पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अक्सर कहा करते थे कि दोस्त बदले जा सकते हैं, पड़ोसी नहीं. मौजूदा कूटनीतिक रिश्तों की बुनियाद बहुत हद तक आर्थिक नफा-नुकसान पर टिकी है. हाल में भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुई डील हो या फिर अमेरिका के साथ ट्रेड डील. कूटनीतिज्ञ अपने-अपने हिसाब से डील में नफा-नुकसान का विश्लेषण करने में जुटे हैं. सवाल ये भी उठ रहा है कि 'मदर ऑफ ऑल डील्स' और 'फादर ऑफ ऑल डील्स' से भारत के पुराने दोस्त रूस का क्या होगा? क्या पहले की तरह रूस से भारत सस्ता कच्चा तेल खरीदता रहेगा?
तेजी से बदले वैश्विक शक्ति संतुलन में दोस्तों के बीच रिश्तों में नरमी-गरमी कितनी ऊपर-नीचे होगी. लेकिन, भारत के पड़ोस में समीकरण तेजी से बदल रहा है. पूरब में बांग्लादेश है - जिसकी 4000 किलोमीटर से अधिक लंबी सरहद भारत से लगती है, जहां 12 फरवरी को आम चुनाव होने है. अब सवाल उठ रहा है कि 12 फरवरी के बाद बांग्लादेश में किसकी सरकार बनेगी? क्या वहां कट्टरपंथियों की सरकार बन जाएगी? कट्टरपंथी सत्ता में आने के बाद किसके इशारे पर फैसला लेंगे? वोटिंग से ठीक पहले जमात-ए-इस्लामी के सुर किस तरह बदल रहे हैं? बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कर्ताधर्ता तारिक रहमान का क्या होगा? क्या खालिदा जिया की मौत के बाद सहानुभूति लहर में BNP की सत्ता में वापसी हो पाएगी? क्या अवामी लीग का बांग्लादेश पॉलिटिक्स से अंत हो गया? 12 फरवरी के बाद बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमले बढ़ेंगे या घटेंगे? बांग्लादेश चुनाव का भारत, चीन और पाकिस्तान पर कितना असर पड़ेगा. आज ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे.
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करीब दो साल पहले बांग्लादेश में आम चुनाव हुए. वहां की 300 में से 299 सीटों पर मतदान हुआ, जिसमें से 204 सीटों पर शेख हसीना की अवामी लीग को जीत मिली. बांग्लादेश की कमान शेख हसीना के हाथों में बनी रही. लेकिन, जुलाई आते-आते उनकी सरकार के खिलाफ एक साथ कई मोर्चे खुल गए. प्रचंड विरोध शुरू हो गया. 5 अगस्त, 2024 को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर किसी तरह जान-बचाकर शेख हसीना बांग्लादेश से निकल गईं. अब फिर बांग्लादेश चुनाव की दहलीज पर खड़ा है. लेकिन, इस चुनाव में शेख हसीना की अवामी लीग नहीं है. बांग्लादेश की राजनीति में धुरी रही अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. ऐसे में ये समझना जरूरी है कि अबकी बार बांग्लादेश में किन-किन राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला है. वहां की पॉलिटिक्स में अब चेहरा और मोहरा कौन है?
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ढाका में 6 फरवरी को उस्माद हादी शहीद को इंसाफ दिलाने के लिए इंकलाब मंच के हजारों कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे. प्रदर्शनकारी अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद युनूस के सरकारी आवास के घेराव के लिए आगे बढ़ रहे थे. ऐसे में पुलिस और पैरा मिलिट्री के जवानों ने प्रदर्शनकारियों को कंट्रोल में करने के लिए अपना पूरा तरीका आजमाया.
उस्माद हादी जुलाई 2024 में शेख हसीना विरोधी आंदोलन का बड़ा चेहरा था. 12 दिसंबर को ढाका के पलटन इलाके में सरेआम उस्माद हादी को गोली मार दी गई थी, जिसकी 18 दिसंबर को मौत हो गई. फिलहाल, ढाका के चप्पे-चप्पे पर पुलिस और पैरा-मिलिट्री का पहरा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि तनाव के बीच बांग्लादेश में चुनाव कितने निष्पक्ष तरीके से होंगे? दो साल के भीतर बांग्लादेश में दूसरी बार आम चुनाव होने जा रहा है.
