने …योजना आयोग जैसी संस्था के जरिए भारत की तरक्की का फॉर्मूला खोजा जाने लगा … इसी तरह अर्थशास्त्री पीसी महालनोबिस ने भारत की तरक्की के लिए नया मॉडल आगे बढ़ाने में अहम किरदार निभाया . ये उस दौर की चुनौतियों को देखते हुए एक ऐसी सोच थी - जिसमें भारत के हर क्षेत्र में बदलाव की बुलंद कहानी तैयार की जा सके… पंचवर्षीय योजना के जरिए तरक्की की बुनियाद रखी गयी . कृषि और उद्योग दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाने का रास्ता निकाला गया…सार्वजनिक क्षेत्र का खाका आत्म-निर्भर आर्थिक विकास के साधन के तौर पर विकसित किया गया …इसके पीछे सोच थी कि आजाद भारत के आखिरी छोर तक तरक्की और बदलाव की बयार को पहुंचाना..ऐसे में पहली पंचवर्षीय योजना में सिर्फ 5 PSUsकी नींव रखी गयी, जिन्हें पंडित नेहरू ने आधुनिक भारत का मंदिर कहा .
सरकारी कंपनियां खोलने की मुहिम ने तूफानी रफ्तार पकड़ी दूसरी पंचवर्षीय योजना के बाद… इसमें Industrial Policy Resolution of 1956 ने भी अहम किरदार निभाया. उसके बाद सरकारी पूंजी से बड़े-बड़े कारखाने और नए-नए संस्थान खुलने लगे…अब सरकार का पूरा जोर. जैसे आद्योगिक शहर खड़े हुए…सिंचाई और बिजली के क्षेत्र में बड़े बदलाव के लिए भाखड़ा-नंगल, दामोदर घाटी, हीराकुंड, काकरा पारा, गंगापुर, तुंगभद्रा नदी घाटी जैसी परियोजनाएं शुरू हुई … आजादी के बाद हिंदुस्तान की तरक्की में सरकारी कंपनियां झंडाबरदार की भूमिका में थीं .
ये आजादी के शुरुआती वर्षों में भारत को आर्थिक तरक्की के हाईवे पर ले जाने की मुखर सोच थी,जिसमें सरकारी कंपनियां खुलने लगीं…भारत के खेतों में पैदावार बढ़ाने के लिए सिंचाई और दूसरे इंतजामों पर खुल कर बात होने लगी . दूसरी ओर वर्ल्ड क्लास संस्थान खोलने पर भी गंभीरता से मंथन चल रहा था– जिससे तरक्की की रफ्तार बढ़ाने के लिए प्रोफेशनल्स को देश के भीतर ही तैयार किया जा सके .
आजादी के पहले से ही देश के भीतर इस बात पर मंथन शुरू हो चुका था कि बगैर World class educational Institutions के भारत की तरक्की के खिड़की-दरवाजे नहीं खोले जा सकते हैं . वो साल 1945 का था - टाटा ग्रुप से जुड़े एक कारोबारी हुआ करते थे - सर अर्देशिर दलाल … उनकी सोच थी कि भारत की भविष्य में तरक्की बहुत हद तक पूंजी यानी Capital से ज्यादा Technology पर निर्भर करेगी . इस सोच के और भी पैरोकार थे…उस दौर में Viceroy की Executive Council में एक सदस्य हुआ करते थे - सरदार जोगिंदर सिंह . उन्होंने एक कमेटी का गठन किया… जिसका मकसद था - भारत में Higher Technical Institutions किस तरह से खड़े किए जाएं … 22 सदस्यों वाली इस कमेटी की अध्यक्ष थीं - नलिनी रंजन सरकार . तब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थे-BC Roy…उनके एक करीबी हुआ करते थे हुमायूं कबीर. शिक्षाविद थे…कवि थे…उपन्यासकार थे . उनके बायोडाटा में एक ओर चीज जुड़ी की- वो राजनेता भी थे. कहा जाता है कि हुमायूं कबीर ने ही बीसी रॉय को बेहतर इंजीनियर तैयार करने वाले संस्थान खोलने के लिए राजी किया … ऐसे में बंगाल के खड़गपुर में पहला IIT खुला … Higher Technical Institutions में भारत की तरक्की की सोच के साथ 15 सितंबर, 1956 को संसद से Indian Institute of Technology (Kharagpur) Act पास हुआ…उसके बाद देश के भीतर World Class Engineers पैदा करने के लिए नए-नए IITs खुलने का सिलसिला शुरू हो गया . इसी तरह AIIMS और IIM खुलने के पीछे भी कई सोच एक साथ काम कर रही थीं . एम्स भारत के लिए सिर्फ एक अस्पताल नहीं…किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे शख्स की जिंदगी के लिए भरोसे का दूसरा नाम है…तो बिजनेस लीडर्स तैयार में IIM का कोई जवाब नहीं.
