अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध के मद्देनजर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा के लिए मित्र देशों से युद्धपोत भेजने की अपील की थी. ट्रंप का मानना है कि जो देश तेल के लिए इस समुद्री रास्ते पर निर्भर हैं उन्हें इसकी रक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए. एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वह इस मुद्दे पर सात देशों से संपर्क में हैं और यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन मदद के लिए आगे नहीं आता है. हालांकि ट्रंप ने सख्ती दिखाते हुए यह भी कह दिया कि अगर कोई देश मदद नहीं करता है तो भी उन्हें कोई खास फर्क नहीं पड़ता है.
जापान, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस का दो टूक जवाब
ट्रंप की इस मांग पर दुनिया के कई ताकतवर देशों ने अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं. जापान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह फिलहाल होर्मुज में अपना कोई भी युद्धपोत तैनात करने पर विचार नहीं कर रहा है. ऑस्ट्रेलिया ने भी एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक नेवी शिप भेजने के अनुरोध को ठुकरा दिया है. वहीं फ्रांस की रक्षा मंत्री ने साफ कहा है कि जब तक जंग जारी रहेगी तब तक वे इस संवेदनशील इलाके में अपने जंगी जहाज नहीं भेजेंगे. तुर्की और जर्मनी ने भी इस ऑपरेशन का हिस्सा बनने से पल्ला झाड़ लिया है जिससे ट्रंप की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है.
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ईरान की ताकत और होर्मुज की अहमियत
ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिकी हमलों के कारण ईरान की उत्पादन क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है और अब वह बहुत कम मिसाइलें दाग रहा है. उनके मुताबिक ईरान की ओर से दागे जा रहे ड्रोनों की संख्या भी अब पहले के मुकाबले सिर्फ 20 प्रतिशत रह गई है. होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे बड़ा ‘चोक पॉइंट’ है जहां से वैश्विक तेल खपत का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा और इतनी ही मात्रा में एलएनजी गैस गुजरती है. चीन, भारत और दक्षिण कोरिया जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं सीधे तौर पर अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इसी समुद्री रास्ते पर निर्भर हैं.
साउथ कोरिया और चीन पर टिकीं नजरें
ट्रंप ने जिन सात देशों का नाम लिया उनमें चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन प्रमुख हैं. दक्षिण कोरिया ने अभी तक पूरी तरह इनकार नहीं किया है और वह इस पर गंभीरता से विचार करने की बात कह रहा है. चीन और ब्रिटेन जैसे देशों ने भी अभी तक अपने युद्धपोत भेजने पर कोई आधिकारिक रुख स्पष्ट नहीं किया है. अगर ये देश मदद के लिए आगे नहीं आते हैं तो होर्मुज का रास्ता असुरक्षित बना रह सकता है जिससे वैश्विक तेल बाजार में भारी अस्थिरता आ सकती है. भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए इस रास्ते का खुला रहना आर्थिक सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी है.
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