पिछले 30-35 वर्षों में बांग्लादेश में ये पहला चुनाव है - जिसमें वहां की सियासत की दोनों बेगमों में से कोई भी नहीं है. शेख हसीना की अवामी लीग को प्रतिबंधित कर दिया गया है और वो मुल्क से बाहर हैं. वहीं, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP की बेगम खालिदा जिया का इसी 30 दिसंबर को निधन हो गया-अब पार्टी की कमान उनके बेटे तारिक रहमान के हाथों में है.
बांग्लादेश की राजनीति पर खासतौर से दो पार्टियों का दबदबा रहा है. एक है अवामी लीग और दूसरी BNP, मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के शुरुआती फैसलों में से एक अवामी लीग और उसके गठबंधन सहयोगियों की राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध था. ऐसे में तारिक रहमान की अगुवाई में BNP बांग्लादेश में बड़ी राजनीतिक ताकत के तौर पर दिख रही है.
बांग्लादेश में सत्ता की लड़ाई में जमात-ए-इस्लामी दूसरी बड़ी दावेदार है, जिसके नेता हैं-शफीकुर रहमान. जमात-ए-इस्लामी 11 पार्टियों के गठबंधन का नेतृत्व कर रही है. पूर्व PM शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन करने वाले छात्रों की राजनीतिक छतरी यानी नेशनल सिटिजन पार्टी ने भी जमात के साथ हाथ मिला लिया है. शफीकुर रहमान की जमात और तारिक रहमान की BNP दोनों की वैचारिक जमीन में कोई खास अंतर नहीं है.
शेख हसीना की अवामी लीग की गैर-मौजूदगी से बांग्लादेश के चुनावी अखाड़े में खड़ी सियासी दलों के चरित्र और चेहरे में भी बड़ा बदलाव दिख रहा है. BNP ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में प्रशासन और लोकतंत्र सुधार का वादा किया है और भारत को लेकर मेनिफेस्टो में सीधे कोई बात नहीं है.
बांग्लादेश की सत्ता में आने के लिए जमात-ए-इस्लामी ने पूरी ताकत झोंक दी है. अवामी लीग की गैर-मौजूदगी का फायदा उठाने और उनके वोटरों को अपने पाले में लाने के लिए जमात की कट्टरपंथी बिग्रेड ने अपनी राजनीति लाइन में बड़ा बदलाव करते हुए अपने चुनावी घोषणा पत्र में कोई आक्रामक वादा नहीं किया है, जुलाई चार्टर के जरिए न्यायिक सुधार और भारत के साथ रिश्ता रखने पर जोर दिया गया है.
वहीं, अगस्त 2024 में शेख हसीना का तख्तापलट करने और मुल्क छोड़ने के लिए मजबूर करने वाले आंदोलन कारी छात्रों की नेशनल सिटीजन पार्टी ने युवा और रोजगार पर खासतौर से फोकस किया है. शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग को लेकर मुखर है और चीन के साथ आर्थिक संबंधों को मजबूत करने का वादा कर रही है.
12 फरवरी को होनेवाले बांग्लादेश चुनाव में कुछ छोटी पार्टियां भी किस्मत आजमा रही हैं ।
बांग्लादेश के चुनावी अखाड़े में तीन ताकतों के बीच टक्कर दिखाई दे रही हैं. पहली, मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार–जिसे कट्टरपंथी गुटों का समर्थन है. दूसरी, BNP जिसकी कमान तारिक रहमान के हाथों में है और तीसरी विदेशी ताकतें, जो बांग्लादेश की उथल-पुथल में अपना हित साध रही हैं. लेकिन, सबसे हैरान करने वाला बदलाव कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी में दिख रहा है. जमात ने अपने घोषणा पत्र में लिखा है कि वह भारत और दूसरे पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को बहाल करने को प्राथमिकता देगा. इतना ही नहीं एक सुरक्षित और मानवीय बांग्लादेश की बात भी कही गयी है.
अब सवाल उठ रहा है कि जमात-ए-इस्लामी के सुर में बदलाव के पीछे असली वजह क्या है? क्या बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमले बंद हो जाएंगे? क्या वहां मंदिर नहीं तोड़े जाएंगे? क्या 12 फरवरी के बाद बांग्लादेश में जो सरकार बनेगी - वो भारत के साथ ठीक उसी तरह रिश्तों को आगे बढ़ाएगी–जैसा कभी शेख हसीना के दौर में हुआ करता था?
