राजस्थान की मिट्टी से जुड़ी एक परंपरा, जिसे अब न्यायपालिका की मुहर मिल गई है. नाता विवाह, जिसे गांवों में सामाजिक स्वीकार्यता तो है, लेकिन सरकारी कागजों में पहचान नहीं. लेकिन अब राजस्थान हाईकोर्ट ने इसे शादी का एक वैध रूप मानते हुए एक मृत सरकारी कर्मचारी की पत्नी को फैमिली पेंशन देने का आदेश दिया है. ये फैसला सिर्फ एक महिला के हक का नहीं…बल्कि परंपरा, कानून और सामाजिक न्याय के बीच के संतुलन की कहानी है.
रामप्यारी, जो राजस्थान के कोटा की रहने वाली है. साल 2020 में इनके पटवारी पति का निधन हुआ और जब नियमानुसार सरकार से ये उनकी जमा राशि, पेंशन, ग्रेज्युएटी और दूसरे लाभ मांगने गई तो यह कहकर इन्हें जाने को कह दिया कि वे सही उत्तराधिकारी या पत्नी नहीं हैं क्योंकि नाता प्रथा से उनका विवाह हुआ था. सरकार के इस फैसले के खिलाफ रामप्यारी ने साल 2022 में अदालत का दरवाजा खटखटाया.
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पति के मरने के बाद पत्नी ने मांग पेंशन
रामप्यारी ने दावा किया कि पटवारी पुरन लाल सैनी की पहली पत्नी की मौत के बाद उसके साथ नाता विवाह हुआ था. इस रिश्ते से एक बेटी भी पैदा हुई. इतना ही नहीं महिला ने भरण-पोषण का केस भी किया, जिसमें पूरन सैनी के खुद इस विवाह को स्वीकार करने के बाद कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया था.
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वहीं, याचिकाकर्ता रामप्यारी ने कहा कि 'मुझे गुजारा भत्ता भी दे रहे थे हमारी जब 4:30 साल की बेटी थी तब से, लेकिन 2018 में बीमार हुए तो इसे बंद कर दिया था. उनकी पहली पत्नी के बच्चे ने मुझे कभी स्वीकार नहीं किया तो उनकी मौत के बाद मैंने पेंशन मांगी और बताया कि नाता प्रथा से हमारा विवाह हुआ है तो क्या! पत्नी तो पत्नी होती है. मैंने कोई गलत रिश्ता नहीं निभाया. समाज के सामने नाता हुआ, मेरी बेटी है और कोर्ट ने पहले भी मुझे पत्नी माना.
क्या है राजस्थान की नाता विवाह प्रथा
दरअसल, नाता विवाह राजस्थान के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में सदियों से चली आ रही एक सामाजिक परंपरा है. इस प्रथा के तहत अगर महिला विधवा हो जाए, या पति से अलग हो जाए, तो वह समाज की सहमति से किसी दूसरे पुरुष के साथ वैवाहिक जीवन शुरू कर सकती है. इसमें सात फेरे या वैदिक मंत्र की बजाय केवल समाज और परिवार की सहमति सबसे अहम मानी जाती है. भील, मीणा, गरासिया, रेबारी जैसे कई समुदायों में आज भी यह परंपरा जीवित है. लेकिन दूसरा पहलू यह भी है कि कई जगह महिला को उसके पति की मृत्यु के बाद जबरदस्ती परिवार के ही किसी भी व्यक्ति के साथ रहने के लिए बाध्य किए जाने के चलते इसे कुप्रथा भी कहा जाने लगा.
ऐसे में राजस्थान हाईकोर्ट ने रामप्यारी के मामले में ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि अगर नाता विवाह सामाजिक परंपराओं के अनुसार हुआ है, तो उसे शादी मानने से इनकार नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि मृत सरकारी कर्मचारी पूरन लाल सैनी की पत्नी को फैमिली पेंशन दी जाए, भले ही शादी का कोई आधिकारिक सरकारी रजिस्ट्रेशन मौजूद न हो.
कोर्ट ने साफ कर दिया कि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 7 स्पष्ट रूप से यह मानती है कि अगर कोई विवाह स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ है, तो उसे वैध माना जाएगा. चूंकि राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में नाता विवाह को शादी का एक रूप माना जाता है. ऐसे में नाता विवाह को नजरअंदाज करना ग्रामीण समाज की सच्चाई से मुंह मोड़ने जैसा होगा.
वहीं, रामप्यारी के वकील तुषार पंवार ने कहा कि यह फैसला हजारों महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करेगा, नजीर बनेगा.
सरकारी रिकॉर्ड में नहीं है महिला का नाम
हालांकि इस मामले में राज्य सरकार ने नाता प्रथा को वैधानिक मानने से ही इनकार करते हुए कोर्ट में तर्क दिया कि महिला को सरकारी रिकॉर्ड में परिवार के सदस्य के रूप में नामांकित नहीं किया गया. सरकार ने यह भी कहा कि नाता विवाह को कानूनी शादी नहीं माना जा सकता, इसलिए फैमिली पेंशन का सवाल ही नहीं उठता. अब कोर्ट में माता-पिता को मान्यता दी है तो अब सरकार के लिए कि वह अदालत के फैसले का अध्ययन करवाएगी.
दरअसल, नाता प्रथा को अक्सर गलत नजर से देखा जाता है, लेकिन इसका मूल उद्देश्य था—महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा देना. यह प्रथा विधवाओं और परित्यक्ता महिलाओं को दोबारा सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार देती है. ऐसे में यह फैसला सिर्फ एक महिला की पेंशन का मामला नहीं…बल्कि यह परंपरा और कानून के बीच जमीनी हकीकत है जो उन हजारों ग्रामीण महिलाओं के लिए नजीर बन सकता है, जो सामाजिक तौर पर पत्नी हैं लेकिन सरकारी कागजों में नहीं. लेकिन अब सवाल यह भी है कि क्या सरकारी नीतियां भी समाज की सच्चाइयों के साथ खुद को बदलेंगी?