आजादी के पहले ही भारत में एक अत्याधुनिक मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट की आवश्कता महसूस की जाने लगी थी…पंडित नेहरू देश में इलाज के लिए एक बेहतर अस्पताल और मेडिकल इंस्टीट्यूट का सपना देख रहे थे… तब देश के स्वास्थ्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रही थी-राजकुमारी अमृत कौर. जब एम्स की योजना बनाई गई तो पंडित नेहरू चाहते थे कि ये कोलकाता में बने. लेकिन तब पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधान चंद्र राय ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया … ऐसे में एम्स का कलकत्ता की जगह दिल्ली में बनना तय हुआ . तब एम्स के निर्माण में न्यूजीलैंड सरकार ने बड़ी आर्थिक मदद की…राजकुमारी अमृत कौर की कोशिशों की वजह से 1952 में एम्स की आधारशिला रखी गई और इस एम्स को ऑटोनोमस बनाने के लिए 1956 में संसद में एक्ट पास किया गया . समेत एम्स के दूसरे कैंपस में रोजाना लोग अपनी बीमारियों के बेहतर से बेहतर इलाज के लिए बड़ी उम्मीद के साथ पहुंच रहे हैं … ऐसे कोई बीमारी नहीं,जिसका इलाज में एम्स में न होता हो…यहां से पासआउट स्टूडेंट सिर्फ देश के भीतर ही नहीं विदेशों में भी इलाज से लेकर मेडिकल रिसर्च तक में भरोसे का दूसरा नाम हैं .
इसी तरह देश में वर्ल्ड क्लास इंजीनियर पैदा करने की सोच के साथ IITsजैसे संस्थान खुलने का सिलसिला पश्चिम बंगाल के खड़गपुर से शुरू हुआ…इसके बाद IIT मुंबई, IIT मद्रास, IIT कानपुर, IIT दिल्ली जैसे संस्थान खुले… इन संस्थानों ने वर्ल्ड क्लास इंजीनियर पैदा करने में अहम भूमिका निभाई … जिससे देश के भीतर विज्ञान और तकनीक को बढ़ावा मिला . अभी देश में कुल 23 IITs हैं..जहां हर साल हज़ारों की तादाद में वर्ल्ड क्लास इंजीनियर पैदा किए जा रहे हैं … और IITs से निकले इंजीनियरों के हुनर का कमाल भारत के हर हिस्से में अद्भुत संरचनाओं के रूप में सामने है . इसी तरह बिजनेस को नई ऊंचाई तक पहुंचाने की बुलंद सोच के साथ ऐसे इंस्टीट्यूट की जरुरत महसूस की गई - जहां प्रोफेशनल्स तैयार किए जा सकें . 1959 में योजना आयोग ने All India Institute of Management Studies की स्थापना के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्रोफेसर जॉन रॉबिन्स को न्यौता दिया गया…जिनकी सिफारिशों के आधार पर, भारत में दो ELITE MANAGEMENT INSTITUTE खोलने का फैसला हुआ..एक कोलकाता और दूसरा अहमदाबाद में . 13 नवंबर,1961 को IIM कोलकाता की स्थापना हुई… जिसमें MIT स्लोअन स्कूल ऑफ मैनेजमेंट…पश्चिम बंगाल सरकार, फोर्ड फाउंडेशन और भारतीय उद्योग ने मदद की…इसी तरह IIM अहमदाबाद को शुरुआती दौर में Harvard Business School से मदद मिली .
IIM अहमदाबाद बनाने में तीन लोगों ने अहम भूमिका निभाई - इसमें से एक थे परमाणु वैज्ञानिक विक्रम साराभाई … दूसरे कारोबारी कस्तूरभाई लालभाई और तीसरे तब के गुजरात के मुख्यमंत्री जीवराज मेहता…भारत की बुलंद तस्वीर तैयार करने में IITs और IIM जैसे संस्थानों की बड़ी भूमिका रही है . अगर भारत विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और कारोबारी तरक्की के क्षेत्र में इतना तेजी से आगे बढ़ा है- तो इसमें बड़ा योगदान आजादी के बाद वर्ल्ड क्लास प्रोफेशनल एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स को भी जाता है .