जमात-ए-इस्लामी के चीफ शफीकुर रहमान को भरोसा है कि इस बार किस्मत पलटेगी और बांग्लादेश की हुकूमत संभालने का मौका जमात के नेताओं को मिलेगा. जमात-ए-इस्लामी ने 11 पार्टियों के गठबंधन की छतरी तानी है , इसमें कट्टरपंथी भी शामिल हैं. लेकिन, शफीकुर रहमान अच्छी तरह समझ चुके हैं कि पुरानी कट्टरपंथी सोच और भारत विरोधी बातों के जरिए बांग्लादेश में सत्ता हासिल करना मुश्किल है. ऐसे में जमात ने अपने 41 सूत्रीय घोषणापत्र में न्याय और आर्थिक क्षेत्रों में सुधारों के साथ मंत्रिमंडल में महिलाओं को शामिल करने का वादा किया है. भारत समेत पड़ोसी देशों से रचनात्मक और सहयोगात्मक रिश्ते रखने की बात कही गई है. क्षेत्रीय शांति, स्थिरता, साझा समृद्धि के लिए पड़ोसियों से संवाद और सहयोग को प्राथमिकता का वादा किया गया है.
भीतरखाने ये भी खबरें आ रही हैं कि जमात-ए-इस्लामी के कार्यकर्ता अल्पसंख्यकों के बीच जाकर उन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं. उनके साथ मेल-जोल के कार्यक्रम चला रहे हैं. अल्पसंख्यकों को जान-माल की सुरक्षा का भरोसा दे रहे हैं. दलील दी जा रही है कि अवामी लीग के चुनावी प्रक्रिया से बाहर होने की वजह से जमात अल्पसंख्यकों को BNP का डर दिखाकर अपना वोट बढ़ाने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है.
बांग्लादेश की पॉलिटिक्स पर नज़र रखनेवालों की सोच है कि जमात-ए-इस्लामी के शफीकुर रहमान एक साथ कई प्लान पर काम करते हुए सत्ता हासिल करने की जुगत में लगे हैं.
जमात-ए-इस्लामी के कर्ताधर्ता शफीकुर रहमान अच्छी तरह जानते हैं कि बांग्लादेश में सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी का है. बेहतर गवर्नेस का है, बिना भारत समेत दूसरे पड़ोसियों से बेहतर रिश्ता रखे, बांग्लादेश की समस्याओं का समाधान संभव नहीं है.
बांग्लादेश में जमात की भूमिका को कई लेंस से देखने की कोशिश होती रही है. साल 1971 में बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में जमात-ए-इस्लामी ने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया. साल 1977 में बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्षता हटने के साथ जमात फिर से जिंदा हुई. बेगम खालिदा जिया की BNP के साथ गठबंधन कर सरकार में भी शामिल हुई. 2009 में सत्ता में वापसी के बाद शेख हसीना की सरकार ने कट्टरपंथियों पर नकेल कसने में कोई कसर नहीं छोड़ी. 2013 में जमात का रजिस्ट्रेशन रद्द हुआ तो 2024 में आतंकी संगठन घोषित किया गया. अब वही जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश की सत्ता में आने के लिए पूरी ताकत झोंके हुए है.
बांग्लादेश के 12 करोड़ से अधिक वोटर किसे अपना भाग्य विधाता चुनेंगे – इस सवाल का जवाब तो अभी भविष्य के गर्भ में है. लेकिन, बांग्लादेश में प्रतिबंधित अवामी लीग के नेता और शेख हसीना के बेटे साजीब वाजेद का कहना है कि भले ही BNP चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरे. लेकिन, परदे के पीछे से सब कुछ जमात-ए-इस्लामी कंट्रोल करेगी. इतिहास गवाह रहा कि BNP का रवैया भारत विरोधी रहा है. लेकिन, BNP की लाइन में बदलाव करते हुए मरहूम खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान ने धर्मनिरपेक्ष, बहुलतावादी, आर्थिक विकास पर केंद्रित और भारत के साथ अच्छे रिश्ते रखने वाली सरकार चलाने की मंशा जाहिर की है. ऐसे में दिल्ली-ढाका के बीच रिश्तों के उतार-चढ़ाव को समझना भी जरूरी है.
1971 में भारतीय सेना के अदम्य शौर्य और लहू से बांग्लादेश का जन्म हुआ. नए मुल्क बांग्लादेश की कमान शेख मुजीब-उर-रहमान के हाथों में आईं. वो अपने बांग्लादेश को कट्टरपंथियों से पूरी तरह आजाद रखने का ख्वाब पाले हुए थे. भारत के साथ बेहतर रिश्तों से बांग्लादेश का बेहतर कल देखा गया.