हमारे देश की दो महिलाओं का जिक्र करना जरूरी है-जिन्होंने अपने दौर की बंदिशों को तोड़ते हुए IAS और IPS जैसी मुश्किल समझी जाने वाली सर्विस में लड़कियों के लिए खिड़की दरवाजे खोले…इसमें से एक थी - अन्ना राजम…जो साल 1951 में सभी पुरानी धारणाओं को तोड़ते हुए देश की IAS बनीं…उस दौर में इस बड़ी नौकरी के लिए महिलाओं को अनफिट समझा जाता था…इसी तरह साल 1972 में आईपीएस की ट्रेनिंग लेनेवाले 80 अफसरों में से इकलौती लड़की थी . ये भी एक बुलंद सोच थी कि पुरुषों की वर्चस्व वाली नौकरियों में महिलाएं पीछे क्यों रहें…अन्ना राजम और किरण बेदी ने भारत की बेटियों को सिविल सर्विसेज यानी बड़ा अफसर बनने की राह दिखाई. इस बीच एक और सोच का जिक्र करना भी बहुत जरूरी है–वो है लाल बहादुर शास्त्री की सोच . जिन्होंने अपनी बुलंद सोच से दो जंग एक साथ जीती…पहली, भूख के खिलाफ . दूसरी, सरहद पर दुश्मनों के खिलाफ . दोनों मोर्चे पर इंदिरा गांधी भी पूरी व्यवहारिक सोच के साथ आगे बढ़ीं .
देश की कमान संभालते ही लाल बहादुर शास्त्री ने अपना इरादा साफ कर दिया..उनकी प्राथमिकता सूची में जय जवान यानी सरहद की सुरक्षा और जय किसान यानी खाद्य सुरक्षा दोनों ऊपर आ गए . वैसे तो उन्नत बीजों के जरिए पैदावार बढ़ाने की कोशिशें पंडित नेहरू के दौर में ही शुरू हो चुकी थीं..पर 1960 के दशक में अनाज के उत्पादन में कमी ने भयंकर समस्या खड़ी कर दी…इस बीच मानसून की चाल बिगड़ने की वजह से देश में खाने के अनाज की भारी कमी हो गई…जिससे देश के कई हिस्सों में अनाज के लिए लूट-पाट जैसे हालात बन गए . ऐसे में भारत में खेती की तस्वीर बदलने के लिए चौतरफा रणनीति पर काम शुरु हुआ…जिसे अर्थशास्त्री New Agricultural Strategy यानी हरित क्रांति का नाम देते हैं . इसमें अधिक पैदावार के लिए उन्नत बीजों का प्रयोग, रासायनिक खादों का इस्तेमाल, पौधों का संरक्षण, बहुफसली खेती को बढ़ावा, सिंचाई सुविधाओं का विकास, आधुनिक कृषि यंत्रों का इस्तेमाल पर फोकस किया गया.
भारत में अनाज की कमी पूरा करने के लिए जो रास्ते निकाले जा रहे थे - उसमें देश के एक युवा कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन अहम भूमिका निभा रहे थे. उस दौर में मैक्सिको में बौने गेहूं का प्रयोग चल रहा था- जिसे इजात किया था प्रो. नॉर्मन बोरलॉग ने . जिनके संपर्क में थे- भारत के ही एक युवा कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन . भारत में भी बौने गेहूं का परीक्षण शुरू हुआ… तो पैदावर प्रति हेक्टेयर सीधे डबल से भी ज्यादा निकली . ऐसे में जय जवान…जय किसान का नारा दे चुकी तत्कालीन शास्त्री सरकार सिंचाई और उर्वरकों के साथ-साथ ज्यादा पैदावार वाली किस्मों को अपनाने पर खासा जोर दिया . हरित क्रांति का नतीजा ये निकला भारत खाने के अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बन गया .
इसी तरह लालबहादुर शास्त्री ने सहदरी सुरक्षा पर भी खासा जोर दिया…रक्षा बजट में भारी बढ़ोत्तरी की गई . नतीजा ये रहा कि 1965 में भारत ने सरहद पर पाकिस्तान का अहंकार चूर-चूर कर दिया . शास्त्री जी ये भी अच्छी तरह समझ रहे थे कि भारत की सुरक्षा के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है . ऐसे में शास्त्री जी ने परमाणु ऊर्जा आयोग को एटम बम डिजाइन करने का काम सौंपा. मतलब, एटम बम बनाने की दिशा में कदम बढ़ा दिया . लालबहादुर शास्त्री के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठीं इंदिरा गांधी … उन्होंने भी सेना का तरकश भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी और नतीजा ये रहा कि 1971में भारतीय फौज ने अपने पराक्रम से पाकिस्तान को बुरी तरह हराया और अमेरिका भी चाहकर कुछ नहीं कर पाया . इससे दुनिया के नक्शे पर भारत की एक मजबूत राष्ट्र के रूप में पहचान बनीं .
हरित क्रांति ने देश में अनाज की कमी को पूरा किया…तो सरहदों की सुरक्षा पर जिस तरह से ध्यान दिया गया, उससे भारत की ताकत का लोहा पूरी दुनिया ने माना…पर विज्ञान और तकनीक में बहुत कुछ किया जाना बाकी था…कहीं-न-कहीं भारत पिछड़ रहा था . इस बात को पूरी गंभीरता के साथ महसूस किया तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने..वो कंप्यूटर को तो लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनाने का प्रयास कह ही रहे थे…उस दौर में उनके सलाहकार के रूप में जुड़े सैम पित्रोदा…जो एक टेक्नोक्रेट थे . टेलीकॉम सेक्टर से लेकर दूसरे कई सेक्टर में भारत की तस्वीर बदने वाली सोच काम करने लगी. लेकिन, देश की अर्थव्यवस्था पुराने ढर्रे पर ही चल रही है…जो दुनिया में तेजी से होते बदलावों के बीच कदमताल की स्थिति में नहीं थी . ऐसे में नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने देश की अर्थव्यवस्था से Socialist Economy वाला केचुल उतारकर Economic Liberalization का रास्ता दिखाया . उस सोच को आगे बढ़ाने में सारथी की भूमिका में सी. रंगराजन, मोंटेक सिंह अहलूवालिया, एन के सिंह जैसे नाम काम कर रहे थे .
वो साल 1991 का था . प्रधानमंत्री की कुर्सी पर थे-नरसिम्हा राव . उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी - मुल्क की आर्थिक सेहत ठीक करने की…ऐसे में PM राव ने देश के वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी डॉक्टर मनमोहन सिंह को… अपनी ठोस समझ और दूरदर्शी सोच का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने वित्त वर्ष 1991-92 के लिए ऐतिहासिक बजट तैयार किया… 24 जुलाई, 1991 को पेश बजट में… दुनिया भर की कंपनियों के लिए भारतीय बाजार खोल दिया गया,भारतीय कंपनियों के लिए भी विदेशों में कारोबार की राह आसान हुई , कस्टम ड्यूटी 220% से घटाकर 150 फीसदी किया गया . लाइसेंस-परमिट राज को खत्म किया गया .
मनमोहन सिंह की नीतियों ने हिंदुस्तान के दरवाजे-खिड़कियां कारोबार के लिए देशी-विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिया . साथ की बैंकिंग सेक्टर में सुधार के लिए कई बड़े फैसले लिए… मसलन आरबीआई का बैंकों पर कंट्रोल कम किया गया कैपिटल मार्केट से जुड़े सभी अधिकार Securities and Exchange Board of India यानी SEBI को सौंपे गए उद्योग, उत्पादन और कीमत को बाजार पर छोड़ दिया गया 18 उद्योगों को छोड़कर शेष पर लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म और सरकारी कंपनियों को विनिवेश की भी मंजूरी दी गयी .
उस दौर में मनमोहन सिंह के विचारों का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ… लेकिन, कोई भी ताकत उस विचार को नहीं रोक पाई और हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था उदारवाद की तरफ चल पड़ी . मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू अपनी किताब 1991 हाऊ पी वी नरसिम्हा राव मेड हिस्ट्री' में लिखते हैं. नेहरू और इंदिरा के प्रति सम्मान प्रकट करने और भारत के औद्योगीकरण में उनके योगदान को याद करने के बाद नरसिम्हा राव ने एक झटके में समाजवाद के नाम पर खड़ी औद्योगिक नीति को इतिहास का एक हिस्सा बना दिया . मनमोहन सिंह ने उदारीकरण की जो राह देश को दिखाई…उसका जल्द ही फायदा दिखने लगा . भारतीय अर्थव्यवस्था कुछ वर्षों में ही ICU से बाहर निकल कर दौड़ लगाने लगी .