बांग्लादेश में हिंदुओं के प्रति नफरत का जहर घोलने में जमात-ए-इस्लामी की बड़ी भूमिका रही है. धर्मनिरपेक्षता और भारत से बेहतर रिश्ता रखने वाला बांग्लादेश कट्टरपंथियों को कभी पसंद नहीं आया. ऐसे में साल 1975 में मुजीब-उर-रहमान की तख्तापलट के बाद हत्या कर दी गई. इसके बाद बांग्लादेश को इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ बांग्लादेश में बदल दिया गया.
बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतें हावी होने लगीं. वहां की सत्ता एक पूर्व आर्मी चीफ चीफ जियाउर रहमान के हाथों में आईं. बाद में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP बनी. उतार-चढ़ाव के साथ दिल्ली-ढाका के रिश्ते आगे बढ़ते रहे. ढाका की फिजाओं में तख्तापलट और साजिश जारी रही.
साल 1991 में बीएनपी सत्ता में आई और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठीं - बेगम खालिदा जिया. पूर्व राष्ट्रपति और आर्मी चीफ जियाउर रहमान की पत्नी. जून 1996 में हुए चुनावों में आवामी लीग की सत्ता में वापसी हुई. बांग्लादेश की कमान शेख मुजीब की बेटी शेख हसीना के हाथों में आ गई. उन्होंने अपने पिता के रास्तों पर मुल्क आगे बढ़ाने की कोशिश की. जिसमें भारत के साथ बेहतर रिश्ता और कट्टरपंथियों पर लगाम कसना रहा.
बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों ने चैन की सांस ली लेकिन साल 2001 में हुए चुनाव में आवामी लीग हार गई. BNP ने चुनाव में भारी मतों से जीत हासिल की. बेगम खालिदा जिया फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर थीं. बीएनपी के सत्ता में आने के बाद कुछ हफ्तों तक हिंदुओं को ये कहते हुए निशाना बनाया गया कि इन लोगों ने अवामी लीग को वोट दिया है. कुछ समय बाद हिंसा का वो दौर खत्म हो गया. जनवरी 2009 में अवामी लीग की सत्ता में वापसी हुई. बांग्लादेश की कमान शेख हसीना के हाथों में आ गई. कट्टरपंथियों को कुचलना शुरू किया और अपने पिता की तरह भारत के साथ बेहतर रिश्तों में मुल्क का मुस्तकबिल चमकदार देखा. शेख हसीना करीब 15 वर्षों तक लगातार प्रधानमंत्री रहीं. लेकिन, साल 2024 के जुलाई महीने में कट्टरपंथियों ने उनके खिलाफ मुहिम छेड़ दी. कट्टरपंथियों ने 5 अगस्त, 2024 को उनका तख्तापलट कर दिया. शेख हसीना को इस्तीफा देकर मुल्क छोड़ना पड़ा. उसके बाद भारत-ढाका के रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिशें दिखी हैं.
बांग्लादेश में 12 फरवरी को वोटिंग होनी है. कूटनीतिज्ञों की सोच है कि अभी देखना ये है कि वोटिंग हो पाती है या नहीं… अगर होती है तो फिर वहां किस तरह का समीकरण उभरकर सामने आता है? अगर BNP के तारिक रहमान बांग्लादेश की सत्ता में आते हैं - तो उनका दिल्ली को लेकर रुख बेगम खालिदा जिया से कितना अलग रहेगा? उनकी हुकूमत में कितनी चलेगी - अभी इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है?
दिल्ली चाहेगा कि बांग्लादेश में एक स्थिर सरकार चले. जिससे भारत से लगी 4000 किलोमीटर से अधिक लंबी सरहद पर घुसपैठ की घटनाएं न बढ़ें . बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले ना हो. भारत चाहेगा कि बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल किसी स्थिति में आतंकी और कट्टरपंथी न कर सकें. वहीं, पाकिस्तान जमात-ए-इस्लामी या BNP दोनों में से किसी के भी सत्ता में आने से खुश होगा. क्योंकि, पाकिस्तानी हुक्मरान चाहेंगे कि किसी भी स्थिति में ढाका में बनने वाली नई हुकूमत से दिल्ली से रिश्ते सुधरे नहीं. चाइना भी बांग्लादेश पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है. पिछले कुछ वर्षों में चाइना ने बांग्लादेश के साथ सैन्य और आर्थिक संबंधों को बढ़ाया है. BNP और जमात दोनों पार्टियों के नेताओं से चीन के नेताओं के बीच भीतर खाने मेल-मुलाकात की खबरें आती रही हैं. ऐसे में बीजिंग चाहेगा कि बांग्लादेश में जो भी सरकार बने–उसे दिल्ली के प्रभाव से दूर रखा जाए.
बांग्लादेश में भले ही 12 फरवरी को चुनाव होना है. लेकिन, चुनाव के बाद वहां सरकार और सिस्टम को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होती नहीं दिख रही है. अभी ये कहना मुश्किल है कि बांग्लादेश में हुकूमत का चेहरा कौन होगा और किसके इशारे पर फैसला लेगा? सरकार बन पाएगी भी या नहीं? बनेगी तो गठबंधन सरकार या पूर्ण बहुमत की सरकार?
सवाल ये भी उठ रहा है कि चुनाव के बाद अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद युनूस का क्या होगा? उनके सहयोगी और संविधान सुधार आयोग के चीफ अली रियाज का कहना है कि अगर जनमत संग्रह में हां के पक्ष में बहुमत आया तो चुने गए प्रतिनिधि संसद नहीं बल्कि संविधान सभा होंगे. ऐसे में चुनाव के बाद बांग्लादेश में जारी अनिश्चितता खत्म हो जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं है. भीतरखाने ये भी कहा जा रहा है कि जमात-ए-इस्लामी और मोहम्मद युनूस के बीच एक सीक्रेट डील हुई है - जिसके मुताबिक, जमात ने चुनाव के बाद उन्हें राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठाने का वादा किया है. ऐसे में 12 फरवरी के बाद मोहम्मद यूनुस का दांव-पेंच चलता रहा तो हैरानी नहीं होनी चाहिए. फिलहाल बांग्लादेश से जुड़े ज्यादातर सवालों के जवाब अगर-मगर, किंतु-परंतु के बीच उलझे हुए हैं. दूसरी ओर, भारत के पूर्व राजनयिकों की सोच है कि मौजूदा स्थिति में BNP हो या जमात दोनों के पास दिल्ली से बेहतर रिश्ता बनाए रखने के सिवाय दूसरा विकल्प नहीं है.
कूटनीति के जानकारों की सोच है कि भले ही भीतरखाने BNP और जमात-ए-इस्लामी के नेता चीन और पाकिस्तान से रिश्ता रखें .लेकिन, उन्हें इस बात का भी इल्म है कि बांग्लादेश के लोगों को भारत विरोधी रूख पसंद नहीं है. इस्लाम को लेकर चीन का रुख भी किसी से छिपा नहीं है.
बांग्लादेश के युवा अच्छी सरकार चाहते हैं. अपने लिए नौकरी चाहते हैं, आर्थिक तरक्की चाहते हैं. ऐसे में चुनाव के बाद ढाका के साथ रिश्तों का दिल्ली, इस्लामाबाद और बीजिंग तीनों के साथ रीसेट बटन दबाना तय है.
चीन बांग्लादेश को एक अहम कारोबारी और निवेश साझीदार के रूप में देखता है. वहीं, बांग्लादेश में अमेरिका की दिलचस्पी भी किसी से छिपी नहीं है. सामरिक रूप से अहम बंगाल की खाड़ी में स्थिति सेंट मार्टिन द्वीप को अमेरिका हासिल करना चाहता था. जिसे शेख हसीना सरकार ने वर्षों रोके रखा. अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद मोहम्मद यूनुस की अगवाई वाली अंतरिम सरकार के साथ भारत ने टकराव की जगह शांत कूटनीति को आगे रखा. फिलहाल, शेख हसीना भारत में हैं और कभी बांग्लादेश की सियासत में धुरी रही-अवामी लीग चुनाव से भी बाहर है. ऐसे में सवाल उठता है कि 12 फरवरी को चुनाव के बाद ढाका में जिसकी भी हुकूमत बनेगी–उसका असली चाल, चरित्र और चेहरा क्या होगा? क्या बांग्लादेश के कट्टरपंथियों का मन अब बदल चुका है? क्या जमात और बीएनपी नेता अब चीन और पाकिस्तान के मोहरे की तरह इस्तेमाल नहीं होंगे? इतिहास गवाह है कि एक देश के रूप में वजूद में आने से लेकर अब तक कई बार बांग्लादेश उलथ-पुथल और बदलाव के दौर से गुजरा है. ऐसे में फिर बदलाव की दहलीज पर खड़े खड़े बांग्लादेश में होने वाली हर हलचल पर दिल्ली को बाज की तरह नजर रखनी होगी - देखना होगा कि ढाका के बदले मिजाज की कथनी और करनी में अंतर तो नहीं. क्योंकि, राजनीति और कूटनीति में कहा कुछ और जाता है, किया कुछ और.