1991 में जहां GDP विकास दर 1.06% थी . वो अगले साल यानी 1992 में बढ़कर 5.84%पर पहुंच गयी..1995 में GDP विकास दर बढ़ कर 7.57 फीसदी हो गयी…1999 में 8.85% तक पहुंच गयी . मनमोहन सिंह की उदारीकरण की नीतियों की वजह से देशी-विदेशी कारखाने तूफानी रफ्तार से खुलने लगे…जो न सिर्फ भारत की जीडीपी के आंकड़े को बढ़ा रहे थे…बल्कि, लाखों नौजवानों को नौकरी और करोड़ों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार भी दे रहे थे .
अगर पिछले तीन दशकों में भारत की तस्वीर पूरी तरह से बदली है, भारतीय टायलेंट सिलिकन वैली से सिडनी तक छाया हुआ है…तो उसमें उदारीकरण की सोच का बड़ा योगदान रहा है . भारत में रोजगार के इतना रास्ते खुले हैं तो इसमें उदारीकरण की सोच ड्राइविंग सीट पर रही है . इसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी की सोच के केंद्र में सबको साथ लेकर चलने की भावना कूट-कूट भरी थी…तो वो एक शक्तिशाली भारत के भी पक्षधर थे . उनके दौर में भारत ने परमाणु परीक्षण जैसा बड़ा फैसला लिया…तो डॉक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पहुंचने के बाद उन रास्तों को चौड़ा करते दिखते हैं- जिसमें भारत को घरेलू से लेकर अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे पर मजबूती मिल सके . वहीं, जब 2014 में नरेंद्र मोदी प्रचंड बहुमत से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे - तो वो एक ऐसी सोच के साथ आगे बढ़े, जिसमें आम आदमी के लिए शौचालय बनाना भी था और संसद के लिए नई बिल्डिंग भी … राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बनाना भी था और बुलेट ट्रेन के सपने को हकीकत में बदलने का अटल इरादा भी.
पीएम मोदी में अपने मिशन के साथ लोगों को जोड़ने की गज़ब क्षमता है. वो अच्छी तरह जानते हैं कि लोगों को सरकार के होने के अहसास कैसे कराया जाता है ? प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत हर किसी को घर…सौभाग्य योजना के तहत हर घर को बिजली,जल जीवन मिशन के तहत हर घर को नल से जल…स्वच्छ भारत मिशन के जरिए हर घर शौचालय…आयुष्मान भारत योजना के तहत गरीबों के इलाज का इंतजाम जैसी योजनाएं मिशन मोड में चलाते हैं…तो गरीब महिलाओं के लिए हर महीने कैश स्कीम भी अब टॉप एजेंडा में है .
प्रधानमंत्री मोदी आधुनिक तकनीक की मदद से सरकारी योजनाओं की सख्ती से मॉनिटरिंग में यकीन करते हैं…ऐसे में उनके दौर में बहुत हद तक बिचौलिया तंत्र और भ्रष्टाचार को खत्म करने की कोशिश हुई है . पीएम मोदी अपने सपनों के न्यू इंडिया को गढ़ने के लिए पुराने मानदंड और तौर-तरीकों को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिशों में जुटे हैं. मोदी एक ओर कूटनीति की मदद से बेहतर दुनिया बनाने में भारत की असरदार भूमिका को आगे बढ़ाने में लगे हैं…तो खुराफाती पड़ोसियों के लिए भी भारत का संदेश बिल्कुल साफ है . नरेंद्र मोदी जिस सोच के साथ न्यू इंडिया को गढ़ने की बात करते हैं-उसे राजनीति अपने चश्मे से देखती है और देश का आम आदमी अपने तरीके से .
कोई भी सोच हमेशा के लिए नहीं होती…देश, काल, परिस्थितियों के मुताबिक उसमें बदलाव होते रहते हैं . जरा सोचिए कि अगर आजादी के बाद एम्स जैसे संस्थान नहीं खुले होते तो आज देश में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत क्या होती… अगर आईआईटी या आईआईएम जैसे संस्थान नहीं खुले होते… तो क्या होता? अगर लोगों की भूख मिटाने के लिए हरित क्रांति की सोच को जमीन पर नहीं उतारा गया होता तो क्या होगा…अगर भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने… देश की कार्य संस्कृति में कंप्यूटर लाने की सोच फली-फूली न होती तो क्या होता … अगर Liberalization, Privatization और Globalization की सोच को अपनाया नहीं गया होता - तो आज भारत की तस्वीर क्या होती? देश की कमान चाहे जिसके भी हाथों में रही… तत्कालीन परिस्थितियों के हिसाब से उसके ईंद-गिर्द सोच का वैसा ही Eco System बना… जो भारत निर्माण में एक व्यवहारिक सारथी की भूमिका निभाता रहा.